महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज

 

डाॅ. भागचन्द्र जैन

प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र), प्रचार अधिकारी,
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय रायपुर दृ 492012 ;छत्तीसगढ़)

 

 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत की आत्मा गांवों में बसती है।‘ गांवों की प्रगति से सबकी प्रगति जुड़ी है। भारत गांवों का देष है, जहां पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण है। बापू ने कल्पना की थी कि ग्राम राज से स्वराज का सपना साकार हो। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत गांवों में रहता है, नगरों में नहीं। यदि मुझे गांवों को निर्धनता से मुक्त करनें में सहायता मिल जाये तो मैं समझूंगा कि मैंने सारे भारत के लिए स्वराज प्राप्त कर लिया है। यदि गांव नष्ट होता है तो भारत भी नष्ट हो जायेगा।‘ गांधी जी ऐसे पहले दार्षनिक थे, जिन्होंने ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर विषेष बल दिया, उनके राजनैतिक जीवन और अहिंसात्मक दर्षन की ग्रामीण विकास ही आधार-षिला थी। उन्होंने अपने प्रारम्भिक जीवन से जीवन से ही ऐसे रचनात्मक कार्यों को अपनाया, जिनका सीधा सम्बन्ध जीवन को सरस, सम्पूर्ण तथा सुखी बनाना था। उनका कहना था कि भारत की आत्मा गांव है-इसलिए यदि गांव-गांव में नव जीवन और आषा का संवार नहीं होता, तो स्वराज बेकार है। रचनात्मक कार्यक्रम में निम्नांकित क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई थीः
1. साम्प्रदायिक एकता
2. अस्पृष्यता निवारण
3. मद्य निषेध
4. खादी का प्रचार
5. ग्रामीण उद्योगों का विकास
(क) गुड़ बनाना
(क) तेल निकालना
(क) धान कूटना
(क) बुनाई
(क) नीम का तेल निकालना
6. पषुधन विकास
7. बुनियादी षिक्षा
8. प्रौढ़ षिक्षा
9. ग्रामीण स्वच्छता
10. महिला विकास
11. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग उत्थान
12. स्थानीय साधनों से क्षेत्रीय विकास
13. हिन्दी को बढ़ावा
14. कृषक, श्रमिक तथा विद्यार्थियों के संगठन
15. प्राकृतिक चिकित्सा
16. आर्थिक विषमता दूर करना
17. स्वावलम्बी गांवों का निर्माण
18. श्रम में निष्ठा
इस प्रकार के व्यापक कार्यक्रम में गांवों के पुर्ननिर्माण और सर्वांगीण विकास की
छटा दिखायी देती थी। गांधी जी एक नये समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसमें विषमता न हो और जो शोषणमुक्त हो । ऐसा समाज तब बनेगा, जबकि गांवों की समस्याओं का निराकरण किया जाये। गांधी जी ने गांवों की समस्याओं का निराकरण भी किया, क्योंकि वे केवल आदर्षवाद में विष्वास नहीं करते थे, वे एक व्यावहारिक महा पुरूष थें। उन्होंने सेवाग्राम आश्रम द्वारा निकटवर्ती क्षेत्रों में यह कार्यक्रम लागू किया, जिसके कुछ ही दिनों में सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे।
महात्मा गांधी मानते थें कि अच्छा स्वास्थ्य समाज, परिवार और व्यक्ति तीनों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। देष की वास्तविक सम्पत्ति वहां के निवासियों का अच्छा स्वास्थ्य है। उन्होंने लिखा है कि ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के पष्चात् सबसे पहला कार्य देष में यह होगा कि प्रत्येक व्यक्ति को ठीक से रोटी तथा कपड़ा मिल सके।‘स्वस्थ और सुखी जीवन की यह प्राथमिक आवष्यकता है, परन्तु स्वस्थ जीवन के लिए वातावरण की स्वच्छता के महत्व को पीछे नही रखा जा सकता।ं देष में होने वाली बहुत कुछ बीमारियां गावों को साफ-सुथरा बनाकर सरलतापूर्वक कम की जा सकती है।
गांधी जी के सपनों का पंचायती राज
पंचायत य पंचायती राज का उददेष्य केवल अधिकार से व्यवस्था और प्रषासन चलाना नहीं है, वरन् व्यक्तियों को सामुदायिक विकास के लिए निरंतर चलने वाले कार्याें के विकास में लगाना है। महात्मा गांधी मानते थे कि आरम्भ में लोंगों को यह अनुभव होना चाहिए कि व्यक्तियों के हित में पंचायत कार्य कर रही है। ऐसी स्थिति मंे यदि अधिकारों का यथायोग्य ध्यान रख कर उपयोग होगा तो उससे क्षति नहीं होगी, वरन् गांव के स्वायत्त प्रषासन की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
पंचायत को अपनी प्रतिष्ठा स्थिर करने के लिए यह आवष्यक है कि वह उन कार्यों को प्राथमिकता दे, जिनका लोगों के जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध हो। इसमें गांव के व्यक्ति भी सहयेाग देंगे और धीरे-धीरे ऐसी ही अन्य जिम्मेदारियांे को बहन करने में वे सक्षम होगे। पंचायत का कार्य-क्षेत्र बढ़ता जायेगा और अन्त में यह सिद्व हो जायेगा कि पंचायते ऐसे कार्यों की जिम्मेदारी निभाने में उच्च स्तर की संस्थाओं से अच्छी हैं।
वैधानिक स्वरूप
पंचायत कानूनी अधिकार युक्त संस्था होनी चाहिए, साथ ही कानून ऐसा हो, जो समझने तथा समझाने मंे स्पष्ट हो, सरल हो।

सामान्यतया प्रत्येक उपयोगी कार्य के लिए कानून होना चाहिए, किन्तु यह कानून जटिल न हो।
ऽ पंचायत का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें स्वस्थ और उच्च-परम्पराओं का विकास हो।
ऽ इसमें लोकतांत्रिक कार्य प्रणाली उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितनी कि व्यवहारिक कार्य-विधि महत्वपूर्ण है।
ऽ अधिक महत्व के निर्णयों के लिए अधिक से अधिक व्यक्तियों की अनुमति लेनी चाहिए।
ऽ बहुमत के आधार पर महत्व के निर्णयों को मान लेने से पंचायत की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी, प्रतिष्ठा उससे बढ़ती है जहां समुदाय के सभी व्यक्ति एकमत हों।
ऽ यदि किसी कार्य को करने के लिए सभी व्यक्ति एकमत होते हैं तो वे सब मिलकर उसे पूरा करने का प्रयास करेंगे, जिससे सच्चे लोकतन्त्र की जड़ें मजबूत हांेगी।
आजादी के पहले पंचायतें
अंग्रेजों के शासन काल में शासक चाल्र्स मेटकाल्फ ने पंचायतों की सराहना करते हुये उन्हें ‘लद्यु गणराज्य‘ की संज्ञा दी, किन्तु बाद में बड़े-बड़े व्यक्तियों ने निर्माण और विकास कार्यों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। राॅयल आयोग ने वर्ष 1909 में अपने प्रतिवेदन में अनुषंसा की कि विकेंद्रीकरण के लिए ग्राम पंचायतों के माध्यम से व्यक्तियों को जोड़ा जाये। इसके बाद विभिन्न राज्यों द्वारा समय-समय पर पंचायत अधिनियम पारित किए गए, जिनमें ‘बंगाल ग्राम स्वषासन अधिनियम (1919), मद्रास-बाम्बे एवं सयुक्त प्रांत ग्राम पंचायत अधिनियम (1920), बिहार एवं उड़ीसा ग्राम प्रषासन अधिनियम, असम ग्राम स्वषासन अधिनियम (1926), पंजाब ग्राम पंचायत अधिनियम (1935), आदि प्रमुख हैं, ये अधिनियम ग्राम मुददों एवं ग्राम विकास की देखरेख पर आधारित थे। स्थानीय स्वषासन को गांव के छोटे मामलों के निपटानें का अधिकार था, किन्तु ये निकाय लोकतात्रिक नहीं थे, इनके वित्तीय संसाधन सीमित थे, ऐसी स्थिति वर्ष 1950 तक ज्यों की त्यों बनी रही।
आजादी के बाद पंचायतें
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस बात पर जोर दिया था कि स्वतंत्रता की शुरूआत सर्वप्रथम निम्न स्तर से होनी चाहिए, जिसमें प्रत्येक ग्राम एक पंचायत वाला गणराज्य (ग्राम स्वराज) होना चाहिए, इसमें पंचायत को सभी शक्तियां प्राप्त हों। जनता की भागीदारी सुनिष्चित करने के लिए वर्ष 1952 मं सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, किन्तु इस कार्यक्रम का लाभ ग्रामीण निर्धनों तक नहीं पहुंच पाया। इसकी वस्तु स्थिति की समीक्षा के लिए वर्ष 1957 में बलवंतराय मेहता समिति का गठन किया गया, जिसमें निर्वाचित स्थानीय निकायों की स्थापना और पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था की अनुषंसा की । वर्ष 1977 में राष्ट्रीय स्तर पर अषोक मेहता समिति का गठन किया गया, इस समिति का मानना था कि ग्रामीण भारत सभी विकासोन्मुखी कार्यक्रमों का आधार है। पंचायती राज की समीक्षा हेतु जी.वी.के. राव समिति, एल.एम. सिंघवी समिति, सरकारियां आयोग का गठन किया गया। वर्ष 1989 में भारत सरकार ने संविधान के भाग प्ग् में पंचायतों को शामिल करने के लिए 64 वां संविधान संषोधन विधेयक पेष किया, अंततः 20 अपै्रल 1993 को भारत के राष्ट्रपति ने इस पर अपनी स्वीकृति दी।
पंचायतों की भूमिका
पंचायतों को विभिन्न विकास गतिविधियों को शुरू करने के लिए पर्याप्त निधि उपलब्ध हों। प्रत्येक राज्य में 73 वें संषोधन अधिनियम- 1992 के अनुसार वित आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। आर्थिक कार्यक्रमों की योजना बनाने और उन्हंे लागू करने के लिए संषोधन अधिनियम पंचायतों को शक्तियां और जिम्मेदारियां देता है। ग्यारहवीं अनुसूची में कुल मिलाकर 29 गतिविधियां सूचीबद्व है। पंचायती राज संस्थाओं के लिए इन गतिविधियों को पांच श्रेणी में बांटा गया हैः

1. आर्थिक विकास:- ऐसे 11 मद हैं, जो आर्थिक विकास पर आधारित हैं, जिसमें शामिल हैः
(अ) निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम, जैसे एस.वाई., एस.जी.आर.वाई. आदि।
(ब) भू सुधार ।
(ग) लघु सिंचाई ,
(द) पषुपालन,
(इ) मत्स्य पालन,
(ई) सामाजिक वानिकी,
(फ) लघु वनोपज,
(ग) लघु एवं कुटीर उद्योग,
(ह) कृषि
(ज) ईंधन, चारा ।
2. षिक्षा – इसमें प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय, गैर- औपचारिक षिक्षा, पुस्तकालय, तकनीकी प्रषिक्षण एवं सांस्कृतिक कार्यकलाप शामिल है।
3. स्वास्थय – इसमें स्वास्थ्य एवं स्वच्छता और परिवार कल्याण शामिल है।
4. महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण – इसमें महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण, कमजोर वर्गोंं का कल्याण और सार्वजनिक वितरण शामिल हैं।
5. ढ़ाचागत विकास – इसमें सड़कें, आवासीय सुविधायें, पेय जल, बाजार, विद्युतीकरण, गैर परंपरागत – उर्जा स्त्रोत, सामुदायिक सम्पत्तियों का संरक्षण शामिल है।
महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज ‘ग्राम राज से स्वराज‘ पर आधारित है।
ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर उन्होंने जोर देते हुये अंिहंसात्मक दर्षन से ग्रामीण विकास की आधारषिला रखी थी। गांधी जी के आर्थिक समानता, षिक्षा, सामाजिक एकता पर केन्द्रित रचनात्मक कार्यक्रम से पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी थी, ऐसे में त्रिस्तरीय पंचायती राज में 29 गतिविधियां सूचीबद्व की गई हैं, जिनके प्रभावी क्रियान्वयन से पंचायतों से ग्रामीण विकास का सपना साकार होगा। पंचायतों को ग्रामीण विकास के व्यापक अधिकार दिये गये हैं, इन अधिकारों का क्रियान्वयन निष्पक्ष रूप से इस प्रकार किया जाये, जिससे ‘पंच परमेष्वर की भूमिका चरितार्थ हो सके। गांव में बेरोजगारी की समस्या न रहे, स्वास्थ्य सेवाएं घर-घर पहुंचे, विकास योजनाओं का लाभ योग्य हितग्राही तक पहुंचे।

11 वीं अनुसूची (अनुच्छेद 243 जी)
पंचायती राज का अभिप्राय ग्रामीण स्थानीय स्वषासन से है। पंचायती राज स्वराज को सार्थक करे, इसके लिए वर्ष 1002 में 73वें संविधान संषोधन अधिनियम संविधान में शामिल किया गया है। इस अधिनियम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला है। इस अधिनियम से संविधान में 11 वीं अनुसूची जुड़ गई है, जिसमें पंचायतों की 29 गतिविधियां सूचीबद्व है
1. कृषि (कृषि विस्तार सहित)।
2. भूमि विकास, भूमि सुधार, भूमि चकबंदी, भूमि संरक्षण
3. लद्यु सिंचाई, जल प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्र विकास।
4. पषुपालन, दुग्ध व्यवसाय तथा मुर्गी पालन।
5. मत्स्य पालन, सामाजिक वानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी।
6. लद्यु वनोपज।
7. लद्यु उद्योग (खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित)।
8. खादी, कुटीर एवं ग्रामोद्योग।
9. ग्रामीण आवास।
10. पेय जल।
11.र् इंंधन तथा पषु चारा।
12. सड़कों, पुलों, तटीय, जल मार्गों तथा अन्य संचार के साथ।
13. ग्रामीण विद्युती (विद्युत वितरण सहित)।
14. गैर परम्परागत ऊर्जा स़्त्रोत।
15. गरीबी उन्मूलन काय्रक्रम।
16. षिक्षा (प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय सहित )।
17. तकनीकी प्रषिक्षण एवं व्यवसायिक षिक्षा।
18. व्यस्क एवं गैर व्यस्क औपचारिक षिक्षा।
19. पुस्तकालय।
20. सांस्कृतिक गतिविधियां।
21. बाजार एवं मेले।
22. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं (चिकित्सालय प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र्र तथा औषधालय)।
23. परिवार कल्याण।
24. महिला एवं बाल विकास।
25. सामाजिक कल्याण (विकलांग व मानसिक रोगी का कल्याण)
26. कमजोर वर्ग (विषेषकर अनुसूचित जाति अनुसूचित जन जाति)।
27. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
28. समुदायिक सम्पत्ति की देखरेख ।
संविधान के 40 वें अनुच्छेद में इस अधिनियम से व्यवहारिक रूप दिया गया है जिसके अनुसार ‘‘ग्राम पंचायतों को गठित करने के लिए राज्य कदम उठाएगा और उन्हें उन आवष्यक शक्तियों और अधिकारों से विभूषित करेगा, जिसमें िकवे स्वषासन की इकाई की तरह कार्य करने में सक्षम हों। यह अनुच्छेद राज्य की नीति के निर्देषक सिद्वांतों का एक हिस्सा है।‘‘ 73 वें संविधान संषोधन अधिनियम में अनिवार्य एवं एच्छिक प्रावधानों को शामिल किया गया है।
(अ) अनिवार्य प्रावधान
1. एक गांव या गांवों के समूह में ग्राम सभा का गठन
2. ग्राम जनपद और जिला स्तर पर पंचायतों की स्थापना।
3. तीनों स्तरों पर सभी सीटों के लिए पं्रत्यक्ष चुनाव।
4. जनपद (ठसवबा) और जिला (क्पेजतपबज) स्तर के प्रमुख के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव।
5. पंचायतों में चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष।
6. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति वर्ग का आरक्षण।
7. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए एक तिहाई महिला आरक्षण।
8. त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष है। किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्ति के बाद 6 माह की अवधि के भीतर नये चुनाव का प्रावधान है।
9. पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना।
10. पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित आयोग की स्थापना।
(ब) एच्छिक प्रावधान
1. विधानसभा एवं लोक सभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायती राज संस्थाओं में लोक सभा और विधानसभा के प्रतिनिधियों को शामिल करना।
2. त्रिस्तरीय पंचायतों में किसी भी स्तर पर सदस्यों एवं प्रमुख के लिए पिछड़े वर्ग का आरक्षण ।
3. स्थानीय सरकार के रूप में कार्य करने के लिए पंचायतों को अधिकार एवं शक्तियां देना।
4. सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास के लिए पंचायतों को योेजना बनाने अधिकार एवं शक्तियां देना तथा 11 वीं अनुसूची के 29 कार्यों में से सभी या कुछ कार्यों को सम्पन्न करना।
5. पंचायतों को विषेष अधिकार देना, उन्हें पथकर, शुल्क आदि लगाने के लिए अधिकार देना।

Dr. BhagChandra Jain is renowned author & famous scientist in field of Agriculture. Awarded by Central & State government ,Mr. Bhag is author of more than 1700+ articles published in various international journals,magazines & books.

Currently ,Dr. Jain is working as Professor in Indira Gandhi Agricultural University .

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वीतराता की प्रतिरूप-आचार्य विद्यासागर

वीतराता की प्रतिरूप-आचार्य विद्यासागर

प्रसंगवश 

Mahavir-Swami-Bhagwan-24th-Tirthankar-of-Jains

परम तपस्वी, बहुभाषाविद, पंचमकाल में चतुर्थकालीन चरित्रधारी, छोटे बाबा के नाम से आराध्य, अद्वितीय धर्म प्रभावक, सर्वोदयी संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महराज विश्व की विरल विभूति. वीतरागता के प्रतिरूप है। चलते फिरते तीर्थ है, वे जहां विहार करते है, चातुर्मास करते है वहा धरती पावन हो जाती है। आचार्य श्री विद्यासागर जी महराज के चातुर्मास का सानिध्य सोनी की नशिय, केशरगंज, किशनगढ़, मदनगंज, नसीराबाद (जिला अजमेर), रेनवाल (जयपुर), फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश), कुण्डलपुर, नैनागिर, थूवोनजी, मुक्तागिरी, जबलपुर, आहार जी, पपोरा जी, नेमावार, सागर, गोम्टगिरी, अमरकंटक, बीना बारहा,(मध्यप्रदेश), रामटेके (नागपुर), महुआ (गुजरात), डोगरगढ़ (छत्तीसगढ़), और दुसरी (गिरीडीह), जैसे स्थानों को मिला चुका है, जिनके आर्शीवाद से धार्मिक प्रभावना देश ही नही अपुति विदेशों तक पहुंची है। छत्तीसगढ़ में पहला श्रीमाद जिनेन्द्र पंचकल्याणक एंव गजरथ महोत्सव दुर्ग में फरवरी 2012 में आयोजित हुआ था, इस अद्वितीय आयोजन में आचार्य श्री का संसघ आर्शीवाद मिला था. शरण पूर्णिमा (10 अक्टूबर 1946) को कार्नाटक प्रांत के बेलगांव जिले के सदलगा की धरती धन्य हो गयी, जब माता श्रीमती अष्टगे ने अद्भुत ज्ञान के सागर, आगम के प्रकाण्ड विद्वान, काव्य प्रतिभा के पयोनिधि, उदारता वात्सल्य की प्रतिमूर्ती बालक विद्याधर को जन्म दिया। धर्म-प्रमी, परोपकारी, करूणा के धनी श्री मल्लपा जी अष्टगेको इनके पिता बनने का भाग प्राप्त हुआ. बाल्यकाल में इन्हें पीलू, मरी, गिनी आदि नामों से संबोधित किया जाता था। इनके बड़े भाई का नाम श्री महावीर प्रसाद जी है और छोटे भाई द्वय श्री अनन्त नाथ जी एंव शांतिनाथ जी है- जो वर्तमान में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सघ में क्रमशः श्री 108 श्री मुनि योगसागर जी एंव श्री 108 श्री समयसागर जी के नाम से तपस्यारत है और जन-जन का कल्याण कर रहे है. आचार्य श्री के पूज्य पिता श्री मल्लपा ली और पूज्य माता ने आचार्य श्री धर्मसागर जी महराज से क्रमशः मुनि दीक्षा और आर्यिका दीक्षा लेकर सांसारिक बंधनो से मुक्ति ले ली थी और मोक्ष मार्ग का रास्ता अपना लिया था. इनकी दोनो बहने सुवर्णा और शांता भी मोक्ष मार्ग पर अग्रसर है, यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के वर्ष 2011 वर्ष 2012 में श्री दिगम्बर जैन तीर्थ, चन्द्रगिरी डोगरगढ़ (छत्तीसगढ़) में चातुर्मास हो चुके है इस तीर्थ पर नलकूप खनन में पानी नही निकल रहा था जहां आचार्य श्री के आर्शाीवाद से पानी आ गया था. लगभग 3 वर्ष दशक पहले आचार्य श्री का रायपुर आगमन हुआ था, श्री सकल दिगम्बर जैन समाज, रायपुर द्वारा आचार्य श्री के रायपुर आगमन हेतु बार-बार विनती की जाती रही है. संत शिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का 28 फरवरी को रायपुर प्रवेश हुआ. वे चलते फिरते तीर्थ है। वीतरागता के प्रतिरूप है।

-प्रो. डाॅं. भागचन्द्र जैन

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी 

महावीर दर्शन की मुल धुरी अहिंसा है जियो और जीने दो का उद्घोष भगवान महावीर ने किया था. मन वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है. अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है. भगवान महावीर के विश्व बंधुत्व संदेश से उनकी तपस्या से जन-जन में आत्मीय और दया की भावना सजीव हो गई थी.

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी

अहिंसा परमोधर्मः अर्थात अहिंसा ही परम धर्म है. अहिंसा को केन्द्र मानकर भगवान महावीर ने सत्य अस्तेय, अपरिग्रह संभव है. अहिंसा से विश्व की शांति जुड़ी हुई है. मानव ही नही प्रत्येक जीव का कल्याण अहिंसा पर केद्रित है. भारत में सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना विहार के वैशाली राज्य में हुई थी. इस राज्य के प्रमुख महराज चेटक थे, जिनके भनेज के रूप में महावीर का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को ईसा से 599 वर्ष पहले कुण्डल पुर नगर में हुआ था. नालंदा जिले में स्थित इस कुण्डलपुर नगरी के कण-कण में महावीर के जन्म की पवित्रता आज भी विद्यमान है, इसलिए यहां की रज प्राप्त करने के लिए देश विदेश से जैन धर्मावलंबी कुण्डलपुर पहुंचते है. और कुण्डलपुर अवतारी, त्रिशलानंद विभो आदि संबोधन से भगवान महावीर की आरती उतारते ह. सिद्धार्थ के सोने के महल ष् नद्यावर्त ष् में महावीर का जन्म हुआ था, जिसका प्रतिरूप आज भी उसके पालने और जीवन संबंधी प्राचीन कलाकृतियों को सचित्र दर्शाता है. नद्यावर्त महल के आंगन में धन कुबेर द्वारा रत्नांे की वर्षा की गई थी. महावीर के जन्म के पूर्व माता त्रिशाला को सोहल स्वप्न आये थे, जिनका फल माता ने महाराज सिद्धार्थ से पूछा था. संजय-विजय महामुनी ने बालक वर्धमान का नाम रखा. संगमेदव को वर्धमान का नाम ष् महावीर ष् रखा. वे कर्म को जीतने से ष् वीर ष् धर्म उपदेश देने से ष् सन्मति ष् और उपसर्गों के सहन करने से महावीर कहलाये. 2600 वर्ष बीत जाने के बाद भी कुण्डलपुर के नद्यावर्त महल में महावीर के नामकरण , स्वर्ग से देवों द्वारा लाये गये वस्त्रों-अलंकारों का वर्धमान द्वारा पहनना, देवगणों द्वारा उनके लिए भोजन लाना, उद्यान में सर्प के फन पर उनका खेलना , संगीत सभा और सभा में पुछे गये प्रश्नो के उत्तर देते हुए महावीर की अभिनव प्रस्तुति सबका मन मोह लेती है. भगवान महावीर ने बाल्यकाल मे कठिन तपस्या के लिए वन में गमन किया , जिन्हे आहार देने के कारण चंदना सती हुई और संसार में पसिद्ध हुई. भगवान महावीर का पहला सातवां और नौवा चर्तुमास कुण्डलपुर में हुआ था. कठोर तपस्या के बाद उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा अपनी इद्रियों पर विजय प्राप्त की. त्याग पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए उन्होने अपूर्व साहस और मनोबल का परिचय दिया. अंत में वो पावापुरी पहुंचे, जहां मनोहर नामक वन में पहुंचकर आत्म ध्यान करने लगे. कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को 72 वर्ष की उर्म में उन्होने मो़क्ष प्राप्त किया. उनके साथ 26 मुनी मोक्ष गये. निर्वाण भूमि पावापुरी मे पद्म सरोवर के मध्य में जल मंदिर बना हुआ है कि यहां भगवान महावीर का निर्वाण होने पर उनका अंतिम संस्कार देवताओं ने किया था. पावापुरी की भूमि इतनी पावन है कि यहां से धर्मावलंबी मिट्टी ले जाते रहे है, जिसके कारण 1459 फुट लंबे और 1223 चैडे़ पद्म सेरोवर का निर्माण हो गया. महावीर दर्शन की मुल धुरी अहिंसा है. जियो और जीने दो का उद्घोष भगवान महावीर ने किया था. मन वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है. अहिंसा का यर्ह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है भगवान महावीर के विश्व बंधुत्व संदेश से, उनकी तपस्या से जन-जन में आत्यमीय और दया की भावना सजीव हो गई थी. सच से बड़ा कोई धर्म नही होता और झुठ से बड़ा पाप नही, इसलिए मन वचन और कर्म द्वारा सत्य का पालन करना चाहिए. दुसरो पर शासन मत करो अपने शरीर पर अपने वाणी पर, अपने मन पर. सभी प्रकार की वासनाओं को त्याग कर संयमी जीवन व्यतीत करना चाहिए. महावीर ने अपने उपदेशो में आत्म अनुसंधान पर विशेष बल दिया है. आत्मशुद्धि साधनं धर्मः आत्मा की शुद्धि का साधन ही धर्म है. आज की विषम परिस्थितियों में भी महावीर स्वामी के उपदेश प्रत्येक मानव को सुख शांति प्रदान कर सकते है, अखिल विश्व के स्वामी अनंत गुणों के सागर, धर्मरूपी चक्र के धारक भगवान महावीर की स्तुति महावीर पुराण में इस प्रकार की गई है –

सागर अतुलित गुणों के,
सर्वमान्य अखिलेश।
धर्मचक्र धारी महा,
बन्दो वीर जिनेश ।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
प्रचार अधिकारी
कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

धान के कटोरा छत्तीसगढ़

धान के कटोरा छत्तीसगढ़

“धान के कटोरा में “

 farmer_66fb66b9-32ef-11e5-a8da-005056b4648eहे किसान, देश की शान, हमारा देश कृषि प्रधान।

कौशल्य की जन्म भूमि में छिपी छत्तीसगढ़ की शान।।
धान का कटोरा प्रगतिशील है, शुष्क खेती प्रधान।
जहां महानदी-इन्द्रावती-शिवनाथ की महिमा महान ।।

प्राकृतिक सम्पदा का धनी है छत्तीसगढ़ प्यारा।
भिलाई-कोरबा-बैलाडीला देश-प्रदेश में न्यारा।।
सदियो कि संस्कृति लिये हुये है वन के वासी।
भोले भाले , कठिन परिश्रमी, आदि पुरूष आदिवासी।।

छत्तीसगढ़ के सर्वक्षण से मिला कृषि समाचार।
कन्हार, डोरसा, मटासी, भाटा भूमि का अघिकाार।।
कहीं गोबर की खाद जरूरी और भूमि उपचार।
यहां कि भूमि कर रही परिश्रम का इंतजार।।

जियो और जीने दो के उद्घोष भगवान महावीर

जियो और जीने दो के उद्घोष भगवान महावीर

जियो और जीने दो के उद्घोष भगवान महावीर

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी है-जियो और जीने दो का उद्घोष महावीर स्वामी ने किया था. मन वचन और कार्य से किसी जीव को संताप न पहुंचाना की सच्ची अहिंसा है। अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्पारा का विशिष्ट देन है। अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है। महावीर स्वामी के विश्व बधुत्व संदेश से, उनकी तपस्या से जन-जन में आत्मीयता और दया की भावना संजीव हो गई थी। सच से बड़ा कोई धर्म नही और झुठ से बड़ा पाप नही, इसलिए मन वचन और कर्म द्वारा सत्य का पालन करना चाहिए।

स्वयं जियो औरों को भी जीने दो प्रत्येक प्राणी जीना चाहता है, मरना नही- अतः प्राणी मात्र की हिंसा मत करो हिंसा में अधर्म, आत्म पतन होता है और अहिंसा में आत्म उत्थान होता है। असत्य बोलने का त्याग करना सौ सत्य धर्म के बराबर है. सभी दुख हिंसा से उत्पन्न होते है। ब्रम्हचर्य मोक्ष का सोपान होता है। इच्छा रहित होना अपरिग्रह है. भगवान महावीर के एैसे उपदेश आत्मा को परमात्मा से जोड़ने और विश्व शांति स्थापित करने में आज अधिक प्रासंगिक है।

अहिंसा परमोधर्माः आर्थात अहिंसा ही परम धर्म है। अहिंसा को केन्द्र मानकर भगवान महावीर ने सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रम्हचर्य जैसे महाव्रतों का उपदेश दिया था। अहिंसा से सत्य जुड़ा है. अहिंसा से ही अपरिग्रह संभव है। अहिंसा से विश्व शांति जुड़ी है। मानव ही नही प्रत्येक जीव का कल्याण अहिंसा पर आधारित है।

भारत में सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना बिहार के वैशाली राज्य में हुई थी। इस राज्य के प्रमुख महराज चेटक थे,जिनके भनेज के रूप में महावीर का जन्म ईसा ईसा के 599 पहले कुण्डलपुर नगर के सोने के महल नद्यावर्त में हुआ था। माता त्रिशाला को यहां सोहल स्वप्न आये थे,जिनका फल माता ने महराज सिद्धार्थ से पुछा था। नालंदा जिले में स्थित इस कुण्डलपुर नगरी के कण-कण में महावीर के जन्म की पवि़त्रता आज भी विद्यमान है- इसलिए यहां के रज प्राप्ति करने के लिए देश विदेश से धर्मानुरागी कुण्डलपुर पहुंचते है।

पांच-महाव्रत
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को बड़े धुम-धाम से महावीर जयंती मानई जाती है. महावीर स्वामी ने कहा था मनुष्य जन्म से नही कर्म से महान बनता है। उनके सिद्धांत आज अधिक प्रासंगिक है- जिनके अहिंसा सत्य, अचैर्य, अपरिग्रह और ब्रम्हचर्य पर केन्द्रित उपदेशों में अकेेले मानव ही नही अपितु प्रत्येक प्राणी का हित छुपा है। अहिंसा महावीर दर्शन की मुल धुरी है. जियो और जीने दो का उद्घोष महावीर स्वामी ने किया था। मन वचन और कार्य से किसी जीव को संताप न पहुुंचाना ही सच्ची अहिंसा है। अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्परा कि विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाईचारा कायम रह सकता है महावीर स्वामी के विश्व बधुत्व संदेश से, उनकी तपस्या से जन-जन में दया और आत्मीयता की भावना सजीव हो गई थी। सांच से बड़ा कोई धर्म नही होता है और झुठ से बड़ा पाप नही, इसलिए मन, वचन और कर्म द्वारा सत्य का पालन करना चाहिए। आज रोग द्वेष और झुठ का बोलबाला है। अचैर्य अर्थात चोरी होता है, इस दुषित प्रवृति से छुटकारा पाने के लिए महावीर स्वामी ने अनेकांतवाद का उपदेश दिया था। महावीर स्वामी ने कहा था आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह नही करना चाहिए भारत की जनसंख्या बढ़ती जा रही है, जिसें मुलभुत साधनो जैसे- आहार, वस्त्र और आवास की उपलब्धता होना जरूरी है। कोई भी व्यक्ति यदि जरूरत से अधिक इन आवश्यकताओं का संग्रह करता है तो दुसरे व्यक्ति इनसे वंचित रह जाते है-इसलिए सग्रह अनुचित है। दुसरो पर शासन मत करो, शासन करो अपने शरीर पर, अपनी वाणी पर, अपने मन पर सभी प्रकार की भावनाओं को त्यागकर संयमी जीवन व्यतीत करना चाहिए। महावीर स्वामी ने बाल्याकाल में कठिन तपस्या के लिए वन गमन किया जिन्हें आहार देने के कारण चंदना सती हुई और संसार में प्रसिद्ध हुई, जिन्होने केवल ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष देने वाले जैन धर्म का प्रचार किया. वे कर्म को जीतने से वीर धर्म उपदेश देने से सन्मति और उपसर्गो को सहन करने से महावीर कहलायेगें।

कठोर तपस्या के बाद महावीर स्वामी को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई, उन्होने अपने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की। उन्होने अपूर्व साहस व मनेबल का परिचय दिया था। अंत में वे पावापुरी पहुंचे, जहां मनोहर नामक वन में पहुंचकर आत्म ध्यान करने लगे। उन्होेंने 72 वर्ष की उर्म में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मोक्ष प्राप्त किया. महावीर स्वामी की निर्वाण भूमि पावापुरी है। जहां पद्म सरोवर के मध्य में जल मंदिर बना हुआ है. एैसा माना जाता है की यहां महावीर यहां महावीर स्वामी का अंतिम संस्कार हुआ था।

आज कि विषम परिस्थितियों में भी महावीर स्वामी के उपदेश प्रत्येक मानव को सुख-शांति प्रदान कर सकते है, उनके संदेश ह्दय को प्रभावी ढंग से स्पर्श करते ह। अखिल विश्व के स्वामी,अनंत गुणो के सागर, धर्मरूपी चक्र के धारक भगवान महावीर की स्तुती महावीर पुराण में इस प्रकार की गई है-

सागर अतुलित गुणों के,
सर्वमान्य अखिलेश।
धर्मचक्र धारी महा,
बन्दो वीर जिनेश।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
प्रचार अधिकारी
कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

 

जन्म से नही कर्म से महान

जन्म से नही कर्म से महान

जन्म से नही कर्म से महान

धर्म-दर्शन
डाॅं. भागचन्द्र जैन

मनुष्य जन्म से नही कर्म से महान बनता है – महावीर स्वामी के सिद्वांत आज अधिक प्रासंगिक है- जिनके अहिंसा, सत्य, अचैर्य अपरिग्रह और बम्हचर्य पर केंद्रित उपदेशो में अकेले मानव ही नही अपितु प्रत्येक प्राणी का हित छिपा है.

महावीर दर्शन की मूल धुरी अहिंसा है. ष् जियो और जीने दो ष् का उद्घोष महावीर स्वामी ने किया था. मन वचन और कार्य से किसी जीव संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है। अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है। विश्व में अहिंसा से ही शांति भाई-चारा कायम रह सकता है। आज शोशण उत्पीड़न, अप्रमाणिक माप-तौल व्यपार, जमीन जायजाद जैसी दुष्प्रवृत्तियां पनप रही है। इस स्थति में अहिंसा ही सबसे कारगार उपाय है। इसके अतिरिक्त सत्य अचैर्य अपरिग्रह, ब्रम्हचर्य जैन धर्म में शामिल है। कठोर तपस्या के बाद महावीर स्वामी को कैवल्य की प्राप्ति हुई, उन्होने अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की। उन्होने अपूर्व साहस और मनोबल का परिचय दिया था। अंत में वे पावापुरी पहुंचे, जहां मनोहर नामक वन में पहुंचकर आत्म ध्यान करने लगे। उन्होने 72 वर्ष की उम्र में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मोक्ष प्राप्त किया।

महावीर स्वामी की निर्माण भूमि पावापुरी है, जहां पद्म सरोवर के मध्य मे जल मंदिर बना हुआ है, एैसा माना जाता है कि यहां महावीर स्वामी का अंतिम सस्कार हुआ था, यह भूमि इतनी पावन है कि वहां से धर्मावलंबी मिट्टी ले जाते रहें, जिसके कारण 1459 फुट लंबे और 1223 फुट चैडे़ पद्म सरोवर का निर्माण हुआ।

भागवान महावीर के उपदेश आज कि विषम परिस्थितियों में प्रत्येक मानव को सुख शांति प्रदान कर सकते है। उनके संदेश प्रभावी ढंग से ह्दय को स्पर्श करते है। अखिल विश्व के स्वामी, अनंत गुणों के सागर भागवान महावीर की स्तुति महावीर पुराण में इस प्रकार की गई है-

सगर अतुलित गुणों के,
सर्वमान्य अखिलेश।
धर्मचक्र धारी महा ,
बंदो वीर जिनेश।।

 

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी

महावीर दर्शन की मुल धुरी अहिंसा है. जियो और जीने दो का उद्घोष भगवान महावीर ने किया था. मन वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है. अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है. भगवान महावीर के विश्व बंधुत्व संदेश से उनकी तपस्या से जन-जन में आत्मीय और दया की भावना सजीव हो गई थी.

अहिंसा परमोधर्मः अर्थात अहिंसा ही परम धर्म है. अहिंसा को केन्द्र मानकर भगवान महावीर ने सत्य अस्तेय, अपरिग्रह संभव है. अहिंसा से विश्व की शांति जुड़ी हुई है. मानव ही नही प्रत्येक जीव का कल्याण अहिंसा पर केद्रित है. भारत में सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना विहार के वैशाली राज्य में हुई थी. इस राज्य के प्रमुख महराज चेटक थे, जिनके भनेज के रूप में महावीर का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को ईसा से 599 वर्ष पहले कुण्डल पुर नगर में हुआ था. नालंदा जिले में स्थित इस कुण्डलपुर नगरी के कण-कण में महावीर के जन्म की पवित्रता आज भी विद्यमान है, इसलिए यहां की रज प्राप्त करने के लिए देश विदेश से जैन धर्मावलंबी कुण्डलपुर पहुंचते है. और कुण्डलपुर अवतारी, त्रिशलानंद विभो आदि संबोधन से भगवान महावीर की आरती उतारते ह. सिद्धार्थ के सोने के महल ष् नद्यावर्त ष् में महावीर का जन्म हुआ था, जिसका प्रतिरूप आज भी उसके पालने और जीवन संबंधी प्राचीन कलाकृतियों को सचित्र दर्शाता है. नद्यावर्त महल के आंगन में धन कुबेर द्वारा रत्नांे की वर्षा की गई थी. महावीर के जन्म के पूर्व माता त्रिशाला को सोहल स्वप्न आये थे, जिनका फल माता ने महाराज सिद्धार्थ से पूछा था. संजय-विजय महामुनी ने बालक वर्धमान का नाम रखा. संगमेदव को वर्धमान का नाम ष् महावीर ष् रखा. वे कर्म को जीतने से ष् वीर ष् धर्म उपदेश देने से ष् सन्मति ष् और उपसर्गों के सहन करने से महावीर कहलाये. 2600 वर्ष बीत जाने के बाद भी कुण्डलपुर के नद्यावर्त महल में महावीर के नामकरण , स्वर्ग से देवों द्वारा लाये गये वस्त्रों-अलंकारों का वर्धमान द्वारा पहनना, देवगणों द्वारा उनके लिए भोजन लाना, उद्यान में सर्प के फन पर उनका खेलना , संगीत सभा और सभा में पुछे गये प्रश्नो के उत्तर देते हुए महावीर की अभिनव प्रस्तुति सबका मन मोह लेती है. भगवान महावीर ने बाल्यकाल मे कठिन तपस्या के लिए वन में गमन किया , जिन्हे आहार देने के कारण चंदना सती हुई और संसार में पसिद्ध हुई. भगवान महावीर का पहला सातवां और नौवा चर्तुमास कुण्डलपुर में हुआ था. कठोर तपस्या के बाद उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा अपनी इद्रियों पर विजय प्राप्त की. त्याग पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए उन्होने अपूर्व साहस और मनोबल का परिचय दिया. अंत में वो पावापुरी पहुंचे, जहां मनोहर नामक वन में पहुंचकर आत्म ध्यान करने लगे. कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को 72 वर्ष की उर्म में उन्होने मो़क्ष प्राप्त किया. उनके साथ 26 मुनी मोक्ष गये. निर्वाण भूमि पावापुरी मे पद्म सरोवर के मध्य में जल मंदिर बना हुआ है कि यहां भगवान महावीर का निर्वाण होने पर उनका अंतिम संस्कार देवताओं ने किया था. पावापुरी की भूमि इतनी पावन है कि यहां से धर्मावलंबी मिट्टी ले जाते रहे है, जिसके कारण 1459 फुट लंबे और 1223 चैडे़ पद्म सेरोवर का निर्माण हो गया. महावीर दर्शन की मुल धुरी अहिंसा है. जियो और जीने दो का उद्घोष भगवान महावीर ने किया था. मन वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है. अहिंसा का यर्ह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है भगवान महावीर के विश्व बंधुत्व संदेश से, उनकी तपस्या से जन-जन में आत्यमीय और दया की भावना सजीव हो गई थी. सच से बड़ा कोई धर्म नही होता और झुठ से बड़ा पाप नही, इसलिए मन वचन और कर्म द्वारा सत्य का पालन करना चाहिए. दुसरो पर शासन मत करो अपने शरीर पर अपने वाणी पर, अपने मन पर. सभी प्रकार की वासनाओं को त्याग कर संयमी जीवन व्यतीत करना चाहिए. महावीर ने अपने उपदेशो में आत्म अनुसंधान पर विशेष बल दिया है. आत्मशुद्धि साधनं धर्मः। आत्मा की शुद्धि का साधन ही धर्म है. आज की विषम परिस्थितियों में भी महावीर स्वामी के उपदेश प्रत्येक मानव को सुख शांति प्रदान कर सकते है, अखिल विश्व के स्वामी अनंत गुणों के सागर, धर्मरूपी चक्र के धारक भगवान महावीर की स्तुति महावीर पुराण में इस प्रकार की गई है –

सागर अतुलित गुणों के,
सर्वमान्य अखिलेश।
धर्मचक्र धारी महा,
बन्दो वीर जिनेश ।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
प्रचार अधिकारी
कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष-2012

अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष-2012

सहकारिता की महिमा लिखी है, ऋृगवे – अर्थर्ववेद में ।
इसमें सब कुछ दिखता है, इन्द्र धनुष रंगों के भेद में ।।
प्रगति की पौ बारह होगी 2012 में, सहकारिता अपनाओं ।
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ।।

भारत के गांवों में विश्व का सबसे बड़ा सहकारी नेटवर्क ।
जन आंदोलन यह, जो मिटा रहा अमीरी-गरीबी का फर्क ।।
समानता और खुशहाली के लिए सहकारिता अपनाओ।
विश्व मेे मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ।।

अनेकता में एकता में शोभित है, प्यारा हमारा भारत देश ।
सब एक के लिए एक सबके लिए मै सहकारिता विशेष ।।
यत्र तत्र सर्वत्र विकास के लिए, सहकारिता अपनाओ ।
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता दिवस, तुम भी मनाओ ।।

कृषि, दुग्घ, सिंचाई आवास आदि में इसका सहारा ।
साख से साख यह बढ़ाये, बने बचत का आधारा ।।
विश्व व्यापीकरण के इस दौर में, सहकारिता अपनाओ ।
विश्व में मानाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ।।

सर्व सम्पन्न हो दुनिया सारी, प्रगति है वरदान सहकारी ।
सहकारी पथ पर बढ़ते जाओं, हर क्षेत्र में सफलता पाओ ।।
घर में, बाहर में, गांव-गांव में, तुम सहकारिता अपनाओ ।
विश्व मेें मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)प्रचार अधिकारी
कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

 

अंतर्राष्ट्रीय प्रकाश वर्ष – 2015

 

इघर-उघर सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश।
प्रकाश से हम सब , प्रकाश से विकास।।
सचमुच प्रकाश पुंज है हमारी आत्मा।
जुड़ा है जिससे भगवान – परमात्मा।।
मसाल लो आगे बढ़ो, ज्योति जलाओ।
अंतराष्ट्रीय प्रकाश वर्ष 2015 मनाओ।।  

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने किया आव्हान।
2015 को प्रकाश वर्ष मनाओ, करो कल्याण।।
क्योंकि प्रकाश से पेड़ पौधे और पशुधन।
जीव जन्तु इससे जुड़ा है मानव का जीवन।।
गांवों-नगरों में, घर-घर में खुशियां लाओ।
अंतराष्ट्रीय प्रकाश वर्ष 2015 मनाओ।।

प्रकाश से दूर अंधकार, बनते उर्जावान।
प्रकाश संशलेषण से फसलों में नई जान।।
वंदनीय है ज्योती और दीप प्रज्वलन।
प्रकाश से नियमित दिनचर्या, समृद्व जीवन।।
रोको मत प्रकाश को चहुंओर प्रकाश फैलाओ।
अंतराष्ट्रीय प्रकाश वर्ष 2015 मनाओ।।

प्रेरक देववाणी है – तमसो मा ज्योतिर्गमया।
मिट जायेगा प्रकाश से अंघकार का भय।।
लोक-परलोक से जुड़ो, जोड़ो, जुड़़ते जाओ।
देश – विदेश में सफलता का परचम लहराओ।।
घर-घर में शिक्षा का अलक्ष जगओ।
अंतराष्ट्रीय प्रकाश वर्ष 2015 मनाओ।।

          डाॅं. भागचन्द्र जैन प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)

          कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

                   

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अंतर्राष्ट्रीय जल सहयोग वर्ष – 2013

अंतर्राष्ट्रीय जल सहयोग वर्ष – 2013

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जल से सब कुछ , जल से हमारी जिन्दगानी।
पृथ्वी के दो तिहाई हिस्से में है पानी – पानी।।
जिसमें पीने के लिए एक प्रतिशत से कम पानी।
इसलिए बूंद-बूंद बचाओ , गढ़ो नई कहानी।।

बढ़ते हुए जल संकट को देख , दुनिया एक हुई।
तब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने की घोषणा नई।।
वर्ष 2013 को अंतर्राष्ट्रीय जल सहयोग वर्ष मनाओ।
इसलिए बूंद-बूंद बढ़ाओं , कठौती में गंगा लाओ।।

उपयोग जल का कृषि , उद्योग , उर्जा और घर में।
मानव, पशु-पक्षी, गांव-गांव शहर और नगर में।।
पानी है सभी के लिए, प्रकृति की अनमोल देन।
इसलिए बूंद-बूंद बचाओ, ऐन केन प्रकाणेन।।

दिनो दिनो जल की उपलब्धता घटती जा रही है।
जनसंख्या वृद्वि से इसकी खपत बढ़ती जा रही है।।
प्राकृतिक संसाधनों के सरक्षण का चलाये अभियान।
इसलिए बूंद-बूंद बचाओ, जल है प्रकृति का वरदान।।

वर्ष 2025 तक होगी , पेय जल की बढ़ती जरूरत।
जिसके लिए हमें और जुटाना होगा , 44 प्रतिशत।।
सिंचाई में 10 और उद्योग में 81 प्रतिशत बढ़ जायेगा।
इसलिए बूंद-बूंद बचाओ , तब संतुलन हो पायेगा।।

वृक्ष लगाओ , पर्यावरण सुधारों , जल चक्र सुधारों।
सूखा – बाढ़ , तूफान विपदाओ से , भारत को उबारो।।
वर्ष 2013 को अंतराष्ट्रीय जल सहयोग वर्ष मनाओ ।
बूंद-बूंद बचाओ , राष्ट्रीय जल संरक्षण वर्ष मनाओ ।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन “जल स्टार” प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)

कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

औद्योगिक नीति 2014-19 – छत्तीसगढ़ में भूमि बैंक और उद्यमिता विकास

. डॉं भागचंद जैन प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र) कृषि महाविद्यालय , रायपुर
. 492012 (छत्तीसगढ़)
इं. सोहिल जैन संचालक , जैन सॉफ्टवेयर ,106-107, जयराम काम्पलेक्स जय स्तम्भ चौक रायपुर 492001 (छत्तीसगढ़)

 

 

मेक इन इंडिया के तर्ज पर , मेक इन छत्तीसगढ़ को साकर करने के लिए उत्तीसगढ़ की आद्योगिक नीति 2014-19 बनायी गई है जिसमें उद्योगो को प्रोत्साहन देने के लिए निर्माण संबंधी उद्यागो का बढावा देने के साथ साथ सूक्ष्म , लधु , माध्यम तथा डाएनस्ट्रीट उद्योगो के लिए अनुदान एंव छुट का विशेष प्रावधान किया गया है ।

रामराज्य का कौशाल प्रदेष तथा भारत का 26 वा प्रदेष छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपुर है यहां क्या नही है , उपजाउ जमीन है । जंगल है । रत्नगर्भा धरती है । दुर्लभ जैव विविघता है ं। यहा से निकलेन वाली महानदी उडीसा राज्य से होकर समुद्र में मिलती है अन्य मुख्य नदिया षिवनाथ , हसदेव , माण्ड , खारून , जोंक , पैरी एंव ईब महानदी की कन्हर एंव रिहंद , सोन नदी की और इद्रवती , गोदावरी नदी की सहायक नदिया है । यहां 1041 सिंचाई जलाशय और 36844 तालाब है , अर्थात छत्तीसगढ़ में सतही जल और भू-जल अधिक है । यहॉं उपर पानी है और आर नीचे पानी है । महान दर्षनिक टालस्टाय ने लिखा है कि महानदी की रेत में हीरे पायी जाती है हीरा बाक्साईट , लौह अयस्क कोयला चुना , डोलोमाईट टिन कोरण्डम तथा क्वाटजाईट जैसे खनिजो के दोहन से प्रदेष को राजस्व की भारी राशि प्राप्त होती है।

बजट
वर्ष 2015-16 में छत्तीसगढ़ के सकल घरेलू उत्पाद कीर वृद्वि दर का अनुमान 12.76 प्रतिशत लगाया गया है , जबकि भारत मे सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर अनुमानित 7.00 से 7.50 प्रतिशत रही है । छत्तीसगढ़ में कृषि विकास कि दर वर्ष 2015-16 में सूखने के कारण 0.14 प्रतिषत आंकी गई है , जो कि वर्ष 2014 -15 में 6.18 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है ।
छत्तीसगढ़ को वर्ष 2016-17 के बलट में भिलाई में इंजीनियरिंग पार्क , धमतरी फुड पार्क , राजनांदगांव में प्लास्टिंक पार्क , कोरबा में एल्यूमिनियम पार्क तथा नया रायपुर में इलेक्ट्रानिक मेनुफेक्चरिंग क्लास्टर बनाने का प्रावधान किया गया है । औघोगिक क्षेत्रों के विकास एंव संधारण हेतु बजट में 50 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है । इसके अलावा राज्य खाद्य प्रसंस्करण मिशन के लिए 14 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है । प्रदेश कि राजधानी , नया रायपुर , देश की प्रथम स्मार्ट सिंटी के रूप में विकसित हो रही है नया रायपुर में सम्मलेन , प्रदर्शनी के आयोजनो के लिए डॉं. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उद्योग एंव व्यापार परिसर में कन्वेशन सेन्टर निर्यात फेसिलिटेशन सेंटर और शिल्प ग्राम कि अघोसरचना विकसित कि जायेगी जिसके लिए प्रदेश के बजट में 25 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है । आद्योगिक नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए अनुदान को 90 करोड रूपये से बढ़ाकर 120 करोड़ रूपये किया गया है । ईज ऑफ डुइंग विजनेस , में छत्तीसगढ़ का स्थान देष के चार अग्रणीय राज्यो में है इस दिषा में वर्ष 2016-17 में सुधार किये जायेगे ।
छत्तीसगढ़ कि नवाचार एंव उद्यामिता विकास नीति का शुभारंभ प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 21 फरवरी 2016 को िकया गया , जिसमें इक्युवेटर सह एक्सेलेरेटर की स्थापना हेतु 8 करोड़ 70 लाख रूपये , स्टार्ट -अप उद्यमियो को ब्याजमुक्त ़ऋण के लिए लीप आफ फेश फण्ड की स्थापना हेतु 50 लाख रूपये तथा वेचर केपिटल के लिए उद्यम पूंजी निधि की स्थापना हेतु एक करोड़ रूपये का प्रावधान है ।
प्रदेष में मुख्यमंत्री युवा स्वालंबन योजना की शुरूवात होने से सूचना प्राद्योगिकी (पदवितउंजपवद जमबीदवसवहल) तथा सूचना प्रौघोगिकी समर्पित सेवा उघोगो के लिए कौषल विकास एंव प्लेसमेंट के अवसर जुटाये जायेगे । इसमें वर्ष 2016-17 में पांच हजार छात्रो को कौषल विकास प्रशिक्षण दिया जायेगा , जिसके लिए पांच करोड रूपये का प्रावधान किया गया है ।
युवाओ को कौषल विकास का अघिकार देने वाला छत्तीसगढ़ अकेला राज्य है । वर्ष 2015-16 में 85 हजार युवाओ को प्रशिक्षण दिया गया मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना एंव कौशल विकास प्रारंभिक योजना (ेापस कमअमसवचउमदज प्दपजपंजपअम ेबीमउम) के अंतर्गत 144 करोड़ रूपये का प्रावघान है । इसके अलावा जीवनोपयोगी महावद्यिलय (स्पअमसपीवक बवससंहम) की अघोसंरचना विकास हेतु 51 करोड़ रूपये का प्रावघान है ।
प्रदेश में 8 अद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (प्दकनेजतपंस जतंपदपदह प्देजपजनजम) की स्थापना प्रस्तावित है । वर्ष 2016-17 में आई.टी.आई. की सीटें 1136 बढ़ायी जायेगी ।
छत्तीसगढ़ युवा क्रांती योजना के अंतर्गत 7400 छा़त्रो को लेपटाप और टेबलेट वितरित किये जाने का लक्ष्य रख गया है जिसके लिए 80 करोड़ रूपये का प्रावधान है वर्ष 52016-17 से भारतीय सुचना प्राद्योगिकी संस्थान में सीटो कि संख्या 80 से बढ़ाकर 120 की जायेगी । इस संस्थान के लिए 10 करोड़ रूपये का प्रावधान है इसके अलावा उद्योग की सहभागिता से 82 करोड़ रूपये कि लागत से अधोसंरचना विकसिंत की जायेगी अभियांत्रिकी शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए शासकिय इंजीनियरिंग महाविद्यालय , रायुपर में सिविल इलेक्ट्रीकल तथा इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग विषयों में स्तनातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू किये जायेगे।

प्रदेश में ग्रामोद्योग को बढ़ावा देन के लिए नैसर्गिग कोसा उत्पाद विकास योजना और मलबरी एंव टसर विस्तार हेतु 10.63 करोड़ रूपये का प्रावघान है ।

औघोगिक क्षेत्र और भूमि बैंक
छत्तीसगढ़ के सभी 27 जिलो में औद्योगिक क्षेत्रो की संभावना वाले स्थानों पर सूक्ष्म , लघु एंव मध्यम उद्योगो की स्थापना हेतु नये औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किये जायेगे इनकी स्थापना हेतु नये औद्योगिक क्षेत्र स्थापित किये जायेगे इनकी स्थापना के लिए छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम (बीजजपेहंती ेजंजम प्दकनेजतपंस कमअमसवचमते बवतचवतंजपवद) को नोडेल ऐजेसी बनाया गया है । नया रायपुर में प्रदुषणमुक्त उद्याग स्थापित किये जायेगे । प्रदेश में औद्योगिक क्षेत्रो का यथा संभव विस्तार किया जायेगा । इसके अलावा निजी क्षेत्रो में आवयकतानुसार औद्योगिक क्षे़त्रो और औद्योगिक पार्को की स्थापना को बढ़ावा दिया जायेगा ।
रेल कारीडोर योजना , और दल्लीराजहरा , रावघाट – जगदलपुर रेल्वे परियोजना के कार्यक्षेत्र में आने वाले क्ष़ेत्रो में उपयुक्त स्थापना पर लघु आद्योगिक क्षेत्रो कि स्थापना हेतु भूमि की पहचान की जायेगी । सी.एस.आई.डी.सी को नये औद्योगिक क्षेत्रो की स्थापना औद्योगिक क्षेत्रो का विस्तार , पहुंच मार्ग और भूमि बैंक आदि कि स्थापना हेतु भूमि क्रय करने का अघिकार दिया जायेगा ।
औद्योगिक क्षेत्रो में सुक्ष्म एंव लधु उद्योगो कि स्थापना हेतु बहु मंजिला भवन , रोड बनाये जायेगे। छत्तीसगढ़ में औद्योगिक भूमि की मांग बढ़ती जा रही है जिसकी पूर्ती हेतु दीर्धकालीन योजना बनाकर 10 हजार हेक्टेयर का भूमि बैंक बनाया जायेगा । भूमि बैंक के लिए भूमि के अर्जन , शासकिय भूमि के हस्तांतरण में न्यूनतम 20 प्रतिशत आवंटन सूक्ष्म , लघु और माध्यम उद्योगो के लिए आरक्षित होगी।
उद्योगो कि स्थापना लागत को कम करने के लिए औद्योगिक क्षेत्रो में विघुत उपकेन्द्र बनाने विघुत टा्रसफार्मर लगाने भूमि का आरक्षण किया जायेगा । इसके अलावा आद्योगिक क्षेत्रो में औद्योगिक पेय जल की आपूर्ती हेतु व्यवस्था की जायेगी तथा संचार सुविधाओं के लिए भी भूमि आरक्षित रखी जायेगी ।
राज्य सरकार और सी.एस.आई.डी.सी. द्वारा औद्योगिक क्षेत्रो का संघारण किया जात है , किन्तु इन औद्योगिक क्षेत्रो में स्थानीय निकायो द्वारा सम्पत्ति कर तथा अन्य कर वसुले जाते है , जिसे देखते हुए अघिनियमो में आवश्यक संसोधन किया जायेगा । राज्य सरकार द्वारा स्वयं या जन सहभागिता माडल के आधार पर समूह आधारित उद्योग विकसित किये जायेगे , जैसे जेम्स एंव ज्वेलरी , खाद्य प्रसंस्करण (थ्ववक च्तवबमेपदह) पार्क , इंजिनियरिंग पार्क , एलुमीनियम पार्क , फार्मास्टूटिकल पार्क, सूचना प्राद्योगिकी पार्क , कोर सेक्टर पर आधारीत डाउन स्ट्रीम उद्योग पार्क , सोलर एंव सोलर आधारित उत्पाद पार्क हर्बल पार्क , प्लास्टिक पार्क, इलेक्ट्रानिक एंव इलेक्ट्रिकल उपभोक्ता उत्पाद पार्क और रेल्वे सहायक उद्योग काम्पलेक्स आदि ।
औद्योगिक क्षेत्रों के संघारण हेतु गठित अघोसंरचना निगरानी समितियों का अघिक प्रभावी बनाया जायेगा । यहां आवश्यकता के अनुसार उच्च भारवहन क्षमता की आर.सी.सी सड़के उच्च गुण्वत्तायुक्त विघुत का सतत प्रदाय , जल प्रदाय , औजार कक्ष (ज्ववस तववउ) प्रशिक्षण प्रयोगशाला (ज्मेजपदह स्ंइवतंजवतल) अग्नि सुविधा (ब्वउउनदपबंजपवद) आदि कि व्यवस्था कि जायेगी इसके लिए पहल की जायेगी । औद्योगिक क्षेत्रो में संघारण हेतु निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया जायेगा ।
भूमि बैंक और औद्योगिक क्षेत्रो के निकटवर्ती क्षेत्रो में कार्यरत श्रमिको के आवास के लिए छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मण्डल तथा अन्य सरकारी संस्थाओ और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया जायेगा ।

औद्योगिक भूमि प्रबंधन
औद्योगिक क्षेत्रो तथा औद्योगिक क्षेत्रो के बाहर भूमि बैंक से भूमि आवंटन हेतु नये भूमि आवंटन सबंधी नियम बनाये जायेगे । इसके अलावा प्रदेश और जिला स्तर पर भूमि आवंटन के अघिकार का विकेन्द्रीयकरण किया जायेगा ।
औद्योगिक उददेश्य और आद्योगिक उद्देश्यों से भिन्न उद्देश्य के लिए भूमि का आवंटन कि दरो का निर्धारण युक्तसंगत बनाया जायेगा । इसके अलावा भूमि और शेड हस्तांतरण कि दरो को उपयुक्तता के अनुसार संशोधित किया जायेगा । औद्योगिक भूमि शेड तथा भवन खाली कराने के लिए और विभागीय बकाया की वसूली करने के लिए सी.एस.आई.डी. सी. जिला व्यवार एंव उद्योग केन्द्र के अघिकारियो को क्रमशः बेदखली परिसर अधिनियम और राजस्व विभाग के अघिकारो को न्यायसंगत बनाया जायेगा ।

उद्यमिता विकास
छत्तीसगढ़ में उघमिता विकास की व्यापक संभावननाये है । तरह तरह के लघु , मध्यम और सुक्ष्म उद्योगो को स्थापना के लिए यहां कच्चा माल तथा संसाधन उपलब्ध है । उद्यमिता विकास के लिए सर्वेक्षण , प्राथमिक तथा विस्तृत परियोजना का प्रतिवेदन बनाने निवेश के पहले संबंधित पहुलुओ पर अध्ययन , नये उद्यमियो के चयन और उनकी परिवार योजनाओ का क्रियान्वयन तकनिकी एंव प्रबंधन सहयोग तकनिकी आर्थिक उपयुक्तता प्रतिवेदन (ज्मबीदव म्बवदवउपब मिंपइपसपजल त्मचवतज) तैयार करने , औद्योगिक प्रबंधन एंव वित्तीय सलाहकार के रूप में कार्य करने इंजीनियरिंग सलहकार सेवाये देने परियोजना परिर्वेक्षण सेवायें देने , उद्यासमिता जागरूकता , उद्यामिता विकास कौशल विकास (ेपसस क्मअसवचउमदज) , प्राशिक्षणार्थी प्रशिक्षण (ज्तंपदमत ज्तंपदपदह) प्रबंधन प्रशिक्षण विपणन सहयोग कार्यशाला (ॅवतोवच), क्रेता विक्रेता सम्मेलन आदि कार्या के लिए छत्तीसगढ़ कंसलटेंसी आर्गेनाईजेशन का गठन किया जायेगा । जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम , राष्ट्रीयकृत बैंको तथा अन्य शासकिय विभागो को शामिल किया जायेगा ।
विभिन्न विभागो एंव उपक्रमों द्वारा किये जाने वाले उद्यमिता विकास कार्यक्रमों में समन्व्य स्थपिता किया जायेगा । युवाओं में उद्यमिता विकास के लिए विभिन्न कार्यक्रमो का वार्षिक कैलेण्डर तैयार किया जायेगा इसके अलावा उद्यामिता विकास कार्यक्रम के पाठ्यक्रमो की रूप रेखा बनाई जायेगी । जिसमें व्यवहारिक प्रशिक्षण और औद्योगिक भ्रमण पर अधिक घ्यान दिया जायेगा । उद्यामिता विकास कार्यक्रमों में उत्पाद आधारित गतिविधियों को प्राथमिकता दी जायेगी। । उद्यमिता संबंधी प्रशिक्षण के लिए छत्तीसगढ़ के उद्यामियो को उद्यमिता विकास संस्थान , अहमदाबाद तथा अन्य संस्थाओं में भेजा जायेगा । इसके अलावा तकनीकी और प्रबंधन संस्थाओं में समन्व्यय स्थापित कर पाठ््यक्रम को अधिक प्रभावी बनाया जायेगा । प्रदेश में सूक्ष्म , लधु एंव मध्यम उद्यम संस्थानों और अनुमोदित संस्थानो से जिले के लिए उपयुक्त उद्योगो की परियोजना प्रोफाईल तैयार कर उसे उद्यामियो को निशुल्क उपलब्ध कराया जायेगा ।

निर्यात
छत्तीसगढ़ से सीधे निर्यात हेतु औद्योगिक नीति 2014-19 में विशेष प्रावधान किये गये है जैसे नया रायपुर में निर्यात सुविधा सह कन्वेशन सेंटर की स्थापना , रायुपर में एयर कार्गो की स्थापना (जिसमें कस्टम क्लियरेन्स सुविधा हो ) प्रदेश में निर्यातोन्मुखी उत्पाद , समाग्री, निर्यात अद्योसंरचना की जरूरत आदि करना तथा कार्य योजना बनाना । निर्यात और आयात संबंधी वेबसाईट का प्रभावी ढंग से उपयोग करना ।
उद्यामियो को निर्यात प्रक्रिया की जानकारी के लिए निर्यात संवर्धन परिषद , विदेश व्यापार के महानिदेशक (क्पततबजवत ळमदमतंस वि थ्वतमपहद ज्तंकम) और राज्य सरकार कि संस्थाओं में समन्वय स्थापिता कर जागरूकता कार्यक्रम चलाये जायेगे । निर्यात को बढ़ावा देने के लिए उद्योग संचानालय में निर्यात प्रकोष्ठ (म्गचवतज ब्मसस) का गठन किया जायेगा । नियातोन्मुखी उत्पादों पर कर की छुट के लिए प्रावघान है । निर्यात संबंधी सभी क्लियरेंस एक साथ कराने के लिए विदेश व्यपार के महानिदेशक के रायपुर स्थित कार्यालय को अपग्रेड किया जायेगा । निर्यात के लिए इनलेण्ड कंटेनर डिपो को सर्वसुविधायुक्त बनाया जायेगा।
उद्योग मित्र
प्रदेश में औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न प्रकार कि योजनाए स्थपित कि जायेगी जिनकी प्रक्रिया सरल बनाई जायेगी । जिला और राज्य स्तर पर 10 करोड़ रूपये से अघिक की परियोजनाए स्थ्पापित कि जायेगी जिनकी प्रारंभ्भिक स्थिति से लेकर स्थापना तक मार्गदर्शन देने वाले सहयोगी अघिकारीयो को उद्योग मित्र की सज्ञा दी जायेगी ।
उद्योग के समस्याओं के निरारकरण हेतु जिला स्तर पर कलेक्टर की अघ्यक्षता में उद्योग संवर्धन सहायता समीति , संचानालय स्तर पर उद्योग आयुक्त/संचालक की अघ्यक्षता में समन्वय समीति औद्योगिक अघोसंरचना एंव विपणन संबंधी समस्याओं के निराकरण हेतु सी.एस.आई.डी.सी. के प्रबंध संचालक की अघ्यक्षता में समीति और शासकिय समस्याओं के निदान हेतु अपार मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव/सचिव वाणिज्य एंव उद्योग विभाग की अध्यक्षता में अंर्तविभागीय समीति गठित की जायेगी , जिसकी बैठक प्रत्येक तीन माह में होगी ।

तालिका 1 छत्तीसगढ़ में उद्योग हेतु विकासशील क्षेत्र

जिला             विकास    खण्ड
रायपुर घरसिवा , तिल्दा , अभनपुर
बलौदा बाजार बलौदा बाजार , भाटापारा , सिमगा
बलिसपुर विल्हा , कोटा , तखतपुर
दुर्ग दुर्ग , धमधा , पाटन
राजनांदगांव राजनांदगांव
महासमुंद महासमुद
धमतरी घमतरी
जांजगीर अकलतरा , चाप , जाजगीर , सक्ती , बलौदा
रायगढ़ रायगढ़ , पुसौर , घरघेड़ा , तमनार , खरसिया ,
कोरबा कोरबा , कटघोरा

तालिका 2 छत्तीसगढ़ में उद्योग हेतु पिछड़े क्षेत्र

जिला विकास खण्ड
रायपुर आरंग
बलौदा बाजर कसडोल , बिलाईगढ ़, पलारी
बिलासपुर पेण्ड्रा , मरवाही , मस्तुरी
मुगेली मुंगेली पथरिया , लोरमी
बालोद बालोद , डौडी , लोहारा , गुण्डरदेही , गुरूर
बेमेतरा बेमेतरा , साजा , नवागढ़ , बेरला
राजनांदगांव अंबागढ़ , चौकी , मानपुर , मोहला , छुरिया ,
छुईखदान , डोगरगडढ़ , डोरगरगांव , खेरागढ़
महासमुद वसना , पिथौरा , बागबाहरा , सराईपाली
धमतरी नगरी , मगरलोड , कुरूद
जांजगीर माल खरौदा , जैजेपुर , डभरा , पामगढ़
रायगढ़ धरमजयगढ़ , बरमकेला , सारंगढ़ , लैलूंगा
कोरबा करतला , पौडी , उपरोडा , पाली
गरियाबंद गरियाबंद , मैनपुर , छुरा , देवभोग , फिगेश्वर
कवर्धा कवर्धा , पडरिया , लोहारा , बोडला
कांकेर
दंतेवाड़ा
सुकमा
कोडागांव
नारायणपुर
बीजापुर समस्त विकास खण्ड
बस्तर
जशपुर
बलरामपुर
सूरजपुर
सरगुजा
कोरिया
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