महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज

 

डाॅ. भागचन्द्र जैन

प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र), प्रचार अधिकारी,
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय रायपुर दृ 492012 ;छत्तीसगढ़)

 

 

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत की आत्मा गांवों में बसती है।‘ गांवों की प्रगति से सबकी प्रगति जुड़ी है। भारत गांवों का देष है, जहां पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण है। बापू ने कल्पना की थी कि ग्राम राज से स्वराज का सपना साकार हो। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत गांवों में रहता है, नगरों में नहीं। यदि मुझे गांवों को निर्धनता से मुक्त करनें में सहायता मिल जाये तो मैं समझूंगा कि मैंने सारे भारत के लिए स्वराज प्राप्त कर लिया है। यदि गांव नष्ट होता है तो भारत भी नष्ट हो जायेगा।‘ गांधी जी ऐसे पहले दार्षनिक थे, जिन्होंने ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर विषेष बल दिया, उनके राजनैतिक जीवन और अहिंसात्मक दर्षन की ग्रामीण विकास ही आधार-षिला थी। उन्होंने अपने प्रारम्भिक जीवन से जीवन से ही ऐसे रचनात्मक कार्यों को अपनाया, जिनका सीधा सम्बन्ध जीवन को सरस, सम्पूर्ण तथा सुखी बनाना था। उनका कहना था कि भारत की आत्मा गांव है-इसलिए यदि गांव-गांव में नव जीवन और आषा का संवार नहीं होता, तो स्वराज बेकार है। रचनात्मक कार्यक्रम में निम्नांकित क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई थीः
1. साम्प्रदायिक एकता
2. अस्पृष्यता निवारण
3. मद्य निषेध
4. खादी का प्रचार
5. ग्रामीण उद्योगों का विकास
(क) गुड़ बनाना
(क) तेल निकालना
(क) धान कूटना
(क) बुनाई
(क) नीम का तेल निकालना
6. पषुधन विकास
7. बुनियादी षिक्षा
8. प्रौढ़ षिक्षा
9. ग्रामीण स्वच्छता
10. महिला विकास
11. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग उत्थान
12. स्थानीय साधनों से क्षेत्रीय विकास
13. हिन्दी को बढ़ावा
14. कृषक, श्रमिक तथा विद्यार्थियों के संगठन
15. प्राकृतिक चिकित्सा
16. आर्थिक विषमता दूर करना
17. स्वावलम्बी गांवों का निर्माण
18. श्रम में निष्ठा
इस प्रकार के व्यापक कार्यक्रम में गांवों के पुर्ननिर्माण और सर्वांगीण विकास की
छटा दिखायी देती थी। गांधी जी एक नये समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसमें विषमता न हो और जो शोषणमुक्त हो । ऐसा समाज तब बनेगा, जबकि गांवों की समस्याओं का निराकरण किया जाये। गांधी जी ने गांवों की समस्याओं का निराकरण भी किया, क्योंकि वे केवल आदर्षवाद में विष्वास नहीं करते थे, वे एक व्यावहारिक महा पुरूष थें। उन्होंने सेवाग्राम आश्रम द्वारा निकटवर्ती क्षेत्रों में यह कार्यक्रम लागू किया, जिसके कुछ ही दिनों में सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे।
महात्मा गांधी मानते थें कि अच्छा स्वास्थ्य समाज, परिवार और व्यक्ति तीनों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। देष की वास्तविक सम्पत्ति वहां के निवासियों का अच्छा स्वास्थ्य है। उन्होंने लिखा है कि ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के पष्चात् सबसे पहला कार्य देष में यह होगा कि प्रत्येक व्यक्ति को ठीक से रोटी तथा कपड़ा मिल सके।‘स्वस्थ और सुखी जीवन की यह प्राथमिक आवष्यकता है, परन्तु स्वस्थ जीवन के लिए वातावरण की स्वच्छता के महत्व को पीछे नही रखा जा सकता।ं देष में होने वाली बहुत कुछ बीमारियां गावों को साफ-सुथरा बनाकर सरलतापूर्वक कम की जा सकती है।
गांधी जी के सपनों का पंचायती राज
पंचायत य पंचायती राज का उददेष्य केवल अधिकार से व्यवस्था और प्रषासन चलाना नहीं है, वरन् व्यक्तियों को सामुदायिक विकास के लिए निरंतर चलने वाले कार्याें के विकास में लगाना है। महात्मा गांधी मानते थे कि आरम्भ में लोंगों को यह अनुभव होना चाहिए कि व्यक्तियों के हित में पंचायत कार्य कर रही है। ऐसी स्थिति मंे यदि अधिकारों का यथायोग्य ध्यान रख कर उपयोग होगा तो उससे क्षति नहीं होगी, वरन् गांव के स्वायत्त प्रषासन की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
पंचायत को अपनी प्रतिष्ठा स्थिर करने के लिए यह आवष्यक है कि वह उन कार्यों को प्राथमिकता दे, जिनका लोगों के जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध हो। इसमें गांव के व्यक्ति भी सहयेाग देंगे और धीरे-धीरे ऐसी ही अन्य जिम्मेदारियांे को बहन करने में वे सक्षम होगे। पंचायत का कार्य-क्षेत्र बढ़ता जायेगा और अन्त में यह सिद्व हो जायेगा कि पंचायते ऐसे कार्यों की जिम्मेदारी निभाने में उच्च स्तर की संस्थाओं से अच्छी हैं।
वैधानिक स्वरूप
पंचायत कानूनी अधिकार युक्त संस्था होनी चाहिए, साथ ही कानून ऐसा हो, जो समझने तथा समझाने मंे स्पष्ट हो, सरल हो।

सामान्यतया प्रत्येक उपयोगी कार्य के लिए कानून होना चाहिए, किन्तु यह कानून जटिल न हो।
ऽ पंचायत का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें स्वस्थ और उच्च-परम्पराओं का विकास हो।
ऽ इसमें लोकतांत्रिक कार्य प्रणाली उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितनी कि व्यवहारिक कार्य-विधि महत्वपूर्ण है।
ऽ अधिक महत्व के निर्णयों के लिए अधिक से अधिक व्यक्तियों की अनुमति लेनी चाहिए।
ऽ बहुमत के आधार पर महत्व के निर्णयों को मान लेने से पंचायत की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी, प्रतिष्ठा उससे बढ़ती है जहां समुदाय के सभी व्यक्ति एकमत हों।
ऽ यदि किसी कार्य को करने के लिए सभी व्यक्ति एकमत होते हैं तो वे सब मिलकर उसे पूरा करने का प्रयास करेंगे, जिससे सच्चे लोकतन्त्र की जड़ें मजबूत हांेगी।
आजादी के पहले पंचायतें
अंग्रेजों के शासन काल में शासक चाल्र्स मेटकाल्फ ने पंचायतों की सराहना करते हुये उन्हें ‘लद्यु गणराज्य‘ की संज्ञा दी, किन्तु बाद में बड़े-बड़े व्यक्तियों ने निर्माण और विकास कार्यों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। राॅयल आयोग ने वर्ष 1909 में अपने प्रतिवेदन में अनुषंसा की कि विकेंद्रीकरण के लिए ग्राम पंचायतों के माध्यम से व्यक्तियों को जोड़ा जाये। इसके बाद विभिन्न राज्यों द्वारा समय-समय पर पंचायत अधिनियम पारित किए गए, जिनमें ‘बंगाल ग्राम स्वषासन अधिनियम (1919), मद्रास-बाम्बे एवं सयुक्त प्रांत ग्राम पंचायत अधिनियम (1920), बिहार एवं उड़ीसा ग्राम प्रषासन अधिनियम, असम ग्राम स्वषासन अधिनियम (1926), पंजाब ग्राम पंचायत अधिनियम (1935), आदि प्रमुख हैं, ये अधिनियम ग्राम मुददों एवं ग्राम विकास की देखरेख पर आधारित थे। स्थानीय स्वषासन को गांव के छोटे मामलों के निपटानें का अधिकार था, किन्तु ये निकाय लोकतात्रिक नहीं थे, इनके वित्तीय संसाधन सीमित थे, ऐसी स्थिति वर्ष 1950 तक ज्यों की त्यों बनी रही।
आजादी के बाद पंचायतें
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस बात पर जोर दिया था कि स्वतंत्रता की शुरूआत सर्वप्रथम निम्न स्तर से होनी चाहिए, जिसमें प्रत्येक ग्राम एक पंचायत वाला गणराज्य (ग्राम स्वराज) होना चाहिए, इसमें पंचायत को सभी शक्तियां प्राप्त हों। जनता की भागीदारी सुनिष्चित करने के लिए वर्ष 1952 मं सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, किन्तु इस कार्यक्रम का लाभ ग्रामीण निर्धनों तक नहीं पहुंच पाया। इसकी वस्तु स्थिति की समीक्षा के लिए वर्ष 1957 में बलवंतराय मेहता समिति का गठन किया गया, जिसमें निर्वाचित स्थानीय निकायों की स्थापना और पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था की अनुषंसा की । वर्ष 1977 में राष्ट्रीय स्तर पर अषोक मेहता समिति का गठन किया गया, इस समिति का मानना था कि ग्रामीण भारत सभी विकासोन्मुखी कार्यक्रमों का आधार है। पंचायती राज की समीक्षा हेतु जी.वी.के. राव समिति, एल.एम. सिंघवी समिति, सरकारियां आयोग का गठन किया गया। वर्ष 1989 में भारत सरकार ने संविधान के भाग प्ग् में पंचायतों को शामिल करने के लिए 64 वां संविधान संषोधन विधेयक पेष किया, अंततः 20 अपै्रल 1993 को भारत के राष्ट्रपति ने इस पर अपनी स्वीकृति दी।
पंचायतों की भूमिका
पंचायतों को विभिन्न विकास गतिविधियों को शुरू करने के लिए पर्याप्त निधि उपलब्ध हों। प्रत्येक राज्य में 73 वें संषोधन अधिनियम- 1992 के अनुसार वित आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। आर्थिक कार्यक्रमों की योजना बनाने और उन्हंे लागू करने के लिए संषोधन अधिनियम पंचायतों को शक्तियां और जिम्मेदारियां देता है। ग्यारहवीं अनुसूची में कुल मिलाकर 29 गतिविधियां सूचीबद्व है। पंचायती राज संस्थाओं के लिए इन गतिविधियों को पांच श्रेणी में बांटा गया हैः

1. आर्थिक विकास:- ऐसे 11 मद हैं, जो आर्थिक विकास पर आधारित हैं, जिसमें शामिल हैः
(अ) निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम, जैसे एस.वाई., एस.जी.आर.वाई. आदि।
(ब) भू सुधार ।
(ग) लघु सिंचाई ,
(द) पषुपालन,
(इ) मत्स्य पालन,
(ई) सामाजिक वानिकी,
(फ) लघु वनोपज,
(ग) लघु एवं कुटीर उद्योग,
(ह) कृषि
(ज) ईंधन, चारा ।
2. षिक्षा – इसमें प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय, गैर- औपचारिक षिक्षा, पुस्तकालय, तकनीकी प्रषिक्षण एवं सांस्कृतिक कार्यकलाप शामिल है।
3. स्वास्थय – इसमें स्वास्थ्य एवं स्वच्छता और परिवार कल्याण शामिल है।
4. महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण – इसमें महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण, कमजोर वर्गोंं का कल्याण और सार्वजनिक वितरण शामिल हैं।
5. ढ़ाचागत विकास – इसमें सड़कें, आवासीय सुविधायें, पेय जल, बाजार, विद्युतीकरण, गैर परंपरागत – उर्जा स्त्रोत, सामुदायिक सम्पत्तियों का संरक्षण शामिल है।
महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज ‘ग्राम राज से स्वराज‘ पर आधारित है।
ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर उन्होंने जोर देते हुये अंिहंसात्मक दर्षन से ग्रामीण विकास की आधारषिला रखी थी। गांधी जी के आर्थिक समानता, षिक्षा, सामाजिक एकता पर केन्द्रित रचनात्मक कार्यक्रम से पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी थी, ऐसे में त्रिस्तरीय पंचायती राज में 29 गतिविधियां सूचीबद्व की गई हैं, जिनके प्रभावी क्रियान्वयन से पंचायतों से ग्रामीण विकास का सपना साकार होगा। पंचायतों को ग्रामीण विकास के व्यापक अधिकार दिये गये हैं, इन अधिकारों का क्रियान्वयन निष्पक्ष रूप से इस प्रकार किया जाये, जिससे ‘पंच परमेष्वर की भूमिका चरितार्थ हो सके। गांव में बेरोजगारी की समस्या न रहे, स्वास्थ्य सेवाएं घर-घर पहुंचे, विकास योजनाओं का लाभ योग्य हितग्राही तक पहुंचे।

11 वीं अनुसूची (अनुच्छेद 243 जी)
पंचायती राज का अभिप्राय ग्रामीण स्थानीय स्वषासन से है। पंचायती राज स्वराज को सार्थक करे, इसके लिए वर्ष 1002 में 73वें संविधान संषोधन अधिनियम संविधान में शामिल किया गया है। इस अधिनियम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला है। इस अधिनियम से संविधान में 11 वीं अनुसूची जुड़ गई है, जिसमें पंचायतों की 29 गतिविधियां सूचीबद्व है
1. कृषि (कृषि विस्तार सहित)।
2. भूमि विकास, भूमि सुधार, भूमि चकबंदी, भूमि संरक्षण
3. लद्यु सिंचाई, जल प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्र विकास।
4. पषुपालन, दुग्ध व्यवसाय तथा मुर्गी पालन।
5. मत्स्य पालन, सामाजिक वानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी।
6. लद्यु वनोपज।
7. लद्यु उद्योग (खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित)।
8. खादी, कुटीर एवं ग्रामोद्योग।
9. ग्रामीण आवास।
10. पेय जल।
11.र् इंंधन तथा पषु चारा।
12. सड़कों, पुलों, तटीय, जल मार्गों तथा अन्य संचार के साथ।
13. ग्रामीण विद्युती (विद्युत वितरण सहित)।
14. गैर परम्परागत ऊर्जा स़्त्रोत।
15. गरीबी उन्मूलन काय्रक्रम।
16. षिक्षा (प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय सहित )।
17. तकनीकी प्रषिक्षण एवं व्यवसायिक षिक्षा।
18. व्यस्क एवं गैर व्यस्क औपचारिक षिक्षा।
19. पुस्तकालय।
20. सांस्कृतिक गतिविधियां।
21. बाजार एवं मेले।
22. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं (चिकित्सालय प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र्र तथा औषधालय)।
23. परिवार कल्याण।
24. महिला एवं बाल विकास।
25. सामाजिक कल्याण (विकलांग व मानसिक रोगी का कल्याण)
26. कमजोर वर्ग (विषेषकर अनुसूचित जाति अनुसूचित जन जाति)।
27. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
28. समुदायिक सम्पत्ति की देखरेख ।
संविधान के 40 वें अनुच्छेद में इस अधिनियम से व्यवहारिक रूप दिया गया है जिसके अनुसार ‘‘ग्राम पंचायतों को गठित करने के लिए राज्य कदम उठाएगा और उन्हें उन आवष्यक शक्तियों और अधिकारों से विभूषित करेगा, जिसमें िकवे स्वषासन की इकाई की तरह कार्य करने में सक्षम हों। यह अनुच्छेद राज्य की नीति के निर्देषक सिद्वांतों का एक हिस्सा है।‘‘ 73 वें संविधान संषोधन अधिनियम में अनिवार्य एवं एच्छिक प्रावधानों को शामिल किया गया है।
(अ) अनिवार्य प्रावधान
1. एक गांव या गांवों के समूह में ग्राम सभा का गठन
2. ग्राम जनपद और जिला स्तर पर पंचायतों की स्थापना।
3. तीनों स्तरों पर सभी सीटों के लिए पं्रत्यक्ष चुनाव।
4. जनपद (ठसवबा) और जिला (क्पेजतपबज) स्तर के प्रमुख के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव।
5. पंचायतों में चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष।
6. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति वर्ग का आरक्षण।
7. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए एक तिहाई महिला आरक्षण।
8. त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष है। किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्ति के बाद 6 माह की अवधि के भीतर नये चुनाव का प्रावधान है।
9. पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना।
10. पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित आयोग की स्थापना।
(ब) एच्छिक प्रावधान
1. विधानसभा एवं लोक सभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायती राज संस्थाओं में लोक सभा और विधानसभा के प्रतिनिधियों को शामिल करना।
2. त्रिस्तरीय पंचायतों में किसी भी स्तर पर सदस्यों एवं प्रमुख के लिए पिछड़े वर्ग का आरक्षण ।
3. स्थानीय सरकार के रूप में कार्य करने के लिए पंचायतों को अधिकार एवं शक्तियां देना।
4. सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास के लिए पंचायतों को योेजना बनाने अधिकार एवं शक्तियां देना तथा 11 वीं अनुसूची के 29 कार्यों में से सभी या कुछ कार्यों को सम्पन्न करना।
5. पंचायतों को विषेष अधिकार देना, उन्हें पथकर, शुल्क आदि लगाने के लिए अधिकार देना।

Dr. BhagChandra Jain is renowned author & famous scientist in field of Agriculture. Awarded by Central & State government ,Mr. Bhag is author of more than 1700+ articles published in various international journals,magazines & books.

Currently ,Dr. Jain is working as Professor in Indira Gandhi Agricultural University .

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भारतीय आर्थिक नीतियां और कृषि

भारतीय आर्थिक नीतियां और कृषि bhagchandra.com

डॉ. भागचन्द्र जैन

प्राध्यापक कृषि अर्थशास्त्र प्रचार अधिकारी

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय,

रायपुर (छत्तीसगढ़)

 

भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ती जा रही है, जिसका आकार 156 लाख करोड़ रूपये से अधिक है! सबसे तेजी से विकास करने वाली अर्थव्यवस्थाओं के क्रम में 7.4 प्रतिशत विकास दर के साथ भारत दूसरे स्थान पर है, जबकि विश्व बैंक के अनुसार क्रय शक्ति क्षमता के आधार पर भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है ऐसा अनुमान लगाया गया है कि भारत की जनसंख्या लगभग 1.25 अरब हो चुकी है, जहां वर्ष 2015-16 में कृषि की विकास दर 1.1 प्रतिशत रही है, जबकि उद्योग की विकास की दर 3.9 प्रतिशत रही है ! भारतीय आर्थिक नीतियों में मुख्यतः विश्व व्यापार संगठन ( World Trade Organization) का समझौता, नई कृषि निति (New Agriculture Policy), विदेशी निवेश निति (Foreign Investment Policy) और आयात – निर्यात निति (Import – Export Policy) के अंतर्गत किये गये प्रयास शामिल किये गये है !

तालिका – 1 सकल घरेलू उत्पाद और उसके घटक

क्र.घटक2007-082014-15
1.कृषि और सहयोगी व्यवसाय4.91.4
2.खनिज और उत्खनन3.32.3
3.निर्मित उत्पाद8.28.4
4.विद्युत गैस एवं जल आपूर्ति5.34.2
5.निर्माण10.11.4
6.व्यापार होटल यातायात और संचार12.414.1
7.वित्त बीमा अचल संपत्ति और व्यवसाय सेवायें11.710.2
8.सामाजिक और व्यक्तिगत सेवायें6.80.1
9.कारक लागत पर सकल घरेलू उत्पाद9.07.5

 

स्त्रोत : केंद्रीय सांरिव्यकि संगठन

(अ) विश्व व्यापार संगठन का समझौता

विश्व व्यापार समझौते के लिये वर्ष 1947 में इटली में पहला सम्मलेन हुआ था, जिसमे भारत सहित 23 देश शामिल हुये थे, जो की इस समझौते के संस्थापक देश थे ! वस्तुतः यह प्रस्ताव 125 देशों के लिये दस विकासशील और दस विकसित देशों ने मिलकर बनाया था, जिसका भारत भी एक सदस्य था ! इस समझौते में बौद्धिक सम्पदा का अधिकार, निर्यात, अनुदान और कृषि आधारित उद्योगों को शामिल किया गया है ! समझौते के अनुसार किसान अपना बीज बना सकते हैं, उसे बैंच सकते हैं तथा आदान – प्रदान कर सकते हैं ! जिन वस्तुओं के आयत से भारत के किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिल पाने का खतरा होगा, उन वस्तुओं के आयत पर शासन द्वारा कर लगाने का प्रावधान किया गया है, साथ ही शासन जिन वस्तुओं का निर्यात न करना चाहे, उनका इच्छानुसार निर्यात नहीं करेगा !

(ब) विश्व व्यापार संगठन और कृषि

विश्व व्यापार संगठन द्वारा किये गये समझौते में कृषि को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, जिसमे किये गये प्रावधान इस प्रकार है :

    • विश्व व्यापार संगठन का दीर्घकालीन उद्देश्य है – आधारभूत सुधार कार्यक्रम द्वारा उचित एवं बाजार उन्मुखी व्यापार व्यवस्था स्थापित करना !
    • विकासशील देश ऐसी कृषि नीतियों का अनुसरण कर सकते हैं, जो उनके विकासात्मक लक्ष्य में सहायक हों तथा गरीबी कम करने, खाद्य सुरक्षा तथा जीविकोपार्जन से सम्बंधित हों !
    • कृषि निर्यात अनुदान को समाप्त करना !
    • विकासशील और अल्प विकसित देशों को आवश्यकतानुसार लाभ देना !
    • समस्त देशों में निष्पक्ष, स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और परस्पारिकता की निति का पालन करना !
    • सदस्य देशों के बीच आयात पर मात्रा को सीमित करने की प्रणाली को समाप्त करना !
    • जिंस के अनुसार शुल्क को सीमित करना !
    • व्यापार विकृत कृषि समर्थन को कम करना !

इस समझौते का लाभ उठाने के लिये सबसे पहले भारतीय कृषि को उत्पाद प्रतियोगिता का सामना करने के लिए सक्षम बनाना आवश्यक है ! विश्व व्यापार संगठन द्वारा अपने सदस्य देशों को बाजार निर्धारण, घरेलू समर्थन और निर्यात पर आर्थिक समर्थन हेतु प्रतिबध्द किया गया था, जिससे विश्व के कृषि बाजारों की समस्याओं के निराकरण हेतु प्रभावी कदम उठाये जा रहे है !

बाजार निर्धारण

खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा किये गये एक अध्ययन के अनुसार विश्व व्यापार समझौते के बाद निर्यात की मात्रा में मामूली सा परिवर्तन आया है ! समझौते में शुल्क की दरें ऊंची हैं – इसलिये विकासशील देशों का निर्यात रुक सा गया है ! अनाज शक्कर और दुग्ध उत्पादों की शुल्क दरें भी महंगी हैं ! समझौते के अनुसार केवल 36 शीर्ष देशों को यह अधिकार है कि यदि कृषि उत्पादों का आयात उनके घरेलू बाजार को नुकसान पहुंचाता है तो ये देश विशेष सुरक्षा के उपाय कर सकते हैं !

घरेलू सर्मथन

भारत के बारे में ऐसी धारणा बना ली गई है कि यहां का कुल समर्थन नहीं के बराबर है, इसलिये भारतीय किसानों को आर्थिक सहायता बढ़ायी जानी चाहिये, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ढांचागत समायोजन कार्यक्रम के अंतर्गत भारतीय किसानों का अनुदान समाप्त करना चाहता हैं ! वर्तमान में भारत के लगभग 55 करोड़ किसानों को केवल एक डॉलर की अप्रत्यक्ष आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाती है, ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि विकसित देशों में घरेलू आर्थिक सहायता में यदि कमी हो जाये तो कृषि उत्पादन विकसित देशों से हटकर विकासशील देशों में होने लगेगा, किन्तु गत् वर्षों के अनुभवों से प्रतीत होता है कि ऐसा नहीं हो पायेगा ! इतना ही नहीं आर्थिक सहायता मिलते रहने और मात्रात्मक प्रतिबन्ध हटाने से आयात बढ़ जायेगा !

डॉ. स्वामीनाथन की दृष्टि में समझौता

भारत में हरित क्रांति के सूत्रधार प्रसिध्द कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने विश्व व्यापार समझौते के बारे में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के अधिवेशन में कहा था कि विश्व व्यापार समझौते की शर्तों का खुलासा किया जाना चाहिये !

नई कृषि नीति

भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जिसका सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा घटता जा रहा है ! वर्ष 2000-01 में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 23.9 प्रतिशत था, जो की वर्ष 2013-14 में घटकर 13.9 प्रतिशत रह गया है ! भारत कृषि के क्षेत्र में विश्व में ‘आनुवंशिकी विभिन्नताओं का केंद्र’ है, जहां बाजार, एरण्ड, कपास, अरहर की संकर किस्में दुनिया में पहली बार विकसित की गई है ! भारत में हर विधा कृषि से जुड़ी हुई है, जहां 49 प्रतिशत जनता को इससे रोजगार मिलता है !

कृषि में बाजारू दृष्टिकोण होने के बावजूद भी आजकल कृषकों, ग्रामीणों विशेषकर युवकों की कृषि में कम रूचि दिखाई देने लगी है ! कृषि में पूंजी निवेश घटने लगा है ! राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के 59 वें सर्वेक्षण से ऐसी जानकारी मिली है कि भारत के 40 प्रतिशत किसान अब कोई और काम धंधा करना चाहते हैं ! भारतीय कृषि में खेतों का छोटा होना बाधक बना हुआ है, संयुक्त परिवारों में बटवारा होने से भूमि बटती जा रही है, जिससे छोटे किसानों की संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है !

आज का युग मशीनीकरण का युग कहलाता है, फिर भी भारतीय कृषि के अंदर यंत्रीकरण की परिधि में केवल 5 से 6 प्रतिशत क्षेत्र आ पाया है ! भारत में फल – सब्जी और दूध का भरपूर उत्पादन होता है, जिनका केवल दो प्रतिशत भाग प्रसंस्करित हो पाता है ! भण्डारण और अन्य सुविधाओं के अभाव में इनका 25 से 35 प्रतिशत तक हिस्सा खराब हो जाता है !

कृषि जलवायु की दृष्टि से सम्पूर्ण भारतवर्ष को 15 भागों में बांटा गया है ! इन भागों की विभिन्नताओं और उपयुक्तता के अनुसार फसल प्रणाली तथा कृषि कार्यमाला विकसित की जानी चाहिये ! नई कृषि नीति में कृषि विकास हेतु उठाये गये कदम इस प्रकार हैं !

  • कृषि में महत्वपूर्ण आदान सिंचाई है, इसलिये सिंचाई क्षेत्र में वृध्दि हेतु सूक्ष्म सिंचाई, उद्वहन सिंचाई, बून्द बून्द सिंचाई (Drip Irrigation) और छिड़काव सिंचाई (Sprinkler Irrigation) योजनायें चलायी जा रहीं हैं ! वर्तमान में 60 प्रतिशत से अधिक कृषि योग्य भूमि असिंचित या वर्षा जल पर निर्भर हैं, जहां सिंचाई सुविधा जुटाने की जरुरत है ! इसके अलावा वर्षा पर निर्भर रहने वाले क्षेत्रों में जलग्रहण प्रबंधन, वर्षा जल संग्रहण और भूजल पुर्नभरण (Recharging) द्वारा जल स्तर को बढ़ाया जा रहा है !
  • ऐसा अनुमान लगाया गया है कि 8 करोड़ हेक्टर कृषि भूमि को उपचार की जरुरत है !
  • वर्षा आधारित क्षेत्रों में उपयुक्त कृषि तकनीक अपनाने पर बल दिया जाये ! कृषि जलवायु के अनुसार ऐसी फसलों की खेती की जाये, जो फसल – चक्र और मिश्रित खेती की दृष्टि से उपयुक्त हो !
  • कृषि में जैविक खेती, मिश्रित खेती और पर्यावरण हितैषी पद्धतियों का समावेश किया जाये !
  • विभिन्न कृषि उत्पादों और जिंसों का बाजार से सम्बन्ध स्थापित किया जाये ! मांग के अनुरुप फसलों की खेती की जाये !

(स) विदेशी निवेश नीति

विश्व के विभिन्न देशों के साथ वर्ष 1991 तक भारत का आर्थिक एकीकरण सीमित था ! भारतीय निवेश नीति का सबसे पहले वर्ष 1992 में उदारीकरण किया गया, जिसकी प्रक्रिया को उदार बनाने का कार्य वर्ष 1995 में शुरू किया गया, जिसमें विदेशी निवेश सम्बन्धी कार्य भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय से भारतीय रिज़र्व बैंक को सौंपकर विस्तृत फ्रेमवर्क बनाया गया ! वर्ष 2000 में विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम लागू होने से विदेशों में निवेश के परिदृश्य में परिवर्तन आया ! वित्तीय वर्ष 2005-06 में शुरू किये गये अन्य उपायों से निर्यात और विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला है !

भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वव्यापी मंदी की चुनौतियों से निपटने के लिये शासन द्वारा मांग बढ़ाने, रोजगार सृजित करने के लिए विभिन्न कदम उठाये गये हैं, जिनका सकल घरेलू उत्पाद की वृध्दि दर पर अच्छा प्रभाव पड़ा है ! वर्ष 2005-06 से वर्ष 2008-09 की अवधि के दौरान विदेशी निवेश को बढ़ावा मिला है, जिससे वित्तीय सेवाओं के विनिर्माण, बैंकिंग सेवाओं, सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं तथा निर्माण जैसी आर्थिक गतिविधियों के अंतप्रवाह में वृध्दि हुई है ! वर्ष 2005-06 में यह अंतप्रवाह 8.9 करोड़ अमरीकी डॉलर था, जो की वर्ष 2007-08 में 34.4 अरब अमरीकी डॉलर हो गया है ! यह युक्तिसंगत है कि सर्विस सेक्टर के विकास और विदेशी निवेश में वृध्दि से भारत विकसित अर्थव्यवस्थाओं के सुधार का लाभ उठा सकता है ! विकसित देशों की मंदी से बाहर आने की प्रक्रिया धीमी है, जिसका लाभ भारत को मिल सकता है ! इस कथन की पुष्टि ‘आक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स’ ने सर्वेक्षण में की है !

(द) आयात निर्यात नीति

अति लघु और लघु उद्यमों को ऋण देने के लिये 4000 करोड़ रूपये की विशेष निधि प्रस्तावित की गई है, जीससे इन उद्यमों को रियायती ब्याज दर ऋण मिल सके !

व्यापार नीति में जरुरी वस्तुओं के आयात शुल्क को शासन द्वारा युक्तिसंगत बनाया गया है, जिसके अंतर्गत नवंबर 2008 से मक्खन और घी पर से सीमा शुल्क घटाकर 30 प्रतिशत किया गया और कच्चे गोंदयुक्त सोयाबीन तेल पर 20 प्रतिशत आयात शुल्क लगाया गया ! अग्रिम प्राधिकार योजना के तहत शून्य शुल्क पर कच्ची शक्कर के आयात को अनुमति दी गई, जिसमें सरकारी अभिकरण 10 लाख टन तक सफेद शक्कर निशुल्क आयात कर सकेंगे ! विश्वव्यापी निर्यात में वस्तु वर्गीकरण और समूह के अनुसार भारत का हिस्सा वर्ष 1990 में 0.5 प्रतिशत था, जो कि वर्ष 2006 में बढ़कर 1.1 प्रतिशत हो गया ! वर्ष 1990 में विश्वव्यापी निर्यात 33,03,563 लाख अमरीकी डॉलर था, जिसमें भारत का निर्यात 18,143 लाख डॉलर था ! वर्ष 2006 में विश्वव्यापी निर्यात बढ़कर 1,18,87,549 लाख अमरीकी डॉलर हो गया, जिसमें भारतीय निर्यात 12,61,260 लाख अमरीकी डॉलर शामिल था !

विश्वव्यापी चुनौतियां

आर्थिक नीतियों में आये बदलाव और उदारीकरण की प्रक्रिया से भारतीय अर्थव्यवस्था को सम्बल अवश्य मिला है, किन्तु इस वर्ष के भीषण सूखे ने कृषि विकास को झकझोर दिया है ! विश्वव्यापी मंदी का असर उद्योगों पर भी पड़ा है ! कृषि से सर्वांगीण विकास को सार्थक बनाने के लिए भारत में अनुदान की राशि में वृध्दि की जरुरत है ! यह विडंबना है कि 21 विकसित देशों को कुल 250 बिलियन डॉलर वार्षिक अनुदान व्यापार हेतु दिया जाता है, जबकि शेष बचे हुये देशों को केवल 50 बिलियन डॉलर अनुदान दिया जाता है ! भारत में सकल घरेलू उत्पाद का 1.3 प्रतिशत अनुदान कृषि को दिया जाता है, जबकि विश्व व्यापार संगठन से पहले यह अनुदान 5 प्रतिशत था !

भारत विकासशील देश है, जिसे वर्ष 2020 तक विकसित राष्ट्र के रूप में देखने का लक्ष्य रखा गया है ! वैश्वीकरण और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में कृषि और अन्य व्यवसायों में गुणवत्तापूर्ण उत्पादों का उत्पादन आवश्यक है ! कृषि में व्यवसायिक दृष्टिकोण अपनाकर उसे बाजार से जोड़ना भी जरुरी है, ऐसा होने पर ही भारतीय आर्थिक नीतियों के प्रावधानों और अवसरों का लाभ मिल पायेगा तथा विश्वव्यापी चुनौतियों से सामना करने के लिये समक्ष हो सकेंगे !

भारत से निर्यात, वर्ष 2014-15

 

उत्पादमात्रा करोड़ टनमूल्य करोड़ रूपये
अनाज
बासमती चावल3.70227598
गैर बासमती चावल822520336
गेहूँ29144974
अन्य अनाज35105258
सब्जी20194611
फल4843148
मूंगफली7084675
अनाज निर्मित उत्पाद3063033

ग्रामीण पारिवारिक बजट पर वैश्वीकरण का प्रभाव

डॉ. भागचन्द्र जैन

प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र), प्रचार अधिकारी

इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय,

रायपुर 492012 (छत्तीसगढ़)

विश्व व्यापार संगठन डब्ल्यु. टी. ओ. के प्रावधानों का विन्दुवार अध्ययन कर यदि कदम उठाये जायें तो इसके प्रावधान कृषि विकास में लाभकारी हो सकता हैं ! डब्ल्यु. टी. ओ. से किये गये समझौते से किसानों के लिए आशातीत परिणाम सामने आयेंगे, उदाहरण के लिए जब गेहूँ का व्यापार एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रतिबंधित था, तब किसानों को उसका सही मूल्य नहीं मिल पता था, लेकिन जैसे ही राज्यों के बीच से प्रतिबन्ध हटाया गया – तब किसानों को खुली स्पर्धा से अच्छा भाव मिलने लगा ! केंद्रीय पूल- bhagchandra.com में 1 जनवरी 2011 को अनाज का संग्रहण 470 लाख टन होने के बावजूद भी किसानों को अनाज का अच्छा भाव मिल रहा है! यदि इसी प्रकार प्रतिस्पर्धा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होगी, तब किसानों को उनकी जिंस का और अच्छा मूल्य मिलेगा !

भारत की तुलना में जापान में लागत और प्रतिफल का अनुपात चार गुना अधिक है, इसलिए अच्छे बीज और महंगी तकनीक अपनाकर जापान का किसान अधिक उत्पादन लेता है, जबकि भारत में इसके विपरीत परिस्थिति है! यहाँ फसल उत्पादन में अधिक लागत लगाने से लागत और प्रतिफल का अनुपात कम लाभ वाला होता है तथा बाजार में जोखिम अधिक रहती है, इसलिए भारतीय किसान उन्नत तकनीक अपनाने से डरते है! यह समझौता लागू होने से किसानों को उनके उत्पादन का प्रतिस्पर्धा मूल्य दिलायेगा !

विश्व व्यापार समझौता

इस समझौते के लिए वर्ष 1947 में इटली में पहला सम्मलेन हुआ था, जिसमें भारत सहित 23 देश शामिल हुये थे, ये देश समझौते के संस्थापक देश थे ! वस्तुतः यह प्रस्ताव 125 देशों के लिए 10 विकासशील और 10 विकसित देशों ने मिलकर बनाया था, जिसमें भारत भी एक सदस्य था ! भारत कृषि के क्षेत्र में विश्व में ‘आनुवंशिकी विभिन्नताओं का केंद्र’ हैं, जहां बाजरा, एरण्ड, कपास, अरहर की संकर किस्में दुनिया में पहली बार विकसित की गई, जिनका उपयोग कई देश कर रहे हैं ! भारत में हर विधा कृषि से जुड़ी हुई हैं, जहां 58.2 प्रतिशत जनता की आजीविका कृषि पर आधारित हैं ! इतनी बड़ी आबादी का भविष्य विश्व व्यापार समझौते से जुड़ा हुआ है ! यह समझौता वर्ष 1994 में हुआ था ! डब्ल्यु. टी. ओ. की स्थापना 1 जनवरी 1995 को जिनेवा स्विट्जरलैंड में की गई, जिसके वर्तमान में 153 देश सदस्य हैं ! उसके बाद नवंबर 2001 में इसकी बैठक हुई, जिसमें वैश्वीकरण पर जोर देते हुये खेती पर अनुदान और प्रतिबंधों पर विचार किया गया ! इसकी छटवीं मंत्रिमंडलीय बैठक 13 से 18 दिसंबर 2005 तक हांगकांग में हुई, जिसमें दोहा सम्मलेन की विकास कार्यसूची(Agenda)  के निष्कर्षों को वर्ष 2006 तक प्रभावी करने पर सहमति व्यक्त की गई ! हांगकांग बैठक में वर्ष 2013 तक विकासशील देशों द्वारा कृषि में निर्यात हेतु अनुदान जारी रखने का निर्णय लिया गया !

कृषि सम्पदा

भारत में बड़ी संख्या में कृषि विश्वविद्यालय, अनुसन्धान निदेशालय, अनुसन्धान केंद्र, कृषि वैज्ञानिक होने के साथ साथ विश्व की तुलना में सस्ता श्रम भी उपलब्ध हैं ! जलवायु की विभिन्नता के अनुरुप भारत में अनुसन्धान किया जा रहा है ! भारत में बाजरा, एरण्ड, कपास, अरहर की संकर किस्में दुनिया में पहली बार विकसित हुई हैं, जिनका उपयोग कई देश कर रहे है ! इसी प्रकार गन्ने की कुछ उन्नत किस्में भी भारत में विकसित हुई है ! विश्व व्यापार समझौते से कृषि क्षेत्र में लाभ होगा ! भारत में हर विधा कृषि से जुड़ी हुई है ! समझौते के बाद किसान अपना बीज बना सकते है; उसे बैच सकते है, आदान प्रदान कर सकते है ! विश्व व्यापार समझौते में ऐसा प्रावधान किया गया है कि जिन वस्तुओं के आयात से भारत के किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिल पाने का खतरा होगा, उन वस्तुओं के आयात पर शासन द्वारा कर लगाया जायेगा, साथ ही भारत जिन वस्तुओं का निर्यात न करना चाहे, उन्हें इच्छानुसार निर्यात नहीं करेगा ! नई बीज निति में सब्जियों, शोभाकारी फूलों के बीजों के आयात पर से प्रतिबन्ध हटा लिया गया है, जिससे इन बीजों की बिना पर्याप्त जाँच-परख किये आयात किया जा रहा है, ऐसे बीजों के आयात से भारत में कीट-बीमारियों के आने का खतरा हैं !

बाजार निर्धारण

खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार विश्व व्यापार समझौते के बाद निर्यात की मात्रा में मामूली सा परिवर्तन हुआ है ! समझौते में शुल्क की दरें ऊँची हैं ! इसलिए विकासशील देशों का निर्यात रुक सा गया है ! अनाज शक्कर और दुग्ध उत्पादों की शुल्क दरें भी महंगी है ! समझौते के अनुसार केवल 36 शीर्ष देशों को यह अधिकार है कि कृषि उत्पादों का आयात करके घरेलू बाजार को नुकसान पहुंचाता है तो ये देश विशेष सुरक्षा के उपाय कर सकते हैं !

तालिका – गेट और डब्ल्यू. टी. ओ. व्यापार

स्थानशुरू होने की दिंनाकअवधि (माह में)शामिल देशचर्चा के विषयउपलब्धि
जिनेवाअप्रैल 1947723शुल्क दरेंगेट पर हस्ताक्षर
एन्नेसीअप्रैल 1949513शुल्क सूचीविभिन्न देशों में 5000 शुल्क दरों में रियायतों का विनिमय
टोरक्वायसितंबर 1950838शुल्क सूचीविभिन्न देशों में 8700 शुल्क दरों में रियायतों का विनिमय
जिनेवा-IIजनवरी 1956526शुल्क सूची, प्रवेश25 करोड़ डालर की शुल्क दरों में रियायत
डिल्लोनसितंबर 19601126शुल्क सूची49 करोड़ डालर की शुल्क दरों में रियायत
केन्नेडीमई 19643762शुल्क सूची400 करोड़ डालर के विश्व व्यापार की रियायत
टोकियोसितंबर 197374102आधार-भूत अनुबंध3000 करोड़ डालर की शुल्क दरों में रियायत
उरूग्यायसितंबर 198687123बौध्दिक सम्पदा कृषि वस्त्र विवाद40 प्रतिशत शुल्क दरों में रियायत
दोहानवंबर 2001141कृषि वस्त्र पर्यावरण पेटेंटठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे

 

घरेलू समर्थन

विश्व व्यापार समझौते से विकसित देशों के किसानों को अधिक लाभ पंहुचा है ! भारतीय किसानों को आर्थिक सहायता बढ़ायी जनि चाहिये ! ढांचागत समायोजन कार्यक्रम के अंतर्गत विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष भारतीय किसानों का अनुदान समाप्त करना चाहता है ! भारत के लगभग 55 करोड़ किसानों को केवल एक करोड़ डॉलर की अप्रत्यक्ष आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाती है !

निर्यात हेतु सहायता

डब्ल्यू. टी. ओ. द्वारा 25 देशों को कृषि और अन्य वस्तुओं का निर्यात बढ़ाने के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी जाती है ! भारत इस सहायता के लिए इच्छुक है !

डॉ. स्वामीनाथन की दृष्टि में विश्व व्यापार समझौता

भारत में हरित क्रांति के सूत्रधार प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम. एस. स्वामीनाथन ने विश्व व्यापार समझौते के बारे में भारतीय विज्ञानं कांग्रेस के अधिवेशन में कहा था की विश्व व्यापार समझौते की शर्तों का खुलासा किया जाना चाहिये ! भारत की 58.2 करोड़ जनता की आजीविका कृषि पर आधारित है, जिसका भविष्य इस समझौते से जुड़ा हुआ है ! विश्व व्यापार समझौते को लेकर कृषि क्षेत्र में भ्रांतिया है  बीज से लेकर विपणन और आयात निर्यात तक शंकायें फैली हुई है !

विश्व व्यापार समझौते का लाभ प्राप्त करने के लिए सबसे पहले भारतीय कृषि को उत्पाद स्पर्धा का सामना करने के लिए समक्ष बनाना होगा, तदुपरांत इस समझौते की लाभ-हानि का बारीकी से अध्ययन करना होगा डब्ल्यू. टी. ओ. के प्रावधानों के अध्ययन और किसानों के मार्गदर्शन देने के उद्देश्य से अध्ययन पीठ बनाने का प्रयास किया जा रहा है ! विश्व व्यापार संगठन द्वारा अपने सदस्य देशों को बाजार निर्धारण, घरेलू समर्थन और निर्यात पर आर्थिक समर्थन हेतु प्रतिबद्ध किया गया था, जिससे विश्व के कृषि बाजारों की समस्याओं के निराकरण हेतु प्रभावी कदम उठाये जाने थे !

सन्दर्भ :- जैन, भागचन्द्र (2003) विश्व व्यापार समझौता और कृषि ए जर्नल ऑफ़ एशिया फार डेमोक्रेसी एण्ड डेवलपमेंट III (1-2) : 140-143

जैन, भागचन्द्र (2003) विश्व व्यापार संगठन और भारतीय किसान नवभारत, 30 मार्च

शर्मा, देवेन्द्र (2001) विश्व व्यापार संगठन से भारतीय किसानों का अहित युग अभियान रिपोर्टर 2 (41-42):7

श्रीवास्तव, आशीष (2002) कृषि क्षेत्र में निर्यात उद्यमिता समाचार पत्र 11 (8):29-30

 

 

 

 

 

 

अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष -2012

डॉ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)

 

सहकारिता की महिमा लिखी है, ऋग्वेद-अर्थवेद में |
इसमें सब कुछ दिखता है, इन्द्रधनुषी रंगों के भेद में ||
प्रगति की पौ बारह होगी 2012 में, सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा है सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

भारत के गाँव में विश्व का सबसे बड़ा सहकारी नेटवर्क |International Cooperation Year - bhagchandra.com
जन आन्दोलन यह, जो मिटा रहा अमीरी-गरीबी का फर्क ||
समानता और खुशहाली के लिए, सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

अनेकता में एकता से शोभित है, प्यारा हमारा भारत देश |
‘सब एक के लिए एक सबके लिए’ में सहकारिता विशेष ||
यत्र-तत्र-सर्वत्र विकास के लिए, सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

कृषि दुग्ध, सिंचाई, आवास आदि में इसका सहारा |
साख से साख यह बढ़ाये, बने बचत का आधार ||
विश्व व्यापीकरण के इस दौर में, सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

सर्व संपन्न हो दुनिया सारी, प्रगति है वरदान सहकारी |
सहकारी पथ पर बढ़ते जाओ, हर क्षेत्र में सफलता पाओ ||
घर में, बाहर में, गाँव.गाँव में, तुम सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

प्रचार अधिकारी

कृषि महाविद्यालय, रायपुर

 

जल वर्ष-2016

प्रो. (डॉ.) भागचंद्र जैन

शास्त्रों में लिखी है जल की महिमा |
सागर और नदियों से है हरीतिमा ||
जल से जीवन, जल से है संसार |
जल के बिना, सूना है सब संसार ||

पानी है सचमुच, प्रकृति का वरदान |
पानी से पेड़-पौधे, पनी से इन्सान ||
अतः जल की कीमत को पहचानों |
बूंद.बूंद कितनी अमूल्य, यह जानो ||

जल का संरक्षण हमारा कर्म है |
जल का संरक्षण हमारा धर्म है ||
प्रयत्न करो, असंभव को संभव बनाओ |
मेहनत करो, कठौती में गंगा लाओ ||

पर्यावरण सुधारो, वृक्ष लगाओ |
जल के चक्र को उचित बनाओ ||
पानी से सब कुछ, पानी से जिंदगानी |
बूंद.बूंद बचाओ, गढ़ो नई कहानी ||

जल की रक्षा के लिये कीजिये प्रयास |
जिससे बुझे, पेड़-पौधों, जीवों की प्यास ||
सुखा-बाढ़, तूफान मान जायेगा हार |
जल वर्ष-2016 को सार्थक बनाओ ||

प्रचार अधिकारी
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय,
रायपुर 492006 (छत्तीसगढ़)

दलहन उत्पादन के लिए छत्तीसगढ़ को कृषि कर्मण अवार्ड

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
कृषि महाविद्यालय, रायपुर – 492012

Pulses production Chhattisgarh Krishi Karman Award - bhagchandra.com

‘कृषिरेव महालक्ष्मीः’ अर्थात् कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिशत व्यक्ति खेती कर रहें हैं। भारत सबसे बड़ा चांवल उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 के अनुसार भारत की आर्थिक पिकरा इी 7.4 प्रतिशत रहीं है। दालों में प्रोटीन, अमीनां अम्ल, विटामिन्स, खनिज पाये जाते हैं, इनमें प्रोटीन को प्रकृति का अनमोल उपहार कहा जाता है, विश्व के 171 देशों में विभिन्न प्रकार की दलहनी फसलों का आहार में उपयोग प्रोटीन की पूर्ति हेतु किया जा रहा है। दालों की उपयोगिता के कारण संयुक्त राष्ट्र महासभा की 68 वीं बैठक में वर्ष 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष घोषित किय गया है। आज प्रति दिन प्रति व्यक्ति दलहन उपलब्धता 41 ग्राम है, जोकि अनुशंसित मात्रा से 50 प्रतिशत कम है।

                      छत्तीसगढ़ में वर्ष 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि हर 13.20 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। प्रदेश में कृषि विकास की दर 14.18 प्रतिशत आंकी गई है, जिसमें कृषि साथ-साथ सहयोगी व्यवसाय पशुपालन, वानिकी, मत्स्य आदि शामिल हैं। यहां उद्योग की विकास दर 10.62 प्रतिशत हेाने का अनुमान लगया गया है, जिसमें खनिज, निर्माण, मेनुफेक्चुरिंग, विद्युत, गैस और जल आपूर्ति को शामिल किया गया है। प्रदेश में सेवा क्षेत्र की विकास दर का अनुमान 15.21 प्रतिशत लगाया गया है। यहां वर्ष 2014-15 में प्रति व्यक्ति आय 64442 रूपये आंकी गई है, जो कि वर्ष 2013-14 में 58547 रूपये थी।

                      कृषि से सर्वांगीण विकास को साकार करने केे लिए शासन द्वारा किसान उपयोगी योजनाए चलायी जा रही हैं, अनुदान दिया जा रहा है तथा प्रोत्साहन हेतु पुरस्कार दिये जा रहे हैं। वर्ष 2014-15 में कृषि उत्पादन में श्रेष्ठता के लिए विभिन्न वर्गाें मं पुरस्कार घोषित किये गये हैं, जिसमें सकल खाद्यान्न उत्पादन, एक फसल और कुल उत्पादन में वृद्धि के आधार पर ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ दिये जायेंगे ।

                      छत्तीसगढ़ को तीन बार वर्ष 2010-11, 2012-13 और 2013-14 में चावल उत्पादन के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार मिल चुका है। अब दलहन की खेती के लिए प्रदेश को कृषि कर्मण पुरस्कार से सम्मानित किया जायेगा। इस पुरस्कार के लिए छत्तीसगढ़ का चयन वर्ष 2014-15 में दलहनी फसलों के उत्पादन में शानदार प्रदर्शन पर किया गया है। यहां वर्ष 2014-15 में 7.85 लाख हेक्टेयर रकबे में दलहनी फसलों की खेती की गई, जिसमें 6.55 लाख टन उत्पादन प्राप्त हुआ। यह उत्पादन वर्ष 2013-14 की तुलना में 39 प्रतिशत अधिक है।
तालिका: छत्तीसगढ़ में खाद्यान्न फसलों का क्षेत्रफल एवं उत्पादन

फसल
2012-13
क्षेत्रफल लाख हैउत्पादन लाख टन
2013-14
 क्षेत्रफल लाख हैउत्पादन लाख टन
2014-15
क्षेत्रफल लाख हैउत्पादन लाख टन
वर्ष 2013-14 की तुलना में वृध्दि
चावल
37.8573.40
38.0267.16
138.09175.90
13
मक्का1.072.071.112.291.222.300
मोटे अनाज2.642.452.392.642.472.650
कुल अनाज41.5077.2641.4371.1441.5379.9012
अरहर0.520.320.510.310.530.3410
चना2.672.852.762.132.802.9036
अन्य दलहन5.733.204.782.274.523.3146
कुल दलहन8.926.378.054.717.856.5539
कुल खाद्यान्न50.4283.6349.4875.8549.3986.4414

कृषि तकनीकी का सामयिक चित्रण

किसान मेले में

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
कृषि महाविद्यालय, रायपुर – 492012

                राज्य के प्रत्येक जिले में किसान मेले आयोजित किये जाने चाहिये। कृषि विकास में किसान मेलों की महत्वपूर्ण भूमिका से कृषि एवं संबंधित विभाग प्रभावित हुए हैं। वास्तव में किसान मेला कृषि तकनीकी का सामयिक आयोजन होता है, जिसमें किसान भाग लेकर प्रत्यक्ष लहलहाती फसलों को देखते हैं तथा उन्नत बीज, कृषि यंत्र, पौध संरक्षण सामग्री को देखकर उन्हें अपनाते हैं। किसान मेले में कृषि से संबंधित सभी गतिविधियों को शामिल करने का प्रयास किया जाता है। इस अवसर पर लगायी गई प्रदशनी में चित्र, चार्ट, पोस्टर आदि का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे किसानों को नई कृषि तकनीक की जानकारी मिलती है।

                किसान मेले का कृषि तकनीकी का सामयिक चित्रण - bhagchandra.comसबसे महत्वपूर्ण भाग होता है- किसान गोष्ठी, जिसमें किसान सीधे कृषि वैज्ञानिकों से अपने प्रश्न पूछकर अपनी समस्याओं का समाधान करते हैं अर्थात किसान गोष्ठी में कृषि वैज्ञानिकों और किसानों का सीधा संवाद होता है किसान मेला, कृषक दिवस, दलहन दिवस तिलहन दिवस, सोयाबीन दिवस, आलू दिवस, समय-समय पर आयोजित किये जाते हैं, जिनके आयोजन का सिलसिला वर्ष भर चलता रहता है। किसान मेले कृषकों के कितने हित में होते हैं, किसान इनका लाभ कैसे उठायें, यह जानकारी प्रस्तुत लेख मंे दी जा रही हैं।

                अंग्रजी की एक कहावत है – ‘र्सीइंग इज ब्लिविंग’ (Seeing is Bleving) अर्थात देखकर जल्दी विश्वास होता है। किसान मेले में प्रक्षेत्र भ्रमण के साथ-साथ प्रयोगशाला की तकनीकी प्रदर्शित की जाती है, जिसमें किसान नवीनतम तकनीक जैसे ऊतक संवर्धन, सत्य बीज से आलू उत्पादन आदि को प्रत्यक्ष देखकर काफी प्रभावित होते हैं तथा समुदाय में नई तकनीक अपनाने का विचार बनाते हैं।

                किसान मेले में दूर-दूर से आकर किसान भाई, एक-दूसरे से मिलते हैं तथा आपस में विचार-विमर्श कर अपने अनुभव बांटते हैं। किसान मेला के अवसर पर लगायी गई प्रदर्शनी में शासकीय, सहकारी तथा निजी संस्थाये अपनी-अपनी प्रदर्शनी या स्टाल लगाती हैं, जिनमें तरह-तरह के आदान उपलब्ध होते हैं, यदि किसान चाहें तो इन कृषि आदानों को वे खेरीद सकते हैं।

                कृषि विकास कार्यक्रमों को कृषि जलवायु के आधार पर क्रियान्वित किया जा रहा है तथा विभिन्नताओं को देखते हुये ‘कृषि जलवायु क्षेत्रीय परियोजना’ के क्षेत्र बनाये गये हैं, छत्तीसगढ़ में उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र, छत्तीसगढ़ का मैदान तथा बस्त्र का पठार नामक तीन जलवायु क्षेत्र बनाये गये हैं। इन जलवायु क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले 27 जिलों में कृषि विकास दु्रत गति से होगा। कृषि प्रसार की दृष्टि से क्षेत्र की विभिन्नता का पता लगाया जाता है तथा सामूहिक विकास हेतु व्यवहारिकता के अनुसार योजना बनायी जाती है, फिर लक्ष्य निर्धारित कर योजनाकी विषय वस्तु निश्चित की जाती है। किसान मेले में कृषि प्रसार की पांच अवस्थाएं एक साथ परिलक्षित होती हे, जहां किसान अपनी स्थिति, उपयुक्तता, व्यवहारिकता, लक्ष्य और अपनाने के बारे में निर्णय ले सकते हैं।

                 किसान मेले में सामयिक तकनीक का सजीव चित्रण किया जाता है, जिसमें बहुत कम समय में बड़ी संख्या में किसान भाग लेते हैं, खरीफ और रबी में किसान मेले आयोजित किये जाते हैं, किसान मेले का उद्देश्य सूचना के प्रसार तक सीमित नहीं होता है, बल्कि कृषि तकनीक के संदेश को ग्रहण करने पर आधारित होता है। मेले में प्रत्यक्ष देखने से विश्वास गहरा होता है। किसान मेले की सफलता का आंकलन हमें उपस्थित कृषकों की भीड़ से नहीं लगाना चाहिये, अपितु नई तकनीक को अपनाने से लगाना चाहिये।

                किसान मेेले में उत्कृष्ट सब्जी तथा फलों के नमूनों को प्रदर्शित किया जाता है, मेले में एक और जहां हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और नीली क्रांति प्रदर्शित की जाती है, वहीं कृषि के साथ-साथ सहयोगी व्यवसाय अपनाने के लिये प्रेरित किया जाता है। किसान मेले का आयोजन जिला, आंचलिक, प्रांतीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है, जिसमें सैकड़ों-हजारों की संख्या में दूर-दूर से आकर किसान भाग लेते हैं तथा उन्नत कृषि तकनीक से प्रभावित होकर उसे अंगीकार करते हैं।

केंद्रीय बजट और किसान

डॉ. भागचंद्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
कृषि महाविध्यालय, रायपुर-492012

‘कृषिरेव महालक्ष्मी:’ अर्थात् कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है !  भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिशत व्यक्ति खेती कर रहे हैं ! भारत विकासशील देश है ! भारत सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है, जहां विश्व में सबसे ज्यादा दूध और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है ! आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान 7.00 से 7.50 के मध्य लगाया गया है ! सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान हर साल घटता जा रहा है ! भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2015-16 में कृषि एवं सहयोगी क्षेत्र में विकास दर  1.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है ! वर्ष 2014-15 में खाद्यान्न उत्पादन 25.30 करोड़ टन हुआ था, जिसमे वर्ष 2015-16 में आधा प्रतिशत कमी का अनुमान लगाया गया है ! वर्ष 2014-15 में खाद्यान्न उत्पादन 25.30 करोड़ टन हुआ था, जिसमे वर्ष 2015-16 में आधा प्रतिशत कमी का अनुमान लगाया गया है !

                       कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए वर्ष 2016-17 के बजट में विभिन्न प्रावधान किये गये हैं ! कृषि और सम्बंधित गतिविधियों के लिए 35984 करोड़ रूपये आवंटित किये हैं ! वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया हैं ! केंद्रीय बजट में कृषि विकास के लिए कई योजनाओं की घोषणा की गयी है, जैसे – कृषि साख में वृध्दि, सिंचाई और जैविक खेती को बढ़ावा, फसल बीमा को प्रोत्साहन, उर्वरक अनुदान खाते में, कृषि विपणन एवं खाद्य प्रसंस्करण पर जोर आदि !

केंद्रीय बजट और किसान - bhagchandra.com
  • कृषि साख                                                                                                                                                                      

                      कृषि में ऋण इंजेक्शन की भूमिका निभाता है ! किसानों को समय पर कर्ज मिलेए जिससे कृषि में पूंजी निवेश बढ़े ! केंद्रीय बजट में कृषि ऋण के लिए 9 लाख करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया हैए जो की वर्ष 2015-16 में 8.5 लाख करोड़ रूपये था ! भारत कर्ज प्रधान देश हैए जहां किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा हैए बजट में इस बोझ को काम करने के लिए 15 हजार करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है ! कृषि में ऋण का प्रावधान बढ़ने से उन्नत तकनीक को बढ़ावा मिलेगा तथा किसानों की आमदनी बढ़ेगी!

 

  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना                                                                                                                                            

                      बजट में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को मिशन माड में  लागू करने की घोषणा की गई है ! सिंचाई की 89 परियोजनाओं को फास्ट ट्रेक किया जायेगाए जिसके लिए अगले पांच वर्षो में 86,500 करोड़ रूपये की आवश्यकता होगी ! जिससे 28 लाख हेक्टेयर में सिंचाई सुविधायें विकसित की जायेगी ! इनमें से 23 परियोजनाओं को 31 मार्च 2017 से पहले पूरा किया जायेगा ! प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना का उद्देश्य हर किसान की भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना है और सरकार का लक्ष्य ‘हर बून्द के साथ अधिक फसल’ के जरिये पानी का उचित उपयोग करना है, सिंचाई सुविधा बढ़ने से फसल विविधिकरण को बढ़ावा मिलेगा !
सिंचाई के लिए राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के अधीन 20 हजार करोड़ रूपये की निधि रखी गई है ! भू जल पुर्णमरण के लिए बजट में 60 हजार करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है !

 

  • उर्वरक अनुदान सीधे खाते में                                                                                                                                                    

                      किसानों को उर्वरकों पर मिलने वाला अनुदान अब सीधे उनके खाते में जमा होगा ! केंद्रीय बजट में ऐसा प्रावधान होने से किसानों को उचित मूल्य पर उर्वरक मिलेंगे !

 

  • जैविक खेती

बदलते हुये परिवेश में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है, इसलिये केंद्रीय बजट में जैविक खेती विकास हेतु 400 करोड़ रूपये आवंटित किये गए हैं ! जैविक खेती पांच लाख एकड़ में की जाएगी ! परम्परागत् कृषि विकास योजना के अंतर्गत आगामी तीन वर्षों में जैविक खेती पर 5 लाख करोड़ रूपये खर्च किये जायेंगे !

 

  • फसल बीमा

कृषि मौसमी व्यवसाय है, जहां प्राकृतिक आपदा के कारण फसलें खराब हो जाती हैं ! इन फसलों के नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए बजट में 5500 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है !

 

  • कृषि विपणन

                     फसलों, कृषि उत्पादों को उचित मूल्य दिलाने के लिए केंद्रीय बजट में प्रावधान किया गया है ! किसान उत्पादक अपनी फसलों, उत्पादों को विभिन्न मंडियों में बेंच सकेंगे ! राष्ट्रीय कृषि बाजार से देश की लगभग 550 मंडिया 14 अप्रैल 2016 से जुड़ेंगी, ऐसा होने से मध्यस्थों की भूमिका कम होगी ! बजट में प्रावधान है की कृषि मंडी कानून में परिवर्तन कर उसे व्यवहारिक बनाया जायेगा ! भारतीय खाद्य द्वारा ऑनलाइन खरीदी की जायेगी !

 

  • खाद्य प्रसंस्करण

केंद्रीय बजट में प्रावधन किया गया है कि खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए उसमे 100 % विदेशी निवेश किया जा सकेगा !

 

  • दलहन विकास

आहार में दलहन की उपलब्धता दिनों – दिन कम होती जा रही है, इसलिए दलहन उत्पादन के लिए बजट में 500 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है ! दालें महँगी होती जा रहीं हैं, जिसके लिए बाजार स्थिरीकरण कोष हेतु 500 करोड़ रूपये दिए जायेंगे !

 

  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड

खेती मिट्टी पर आधारित होती है, जैसी मिट्टी होगी, जैसे उसमें पोषक तत्व होंगे – वैसी ही फसलों की खेती की जायेगी ! इसके लिए मिट्टी का स्वास्थ्य जानना आवश्यक है ! बजट में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना में 14 करोड़ किसानों को शामिल करने के लक्ष्य निर्धारित किया गया है !

 

 

 

सहकारी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

‘यत्र नारी पूज्यन्ते, तत्र रमन्ते देवता‘ शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है। भारतीय संस्कृति में नारी का योगदान स्मरणीय रहा है। समय परिवर्तनषील है, आज महिलायें अपनी योग्यता, गुणवत्ता, षिक्षा कार्य कुषलता के आधार पर पुरूषों के बराबर कार्य कर रही हैं तथा कुछ क्षेत्रों में महिलायें आगे भी हैं क्योंकि पुरूषों की तुलना में महिलाओं में धैर्य, नम्रता तथा विभिन्न परिस्थितियों में अपने आपको ढालने, घुल-मिल जाने की क्षमता प्रायः अधिक रहती है। बालिका से लेकर महिलाओं तक इनमें एक अच्छे प्रबंधन की क्षमता होती है किन्तु यह विडम्बना है कि भारत के व्यवसायों में महिलाओं की भागीदारी केवल 5 प्रतिषत है। सहकारिता के क्षेत्र में ‘ लिज्जत पापड़‘ उद्योग महिलाओं की अप्रत्याषित सफलता की कहानी सुना रहा है, लिज्जत पापड़ जैसे उद्योगों सें महिलायें अनुसरण कर सकती हैं।

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           ‘पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ग्रामीण विकास हेतु तीन आवष्यकतायें बतायी थीं – ग्राम पंचायत, सहकारी समिति और पाठशाला।  ग्राम पंचायत से सामाजिक उद्देष्यों की पूर्ति होती है,  सहकारी समिति से आर्थिक उद्देष्यों की पूर्ति होती है, और पाठशाला से शैक्षणिक उद्देष्यों की पूर्ति होती है।  गांव-गांव में ये तीनों संस्थायें कार्यरत हैं, बस जरूरत है इन संस्थाओं की समर्पण भावना से कार्य करने की।  पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सहकारिता में महिलाओं की भूमिका इस प्रकार बतायी थीं – ‘यदि जनता में जागृति पैदा करनी है तो पहले महिलाओं में जागृति पेैदा करों।  एक बार जब वे आगे बढ़ती हैं तो परिवार आगे बढ़ता है, गांव व शहर आगे बढ़ता है – सारा देश आगे बढ़ता है।‘

                        सहकारिता में महिलायें आगे आ सकती हैं, यदि वे संगठित हो जायें तथा सहकारी समिति गठित कर अपनी जरूरतों को पूर्ण करने में सक्षम बने। हमारे कृषि प्रधान देष में फसलों की बुवाई से लेकर कटाई तक के 5.0 प्रतिषत से अधिक कार्य महिलायें करती हैं  तो क्या वे मसाला, पापड़, दाल, बिसकुट, फल सब्जी संरक्षण में आगे्र क्यों नहीं आ सकती हैं – बस जरूरत है इनके मार्गदर्षन की ओर महिलाओं को जागृत करने की।

                         भारत का दुग्ध उत्पादन में विष्व में पहला स्थान है। यह गौरव का विषय है कि भारत में स्थित विभिन्न डेरियों में 18 लाख स्त्रियां कार्य कर रही हैं तथा वे दुग्ध उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। दुग्ध सहकारिता के क्षेत्र में गुजरात में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। सहकारी संस्थाओं की संख्या में वृद्वि हो और उनमें महिलाओं की अधिक से अधिक भागीदारी बढ़े, इसके लिए सहकारी नियमों, उप नियमों में संषोधन कर महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिष्चित किया गया है।

                         पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं में बचत करने की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है, इसलिए सहकारी साख समितियों में बचत बैंक खोले गये हैं।  महिलाओं की आर्थिक उन्नति के लिए विभिन्न योजनायें संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं में अनुदान भी दिया जा रहा है।

                         सदियों से उद्यम और परिश्रम के लिए महिलायें मषहूर रही हैं, परन्तु उन्हें जरूरी सहायता नहीं मिल पायी है, जिसके कारण वे देष में हो रहे विकास से लाभान्वित नहीं हो पायी हैं।  ऐसा प्रतीत होता है कि विकास के संसाधन जैसे – ऋण, तकनीकी, प्रषिक्षण, उन्नत औजार – उपकरण तथा वितरण के अवसर का अधिकांष लाभ पुरूषों पर केंद्रिक रहा है। इस असंतुलन को दूर करने के लिए उद्योगों से महिलाओं को जोड़ने के लिए प्रयास किये जा हैं,  जैसे – हाथ  करघा संचालनालय, रेषम संचालनालय, खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड, हस्त षिल्प विकास निगम, चर्म विकास निगम, चर्म विकास निगम, बुनकर सहकारी संघ, पावरलूम सहकारी संघ तथा औद्योगिक सहकारी संघ में महिला उद्यमियों की भागीदारी सुनिष्चित की गई है।

                        कृषि कार्यों और दुग्ध व्यवसाय में महिलायें लगी हुई हैं, वे स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं है – इन बातों को सभी जानते हैं। अकेली कृषि से ही गांवों का विकास नहीं हो सकता, क्योंकि दिनों दिन जनसंख्या बढ़ती जा रही है। अब कृषि के साथ-साथ कृषि आधारित व्यवसायों, ग्रामोद्योगों को भी बढ़ावा देना होगा।  ग्रामोद्योगों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रमुख कदम उठाये जा रहे हैं, जैसे –

  • महिलाओं के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का लाभ पहुंचाने हेतु महिला तथा पुरूषों की गणना पृथक रूप से की जा रही है।
  • शासकीय कार्यक्रमों के विभिन्न अंतर्गत ग्रामोद्योगों में कम से कम 50 प्रतिषत महिला हितग्राही शामिल किये जा रहें है।
  • महिला उद्यमियों को सभी प्रषिक्षण कार्यक्रमों में अनिार्य रूप से शामिल किया जा रहा है।
  • ग्रामोद्योगों के लिए जिला ग्रामीण विकास अभिकरण, महिला एवं बाल विकास विभाग, लोक  स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा जरूरी सुविधायें उपलब्ध करायीं जा रहीं हैं।
  • महिलाओं में उद्यमिता बढ़ाने के लिए अषासकीय संस्थाओं और महिला समूहों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है!
  • महिलाओं को पंचायती राज के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी देकर ग्रामोद्योग को बढ़ावा दिया जा रहा है।                                                                                                                                                                                                                                                            महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने के लिए सहकारिता महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है, यदि उन्हें साधन और पूंजी सहकारिता द्वारा उपलब्ध करा दी जाती है तो वे विपणन, बचत, उत्पाद की गुणवत्ता और आमदनी बढ़ाने में आगे आ सकती हैं।

अधिक गुणकारी है कुसुम के फूलों की चाय

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

छत्तीसगढ़ में कुसुम की खेती रबी मौसम मंे की जाती है, जिसकी भाजी का उपयोग भोजन में रूचि के साथ किया जाता है। कुसुम (जिसे करडी कहा जाता है) में कांटे होते हैं, जिसे खेत के किनारे लगाने पर अन्य फसलों की सुरक्षा की जा सकती है। कुसुम का तेल और फल विभिन्न बीमारियांे की औषधि है।

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  • कुसुम के दानों में तेल की मात्रा 30 से 35 प्रतिषत तक पायी जाती है।
  • इसका तेल स्वादिष्ट होता है तथा इसमें असंतृप्त वसीय अम्ल होते हैं, जिसके कारण इसका तेल हृदय रोगियों के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है।
  • कुसुम के तेल में ‘लिनोलिक अम्ल‘ की मात्रा 72 प्रतिषत होती है, जिसके कारण खून में कोलेस्ट्राल की मात्रा नहीं बढ़ पाती, इसलिए यह हृदय रोगियों के लिए दवा का काम करता है।

कुसुम से खली, रंग,वार्निष,पेन्ट,साबुन आदि बनाया जाता है। इसके हरे पत्तों की भाजी में लौह तत्व केरोटीन भरपूर मात्रा में पाया जाता है।

जहां सूखे की संभावना रहती है, वहां कुसुम उपयुक्त फसल कुसुम होती है। इसकी जड़ें जमीन में बहुत गहरी जाती हैं, जिनमें पानी सोखने की क्षमता अपेक्षाकृत अधिक होती है।

फल बनने के बाद कुसुम के कुछ फूल बेकार होकर जमीन में गिर जाते हैं, यदि इन फूलों को झड़ने के पहले एकत्र कर लिया जाये तथा उनकी चाय बनायी जाये तो यह चाय औषधीय और गुणकारी होती है।

 

खैक्सी से अतिरिक्त आय लीजिये

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक,
कृषि महाविद्यालय, रायपुर-492012

खैक्सी से अतिरिक्त आय लीजिये- bhagchandra.com

                गृह वाटिका हो या आंगनबाड़ी, फलाद्यान हो या सब्जी का प्रक्षेत्र।  इन सभी स्थानों पर खैक्सी की लता शोभायमान होती है और खैक्सी के हरे फल पौष्टिक और अतिरिक्त आय के साधन होते हैं।  खैक्सी को ककोरा, पड़ोरा आदि नामों से पुकारा जाता है।  जुलाई माह में जब खैक्सी की फसल बाजार में आती है, तब इसका भाव 80 से 100 रूप्ये तक प्रति किलोग्राम रहता है।  खेैक्सी पौष्टिक गुणों से भरपूर होती है, जिसमें 0.6 प्रतिषत प्रोटीन, 1.7 प्रतिषत कार्बोहाइड्रेट 3.8 प्रतिषत स्फुर, 0.1 प्रतिषत खनिज तथा 2.7 प्रतिषत कैल्षियम पाया जाता हैै, इसलिए यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ संतुलित आहार में विषेष महत्व रखती है।

               खैक्सी बेल वाली सब्जी है, जिसकी लता या बेल मध्यप्रदेष और छत्तीसगढ़ के जंगली क्षेत्रों में वर्षा ऋतु में अपने आप उग जाती है। गृह वाटिका, आंगनबाड़ी, सब्जी के प्रक्षेत्रों में खैक्सी का कंद बोना लाभदायक होता है। यदि बीज से पौधा तैयार किया जाता है, तो फल देरी से प्राप्त होते हैं। यदि सिंचाई सुविधा हो तो खैक्सी के कंद फरवरी मार्च में बोना चाहिए, जहां पर सिंचाई सुविधा नहीं है, वहां इसके कंद जून-जुलाई में चाहिए। कंद आसानी से बनाये जा सकते है। मादा पौधों की दो माह पुरानी बेल 30 से 45 से.मी. लम्बी काटकर छायादार स्थान पर लगायी जाती है।

जिसमे दो-तीन माह में जड़ें फूट आती हैं, इन्हीं जड़युक्त कंदों को सामान्यतया जून-जुलाई में तैयार गड्ढों  में लगा दिया जाता है।  परागण क्रिया में सहयोग के लिए मादा पौधों के साथ-साथ लगभग 10 प्रतिषत नर पौधे  लगाना चाहिए।

उचित जल निकास वाली दुमट और रेतीली दुमट भूमि खैक्सी के लिए उपयुक्त होती हैं।  इस मिटटी में 3 मीटर लम्बी और 2 मीटर चैड़ी क्यारियां बना लेते हैं।  इस आकार की प्रत्येक क्यारी में 25 किलो गोबर की सड़ी हुई खाद, 2.5 किलो सुपर फास्फेट और 1 किलो पोटाष अच्छी तरह मिला दिया जाता है।  यदि खेत की मेड़ पर खेैक्सी की खेती करना हो तो मेड़ पर 3 मीटर की दूरी पर 60 से.मी. लम्बे और 60 से.मी. चैड़े तथा 60 से.मी. गहरे गड्ढे में कन्द का रोपण करना चाहिए।  इस गड्ढे में समान अनुपात में मिट्टी और गोबर की खाद का मिश्रण तथा 250 ग्राम सुपरफास्फेट और 100 ग्राम पोटाष भरना चाहिए।  नई बेलों के बनने के समय गड्ढे में 25 ग्राम यूरिया दो बार देना चाहिए, यूरिया देने के बाद सिंचाई करना चाहिए।

खैक्सी के हरे रंग के फलों की सब्जी बनायी जाती है, जिसमें नौ-दस कड़े दाने होते है। खैक्सी की फसल  पर प्रायः कीट-व्याधियों का प्रकोप कम हेात है, फिर भी माहू, लाल कीड़ा आदि से बचाव हेतु दवा छिड़कना चाहिए।

सब्जी की इस बहुगुणकारी फसल के प्रत्येक पौधे से 4 से 5 किलो फल प्राप्त होते हैं। एक पौधे से लगभग 40 से 50 फलों की उपज प्राप्त होती है। यदि सिंचाई सुविधा उपलब्ध हेाती है, तब फरवरी-मार्च में कंद लगाना चाहिए, यदि इस समय में कंद लगाये जाते हैं तो जल्दी फूल आ जाते हैं और जल्दी ही फल लग जाते हैं। बौआई जल्दी करने से खैक्सी को अच्छा बाजार भाव मिल जाता है। खैक्सी की खेती फलोद्यान में अंतवर्ती फसल के रूप् में आसानी से की जा सकती है। फलाद्यान की खाली भूमि पर ली गई फसल से अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हो जाती है। अन्य बेल वाली फसलों के साथ में भी खैक्सी की फसल से अच्छी आमदनी प्राप्त होती है।

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