भारतीय आर्थिक नीतियां और कृषि

भारतीय आर्थिक नीतियां और कृषि bhagchandra.com

डॉ. भागचन्द्र जैन

प्राध्यापक कृषि अर्थशास्त्र प्रचार अधिकारी

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय,

रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती जा रही है, जिसका आकार 156 लाख करोड़ रूपये से अधिक है! सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्थाओं के क्रम में 7.4 प्रतिशत विकास दर के साथ भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि विश्व बैंक के अनुसार क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है ऐसा अनुमान लगाया गया है कि भारत की जनसंख्या लगभग 1.25 अरब हो चुकी है, जहां वर्ष 2015-16 में कृषि की विकास दर 1.1 प्रतिशत रही है, जबकि उद्योग की विकास की दर 3.9 प्रतिशत रही है ! भारतीय आर्थिक नीतियों में मुख्यतः विश्व व्यापार संगठन ( World Trade Organization) का समझौता, नई कृषि निति (New Agriculture Policy), विदेशी निवेश निति (Foreign Investment Policy) और आयात – निर्यात निति (Import – Export Policy) के अंतर्गत किये गये प्रयास शामिल किये गये है !

तालिका – 1 सकल घरेलू उत्पाद और उसके घटक

क्र.घटक2007-082014-15
1.कृषि और सहयोगी व्यवसाय4.91.4
2.खनिज और उत्खनन3.32.3
3.निर्मित उत्पाद8.28.4
4.विद्युत गैस एवं जल आपूर्ति5.34.2
5.निर्माण10.11.4
6.व्यापार होटल यातायात और संचार12.414.1
7.वित्त बीमा अचल संपत्ति और व्यवसाय सेवायें11.710.2
8.सामाजिक और व्यक्तिगत सेवायें6.80.1
9.कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद9.07.5

 

स्त्रोत : केंद्रीय सांरिव्यकि संगठन

(अ) विश्व व्यापार संगठन का समझौता

विश्व व्यापार समझौते के लिये वर्ष 1947 में इटली में पहला सम्मलेन हुआ था, जिसमे भारत सहित 23 देश शामिल हुये थे, जो की इस समझौते के संस्थापक देश थे ! वस्तुतः यह प्रस्ताव 125 देशों के लिये दस विकासशील और दस विकसित देशों ने मिलकर बनाया था, जिसका भारत भी एक सदस्य था ! इस समझौते में बौद्धिक सम्पदा का अधिकार, निर्यात, अनुदान और कृषि आधारित उद्योगों को शामिल किया गया है ! समझौते के अनुसार किसान अपना बीज बना सकते हैं, उसे बैंच सकते हैं तथा आदान – प्रदान कर सकते हैं ! जिन वस्तुओं के आयत से भारत के किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिल पाने का खतरा होगा, उन वस्तुओं के आयत पर शासन द्वारा कर लगाने का प्रावधान किया गया है, साथ ही शासन जिन वस्तुओं का निर्यात न करना चाहे, उनका इच्छानुसार निर्यात नहीं करेगा !

(ब) विश्व व्यापार संगठन और कृषि

विश्व व्यापार संगठन द्वारा किये गये समझौते में कृषि को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, जिसमे किये गये प्रावधान इस प्रकार है :

    • विश्व व्यापार संगठन का दीर्घकालीन उद्देश्य है – आधारभूत सुधार कार्यक्रम द्वारा उचित एवं बाजार उन्मुखी व्यापार व्यवस्था स्थापित करना !
    • विकासशील देश ऐसी कृषि नीतियों का अनुसरण कर सकते हैं, जो उनके विकासात्मक लक्ष्य में सहायक हों तथा गरीबी कम करने, खाद्य सुरक्षा तथा जीविकोपार्जन से सम्बंधित हों !
    • कृषि निर्यात अनुदान को समाप्त करना !
    • विकासशील और अल्प विकसित देशों को आवश्यकतानुसार लाभ देना !
    • समस्त देशों में निष्पक्ष, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और परस्पारिकता की निति का पालन करना !
    • सदस्य देशों के बीच आयात पर मात्रा को सीमित करने की प्रणाली को समाप्त करना !
    • जिंस के अनुसार शुल्क को सीमित करना !
    • व्यापार विकृत कृषि समर्थन को कम करना !

इस समझौते का लाभ उठाने के लिये सबसे पहले भारतीय कृषि को उत्पाद प्रतियोगिता का सामना करने के लिए सक्षम बनाना आवश्यक है ! विश्व व्यापार संगठन द्वारा अपने सदस्य देशों को बाजार निर्धारण, घरेलू समर्थन और निर्यात पर आर्थिक समर्थन हेतु प्रतिबध्द किया गया था, जिससे विश्व के कृषि बाजारों की समस्याओं के निराकरण हेतु प्रभावी कदम उठाये जा रहे है !

बाजार निर्धारण

खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा किये गये एक अध्ययन के अनुसार विश्व व्यापार समझौते के बाद निर्यात की मात्रा में मामूली सा परिवर्तन आया है ! समझौते में शुल्क की दरें ऊंची हैं – इसलिये विकासशील देशों का निर्यात रुक सा गया है ! अनाज शक्कर और दुग्ध उत्पादों की शुल्क दरें भी महंगी हैं ! समझौते के अनुसार केवल 36 शीर्ष देशों को यह अधिकार है कि यदि कृषि उत्पादों का आयात उनके घरेलू बाजार को नुकसान पहुंचाता है तो ये देश विशेष सुरक्षा के उपाय कर सकते हैं !

घरेलू सर्मथन

भारत के बारे में ऐसी धारणा बना ली गई है कि यहां का कुल समर्थन नहीं के बराबर है, इसलिये भारतीय किसानों को आर्थिक सहायता बढ़ायी जानी चाहिये, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ढांचागत समायोजन कार्यक्रम के अंतर्गत भारतीय किसानों का अनुदान समाप्त करना चाहता हैं ! वर्तमान में भारत के लगभग 55 करोड़ किसानों को केवल एक डॉलर की अप्रत्यक्ष आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाती है, ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि विकसित देशों में घरेलू आर्थिक सहायता में यदि कमी हो जाये तो कृषि उत्पादन विकसित देशों से हटकर विकासशील देशों में होने लगेगा, किन्तु गत् वर्षों के अनुभवों से प्रतीत होता है कि ऐसा नहीं हो पायेगा ! इतना ही नहीं आर्थिक सहायता मिलते रहने और मात्रात्मक प्रतिबन्ध हटाने से आयात बढ़ जायेगा !

डॉ. स्वामीनाथन की दृष्टि में समझौता

भारत में हरित क्रांति के सूत्रधार प्रसिध्द कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने विश्व व्यापार समझौते के बारे में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में कहा था कि विश्व व्यापार समझौते की शर्तों का खुलासा किया जाना चाहिये !

नई कृषि नीति

भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जिसका सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा घटता जा रहा है ! वर्ष 2000-01 में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 23.9 प्रतिशत था, जो की वर्ष 2013-14 में घटकर 13.9 प्रतिशत रह गया है ! भारत कृषि के क्षेत्र में विश्व में ‘आनुवंशिकी विभिन्नताओं का केंद्र’ है, जहां बाजार, एरण्ड, कपास, अरहर की संकर किस्में दुनिया में पहली बार विकसित की गई है ! भारत में हर विधा कृषि से जुड़ी हुई है, जहां 49 प्रतिशत जनता को इससे रोजगार मिलता है !

कृषि में बाजारू दृष्टिकोण होने के बावजूद भी आजकल कृषकों, ग्रामीणों विशेषकर युवकों की कृषि में कम रूचि दिखाई देने लगी है ! कृषि में पूंजी निवेश घटने लगा है ! राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के 59 वें सर्वेक्षण से ऐसी जानकारी मिली है कि भारत के 40 प्रतिशत किसान अब कोई और काम धंधा करना चाहते हैं ! भारतीय कृषि में खेतों का छोटा होना बाधक बना हुआ है, संयुक्त परिवारों में बटवारा होने से भूमि बटती जा रही है, जिससे छोटे किसानों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है !

आज का युग मशीनीकरण का युग कहलाता है, फिर भी भारतीय कृषि के अंदर यंत्रीकरण की परिधि में केवल 5 से 6 प्रतिशत क्षेत्र आ पाया है ! भारत में फल – सब्जी और दूध का भरपूर उत्पादन होता है, जिनका केवल दो प्रतिशत भाग प्रसंस्करित हो पाता है ! भण्डारण और अन्य सुविधाओं के अभाव में इनका 25 से 35 प्रतिशत तक हिस्सा खराब हो जाता है !

कृषि जलवायु की दृष्टि से सम्पूर्ण भारतवर्ष को 15 भागों में बांटा गया है ! इन भागों की विभिन्नताओं और उपयुक्तता के अनुसार फसल प्रणाली तथा कृषि कार्यमाला विकसित की जानी चाहिये ! नई कृषि नीति में कृषि विकास हेतु उठाये गये कदम इस प्रकार हैं !

  • कृषि में महत्वपूर्ण आदान सिंचाई है, इसलिये सिंचाई क्षेत्र में वृध्दि हेतु सूक्ष्म सिंचाई, उद्वहन सिंचाई, बून्द बून्द सिंचाई (Drip Irrigation) और छिड़काव सिंचाई (Sprinkler Irrigation) योजनायें चलायी जा रहीं हैं ! वर्तमान में 60 प्रतिशत से अधिक कृषि योग्य भूमि असिंचित या वर्षा जल पर निर्भर हैं, जहां सिंचाई सुविधा जुटाने की जरुरत है ! इसके अलावा वर्षा पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों में जलग्रहण प्रबंधन, वर्षा जल संग्रहण और भूजल पुर्नभरण (Recharging) द्वारा जल स्तर को बढ़ाया जा रहा है !
  • ऐसा अनुमान लगाया गया है कि 8 करोड़ हेक्टर कृषि भूमि को उपचार की जरुरत है !
  • वर्षा आधारित क्षेत्रों में उपयुक्त कृषि तकनीक अपनाने पर बल दिया जाये ! कृषि जलवायु के अनुसार ऐसी फसलों की खेती की जाये, जो फसल – चक्र और मिश्रित खेती की दृष्टि से उपयुक्त हो !
  • कृषि में जैविक खेती, मिश्रित खेती और पर्यावरण हितैषी पद्धतियों का समावेश किया जाये !
  • विभिन्न कृषि उत्पादों और जिंसों का बाजार से सम्बन्ध स्थापित किया जाये ! मांग के अनुरुप फसलों की खेती की जाये !

(स) विदेशी निवेश नीति

विश्व के विभिन्न देशों के साथ वर्ष 1991 तक भारत का आर्थिक एकीकरण सीमित था ! भारतीय निवेश नीति का सबसे पहले वर्ष 1992 में उदारीकरण किया गया, जिसकी प्रक्रिया को उदार बनाने का कार्य वर्ष 1995 में शुरू किया गया, जिसमें विदेशी निवेश सम्बन्धी कार्य भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय से भारतीय रिज़र्व बैंक को सौंपकर विस्तृत फ्रेमवर्क बनाया गया ! वर्ष 2000 में विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम लागू होने से विदेशों में निवेश के परिदृश्य में परिवर्तन आया ! वित्तीय वर्ष 2005-06 में शुरू किये गये अन्य उपायों से निर्यात और विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला है !

भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वव्यापी मंदी की चुनौतियों से निपटने के लिये शासन द्वारा मांग बढ़ाने, रोजगार सृजित करने के लिए विभिन्न कदम उठाये गये हैं, जिनका सकल घरेलू उत्पाद की वृध्दि दर पर अच्छा प्रभाव पड़ा है ! वर्ष 2005-06 से वर्ष 2008-09 की अवधि के दौरान विदेशी निवेश को बढ़ावा मिला है, जिससे वित्तीय सेवाओं के विनिर्माण, बैंकिंग सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं तथा निर्माण जैसी आर्थिक गतिविधियों के अंतप्रवाह में वृध्दि हुई है ! वर्ष 2005-06 में यह अंतप्रवाह 8.9 करोड़ अमरीकी डॉलर था, जो की वर्ष 2007-08 में 34.4 अरब अमरीकी डॉलर हो गया है ! यह युक्तिसंगत है कि सर्विस सेक्टर के विकास और विदेशी निवेश में वृध्दि से भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के सुधार का लाभ उठा सकता है ! विकसित देशों की मंदी से बाहर आने की प्रक्रिया धीमी है, जिसका लाभ भारत को मिल सकता है ! इस कथन की पुष्टि ‘आक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स’ ने सर्वेक्षण में की है !

(द) आयात निर्यात नीति

अति लघु और लघु उद्यमों को ऋण देने के लिये 4000 करोड़ रूपये की विशेष निधि प्रस्तावित की गई है, जीससे इन उद्यमों को रियायती ब्याज दर ऋण मिल सके !

व्यापार नीति में जरुरी वस्तुओं के आयात शुल्क को शासन द्वारा युक्तिसंगत बनाया गया है, जिसके अंतर्गत नवंबर 2008 से मक्खन और घी पर से सीमा शुल्क घटाकर 30 प्रतिशत किया गया और कच्चे गोंदयुक्त सोयाबीन तेल पर 20 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया ! अग्रिम प्राधिकार योजना के तहत शून्य शुल्क पर कच्ची शक्कर के आयात को अनुमति दी गई, जिसमें सरकारी अभिकरण 10 लाख टन तक सफेद शक्कर निशुल्क आयात कर सकेंगे ! विश्वव्यापी निर्यात में वस्तु वर्गीकरण और समूह के अनुसार भारत का हिस्सा वर्ष 1990 में 0.5 प्रतिशत था, जो कि वर्ष 2006 में बढ़कर 1.1 प्रतिशत हो गया ! वर्ष 1990 में विश्वव्यापी निर्यात 33,03,563 लाख अमरीकी डॉलर था, जिसमें भारत का निर्यात 18,143 लाख डॉलर था ! वर्ष 2006 में विश्वव्यापी निर्यात बढ़कर 1,18,87,549 लाख अमरीकी डॉलर हो गया, जिसमें भारतीय निर्यात 12,61,260 लाख अमरीकी डॉलर शामिल था !

विश्वव्यापी चुनौतियां

आर्थिक नीतियों में आये बदलाव और उदारीकरण की प्रक्रिया से भारतीय अर्थव्यवस्था को सम्बल अवश्य मिला है, किन्तु इस वर्ष के भीषण सूखे ने कृषि विकास को झकझोर दिया है ! विश्वव्यापी मंदी का असर उद्योगों पर भी पड़ा है ! कृषि से सर्वांगीण विकास को सार्थक बनाने के लिए भारत में अनुदान की राशि में वृध्दि की जरुरत है ! यह विडंबना है कि 21 विकसित देशों को कुल 250 बिलियन डॉलर वार्षिक अनुदान व्यापार हेतु दिया जाता है, जबकि शेष बचे हुये देशों को केवल 50 बिलियन डॉलर अनुदान दिया जाता है ! भारत में सकल घरेलू उत्पाद का 1.3 प्रतिशत अनुदान कृषि को दिया जाता है, जबकि विश्व व्यापार संगठन से पहले यह अनुदान 5 प्रतिशत था !

भारत विकासशील देश है, जिसे वर्ष 2020 तक विकसित राष्ट्र के रूप में देखने का लक्ष्य रखा गया है ! वैश्वीकरण और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में कृषि और अन्य व्यवसायों में गुणवत्तापूर्ण उत्पादों का उत्पादन आवश्यक है ! कृषि में व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाकर उसे बाजार से जोड़ना भी जरुरी है, ऐसा होने पर ही भारतीय आर्थिक नीतियों के प्रावधानों और अवसरों का लाभ मिल पायेगा तथा विश्वव्यापी चुनौतियों से सामना करने के लिये समक्ष हो सकेंगे !

भारत से निर्यात, वर्ष 2014-15

 

उत्पादमात्रा करोड़ टनमूल्य करोड़ रूपये
अनाज
बासमती चावल3.70227598
गैर बासमती चावल822520336
गेहूँ29144974
अन्य अनाज35105258
सब्जी20194611
फल4843148
मूंगफली7084675
अनाज निर्मित उत्पाद3063033

Dr. BhagChandra Jain is renowned author & famous scientist in field of Agriculture. Awarded by Central & State government ,Mr. Bhag is author of more than 1700+ articles published in various international journals,magazines & books.

Currently ,Dr. Jain is working as Professor in Indira Gandhi Agricultural University .

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