मेरा छत्तीसगढ़

1. डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

मेरा छत्तीसगढ़ - bhagchandra.com

                  ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।
सुन्दर है, छोटा है, प्यारा है, मेरा छत्तीसगढ़ महान।
यहां से फैली विष्व में सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान।
धान का यह कटोरा, है पूरे भारत की शान।

     जहां राजा मोरध्वज, वाणासुर ने शासन चलाये थे।
वहां माता शबरी की कुटिया में, राम ने बेर खाये थे।
मेरा छत्तीसगढ़ सचमुच प्राकृतिक संसाधनों की खान।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

       जहां जीवनदायिनी महानदी, अरपा, इंद्रावती, षिवनाथ।
वहां की अमीर धरती पर सब मिलकर रहते साथ।
जहां तक देखो । बस वहां दिखती है धान ही धान।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

                27 जिले, एक दर्जन विष्वविद्यालय, यहां लघु भारत भिलाई।
कोरबा, बैलाडीला यहां है, कर रहे उद्योगों की भरपायी।
छत्तीसगढ़ की माटी के कण-कण में है भगवान।
र्ऋिष मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

नई कृषि नीति का संदेष 

2. डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

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हे किसान । देष की शान।
हमारा देष है कृषि प्रधान।
हमारा लक्ष्य कृषि उपज बढ़ाना।
यत्र तत्र सर्व्रत्र समृद्वि लाना।
नई कृषि नीति का संदेष।
विकसित बनाओ भारत देष।

बढ़ते जाओ सिंचाई का क्षेत्र।
व्यवसायिक बनाओ हर प्रक्षेत्र।
भूमि जलवायु के अनुसार करो
उन्नत तकनीक का विस्तार।
नई कृषि नीति का संदेष।
मिश्रित खेती अपनाओ विषेष।

दलहन-तिलहन और धान्य।
फसलों में हैं ये तीन महान।
फसल विविधिता को अपनाओ।
समग्र विकास कृषि से लाओ।
नई कृषि नीति का संदेष।
फलों-सब्जियों की खेती विषेष।

करो हरित क्र्र्रांति का विस्तार।
जिससे होगी गरीबी रेखा पार।
खेतांे में हरियाली लाओ।
गांवों में खुषहाली लाओ।
नई कृषि नीति का संदेष।
विकसित बनाओ भारत देष।

   

                                                      आदि पुरूष आदिवासी     

 

 

 

3.डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

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 धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरक, वन के वासी।
वनों के अंचल में बिखरे हैं भारत के गांव।
जहां ये त्यागी – वीर, कोसों चलते नंगे पांव।
बैगा, गांेड़, कोल, कोरकू इनका परिचय परिभाषी।
भीषण गर्मी-षीत के तपस्वी – ये आदिवासी।

जहां वन हैं – वहां इनकी जन्मभूमि हैं।
वनोपज देन जिनकी, व नही कर्मभूमि है।
करते हैं कड़ी मेहनत, कम कीमत पाते हैं।
खुद भूखे रहकर, दूसरों को खिलाते हैं।
ईमानदार भोले-भाले, ये सचमुच सन्यासी।
तन-मन के धनी हैं, ये आदिवासी।

अन्याय से मुक्ति हेतु इनका जीवन छटपटाता था।
शोषण से जिनका दिल कुछ घबड़ाता था।
तेंदूपत्ता, चिरौंजी, शहद से जुड़ा जब सहकार।
तब वनवासी विकास के खुज गये सब द्वार।
कर्तव्यों से बदल जायेगी, इनकी भाग्य राषि ।
क्रान्ति के अग्रदूत बनेंगे, ये वीर आदिवासी।

ये वन मार्गों के निर्माता, वन के प्रहरी हैं।
प्रकृति जिनकी सहेली, गाथा उनकी गहरी है।
स्वावलम्बी हैं सदियों से, ये प्रगति के अभिलाषी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरकक, वन के वासी।
धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।

हे किसान ! देष की शान

4.डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

हे किसान ! देष की शान।
खेती में तुम समर्पित,
तुम्हारा सारा जीवन दान।
तुम्हारी कड़ी मेहनत का
भू कण-कण करे बखान।
तुमसे उज्जवलित हो रहा,
खेत और खलिहान।

     हे किसान ! देष की शान।
तुम तो भूमि पुत्र हो,
है तुम्हारी महिमा महान्।
ताप-षीत का तुम्हें भय नहीं,
तुमसे तो प्रकृति डरती है।
अपार परिश्रम से तुम्हारे
देती अन्न धरती है।

हे किसान ! देष की शान।
परहित में तुम कर रहे
अपने तन का दान।
गूंज रही है चहुंदिषि
बस एक ही आवाज।
कृषि से ही होगी प्रगति
और खुषहाली आज।

    हे किसान ! देष की शान।
खेती है तुम्हारी सहेली,
फसलों में तुम्हारी जान् ।
तुम्हारी तपस्या से होगी,
खाद्य् समस्या समाधान््।
हे जन जीवन दाता किसान।
समृद्वि रहे तुझे वरदान।

Dr. BhagChandra Jain is renowned author & famous scientist in field of Agriculture. Awarded by Central & State government ,Mr. Bhag is author of more than 1700+ articles published in various international journals,magazines & books.

Currently ,Dr. Jain is working as Professor in Indira Gandhi Agricultural University .

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