आदि पुरूष आदिवासी

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धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरक, वन के वासी।
वनों के अंचल में बिखरे हैं भारत के गांव।
जहां ये त्यागी – वीर, कोसों चलते नंगे पांव।
बैगा, गांेड़, कोल, कोरकू इनका परिचय परिभाषी।
भीषण गर्मी-षीत के तपस्वी – ये आदिवासी।

जहां वन हैं – वहां इनकी जन्मभूमि हैं।
वनोपज देन जिनकी, व नही कर्मभूमि है।
करते हैं कड़ी मेहनत, कम कीमत पाते हैं।
खुद भूखे रहकर, दूसरों को खिलाते हैं।
ईमानदार भोले-भाले, ये सचमुच सन्यासी।
तन-मन के धनी हैं, ये आदिवासी।

अन्याय से मुक्ति हेतु इनका जीवन छटपटाता था।
शोषण से जिनका दिल कुछ घबड़ाता था।
तेंदूपत्ता, चिरौंजी, शहद से जुड़ा जब सहकार।
तब वनवासी विकास के खुज गये सब द्वार।
कर्तव्यों से बदल जायेगी, इनकी भाग्य राषि ।
क्रान्ति के अग्रदूत बनेंगे, ये वीर आदिवासी।

ये वन मार्गों के निर्माता, वन के प्रहरी हैं।
प्रकृति जिनकी सहेली, गाथा उनकी गहरी है।
स्वावलम्बी हैं सदियों से, ये प्रगति के अभिलाषी।
अग्रणीय रहे हैं सदैव, साहित्य कहता इतिहासी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरकक, वन के वासी।
धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।

Dr. BhagChandra Jain is renowned author & famous scientist in field of Agriculture. Awarded by Central & State government ,Mr. Bhag is author of more than 1700+ articles published in various international journals,magazines & books.

Currently ,Dr. Jain is working as Professor in Indira Gandhi Agricultural University .

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