कृषि में बढ़ती हुई लागत, समर्थन मूल्य से राहत

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‘कृषिरेव महालक्ष्मीः‘ अर्थात् कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है, भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिषत व्यक्ति खेती कर रहे हैं। भारत विकासषील देष है। यहां से विभिन्न देषों को वर्ष 2013-14 में 3792.2 करोड़ डालर का कृषि निर्यात किया गया है, जिसमें 774.2 करोड़ डालर का चावल निर्यात शामिल है। भारत सबसे बड़ा चांवल निर्यातक देष है, जहां सबसे ज्यादा दूध और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है। वर्ष 2013-14 में कृषि विकास की दर 4.6 प्रतिषत रही है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 4.7 प्रतिषत रही है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान केवल 13.9 प्रतिषत रह गया है। भारत मंे वर्ष 2013-14 में खाद्यान्न के उत्पादन का अनुमान 26.3 करोड़ टन लगाया गया है, जबकि वर्ष 2012-13 में 25.53 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। कृषि केवल जीवन यापन का साधन बनकर रह गई है, प्रति व्यक्ति कुल आमदनी की दृष्टि से भारत का विष्व में 161 वां स्थान है। कृषि में नई-नई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है तथा बीज, उर्वरक, पौध संरक्षण सामग्री और श्रमिक व्यय दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। बौआई से लेकर कटाई-गहाई तक समय पर श्रमिक नहीं मिलते हैं। अन्य व्यवसायों से कृषि की तुलना करते हुये कृषि श्रमिक मजदूरी मांगते हैं। कृषि में समय पर आदानों की उपलब्धता न होना एक बड़ी समस्या है। स्वस्थ और गुणवक्तापूर्ण बीज महंगे होते जा रहे हैं। उर्वरकों के भाव भी बढ़ते जा रहे हैं। बढ़ती हुई महंगाई को देखते हुये आर्थिक दृष्टि से कृषि आदानों का उपयोग जरूरी है।
उर्वरक
1 जून 2012 से उर्वरकों के मूल्य में 11.1 प्रतिषत से लेकर 62 प्रतिषत तक वृद्वि की गई है। अपेै्रल 2010 के पहले डाई अमोनियम फाॅस्फेट (डी.ए.पी. ) की कीमत 9350 रूपये प्रति टन थी, जिसके मूल्य को अप्रैल 2010 में बढ़ाकर 18200 रूपये प्रति टन किया गया और वर्तमान में इसका मूल्य लगभग 32 प्रतिषत बढ़ कर 24000 रूप्ये प्रति टन हो गया है।
म्यूरेट आॅफ पोटाष (एम.ओ.पी.) का मूल्य अपै्रल 2010 के पहले 4455 रूपये प्रति टन था, जो कि अपै्रल 2010 से बढ़कर 12000 रूप्ये प्रति टन हो गया तथा वर्तमान में इसका मूल्य 41 प्रतिषत बढ़कर 17000 रूपये प्रति टन हो गया है। इसी प्र्रकार सिंगल सुपर फाॅस्फेट (एस.एस.पी.) का मूल्य 4800 रूप्ये प्रति टन से 62 प्रतिषत बढ़कर 7800 रूप्ये प्रति टन हो गया है, जबकि यूरिया के मूल्य में 11.1 प्रतिषत की वृद्वि हुई है, जिससे यूरिया का मूल्य 4830 रूप्ये से बढ़कर 5365 रूप्ये प्रति टन हो गया है।
50 किलो डी.ए.पी. को बोरी 1125 से 1223 रूप्ये में मिल रही है। एम.ओ.पी. की बोरी 910 रूपये में एस.एस.पी. की बोरी 263 रूपये से 363 रूपये में बिक रही है।
समर्थन मूल्य
समर्थन मूल्य की घोषणा शासन द्वारा प्रति वर्ष की जाती है, जिसमें अनाज, दलहन, तिलहन, कपास, जूट और तम्बाखू शामिल होती है। समर्थन मूल्य पर किसानों से कृषि उत्पाद खरीदकर उनके हितों की रक्षा की जाती है। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए आवष्यक वस्तुओं की पूर्ति सुनिष्चित की जाती है। समर्थन मूल्य प्रायः बाजार मूल्य से कम होता हेैं।
औद्योगिक उत्पादन की अपेक्षा कृषि में मूल्य का उतार-चढ़ाव अधिक होता है, जिसका प्रभाव उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ता है, इसका लाभ मध्यस्थ उठाते हैं। यदि कृषि उत्पादों के मूल्य अधिक बढ़ जाते हेैं तो कम आय वाले व्यक्ति ये उत्पाद खरीद नहीं पाते हैं।
कृषि में बढ़ती हुई लागत को समर्थन मूल्य से राहत मिली है। प्राथमिक कृषि सहकारी साख समितियों में उर्वरकों के लिए अग्रिम उठाओं योजना चलायी जा रही हैय जिसमें उर्वरकों के लिए ऋण के ब्याज में कुछ अवधि के लिए छूट दी जा रही है। कृषि में उपयोग किये जाने वाले आदानों को अब भूमि, किस्म, फसल अवधि के अनुसार उपयोग करना आवष्यक हो गया है, जिससे कम लागत में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त हो और ‘उत्तम खेती मध्यम बंज‘ की उक्ति चरितार्थ हो सके।

 

समग्र कृषि विकास की राष्ट्रीय योजना-आत्मा

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‘कृषिरेव महालक्ष्मीः‘अर्थात कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थ्रव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिषत व्यक्ति खेती कर रहें हैं। भारत विकासषील देष है। भारत सबसे वड़ा चावल निर्यातक देष है। वर्ष 2013-14 में 3792ण्2 करोड़ डालर का कृषि निर्यात किया गया है, जिसमें 774.2 करोड़ डालर का चांवल निर्यात शामिल है। भारत में वर्ष 2013-14 में 26.3 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान लगाया गया है, जबकि वर्ष 2012-13 में 25.53 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। भारत में सबसे ज्यादा दूध और बागवानी फसलों का उत्पादन होता है। वर्ष 2012-13 में यहां 13.24 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ था। भारत में वर्ष 2013-14 में कृषि विकास की दर 4.6 प्रतिषत रही है। जबकि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 4.7 प्रतिषत रही है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटता जा रहा है। जो कि वर्तमान में घटकर 13.9 प्रतिषत रह गया है। कृषि केवल जीवन यापन का साधन बन कर रह गई है तथा प्रति व्यक्ति कुल आमदनी की दृष्टि से भारत का विष्व में 161 वां स्थान है।
समय परिवर्तनषील है। कृषि में नई-नई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। बीज, उर्वरक, पौध संरक्षण सामग्री और श्रमिक व्यय दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। बौआई से लेकर कटाई- गहाई तक उपयुक्त समय पर श्रमिक नहीं मिलते हैं तथा वे अन्य व्यवसायों से कृषि की तुलना करते हुये मजदूरी मांगते है। कृषि मेें समय पर आदानों की उपलब्धता न होना एक बड़ी समस्या है। कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा तरह -तरह की योजनाएं चलायीं जा रही हैं, जिनमें कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजंेसी अर्थात् । आत्मा ऐसी योजना है, जो देष के 639 जिलों में संचालित की जा रही है। आत्मा ऐसी केन्द्र प्रवर्तित योजना है, जिसे वर्ष 2014-15 से राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रौद्योगिकी मिषन के सब मिषन एस.एम.ए.ई. में समाहित किया गया है। इसे सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंषन प्रोग्राम्स फाॅर एक्सटेंषन रिफाम्र्स भी कहा जाता है।

योजना के उददेष्य
1. कृषि प्रसार में शासकीय विभागों के साथ-साथ विभिन्न अषासकीय संस्थाओं, गैर शासकीय संगठनों, कृषि उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाना।
2. कृषि और संबंधित विभागों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, कृषि अनुसंधान केन्द्रों में समन्वय स्थापित कर साथ-साथ कार्य करना तथा कृषि विकास की कार्य योजना तैयार करना।
3. समन्वित कृषि पद्वति (कृषि , उद्यानिकी, पषुपालन जैसे सहायक व्यवसायों को एक साथ अपनाना) अर्थात् कृषि पद्वति पर आधारित कृषि प्रसार सुनिष्चित करना।
4. कृषि विस्तार हेतु सामूहिक प्रयास करना। फसल या रूचि पर आधारित कृषकोें के समूह की उनकी जरूरत के अनुसार क्षमता विकसित करना।
5. अन्य विभागीय योजनाओं में विस्तार सम्बंधी प्रावधान न होने पर उसका एक्सटेंषन रिफाम्र्स योजना में समावेष करना।
6. महिला कृषकों को समूह के रूप् में संगठित करना और कृषि के क्षेत्र में उनकी क्षमता बढ़ाना।
7. किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और विस्तार कार्यकर्ताओं के बीच में बेहतर तालमेल स्थापित करना।
भारत में फसल उत्पादन (करोड़ टन)

 

योजना की विषेषताएं
– जमीनी स्तर से कार्य योजना तैयार करना तथा उसे प्रस्तुत करना।
– किसानों की जरूरत के अनुरूप् गतिविधियों का चयन करना तथा उन्हें क्रियान्वित करना।
– कार्य योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन में किसानों की भागीदारी बढ़ाना।
– कार्य प्रणाली में लचीलापन होना और निर्णय लेने की प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण करना।
– एकल खिड़की प्रणाली द्वारा कृषि विस्तार करना।
– कृषि विस्तार सेवाओं को टिकाऊ बनाने के लिए हितग्राहियों से 5 से 10 प्रतिषत
हिस्सा प्राप्त करना।
रणनीति
इसमें राज्य, जिला, विकास खण्ड और ग्राम स्तर पर विभिन्न विस्तार गतिविधियों का क्रियान्वयन किया जाता हैः
राज्य प्रकोष्ठ
यह कृषि विभाग के अधीनस्थ कार्य करता है। इस प्रकोष्ठ विभिन्न जिलों से वार्षिक कार्य योजना प्राप्त करता है, उसमें राज्य कृषक सलाहकार समिति के सुझाओं को शामिल करता है, फिर राज्य कृषि विस्तार कार्य योजना तैयार की जाती है। इस कार्य योजना को प्रदेष की अंर्त-विभागीय कार्यकारी समूह ओर भारत सरकार से अनुमोदन कराया जाता है। इसके बाद कार्य योजना को क्रियान्वयन एजेंसी को अवगत कराया जाता है। इसमें केन्द्र और राज्य सरकारों से राषि प्राप्त कर एजंेसी आत्मा को आबंटित की जाती है तथा योजना के क्रियान्वयन का अनुश्रवण और मूल्यांकन किया जाता है।
राज्य कृषि प्रषिक्षण संस्थान
यह संस्था कृषि विस्तार से जुड़े शासकीय, निजी, गैर शासकीय संगठनों की प्रषिक्षण आवष्यकताओं का आंकलन करती है तथा प्रषिक्षण की वार्षिक कार्य योजना तैयार करती है, जिसके अनुसार राषि प्राप्त कर विभिन्न वर्गों के लिए प्रषिक्षण आयेजित करती है। इसके अलावा परियोजना तैयार करने, परीक्षण, क्रियान्वयन एवं अनुश्रवण करने के लिए आवष्यक मार्गदर्षन दिया जाता है। यह संस्था कृषि विस्तार को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रबंधन तरीकों के विकास एवं उनके उपयोग को बढ़ावा देती है।
कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजंेसी
आत्मा जिला स्तरीय संस्था है, जो किसानों तक कृषि विस्तार सेवाओं को पहुंचाती है। इसमें सक्रिय योगदान देने वाले व्यक्ति सदस्य होते हैं। भारत सरकार और राज्य सरकार से सीधे आत्मा को बजट मिलता है। इसके अलावा सदस्यों से सदस्यता शुल्क और लाभान्वितों से कृषक अंष की राषि प्राप्त होती है। कृषि एवं कृषि संबंधी तकनीक के व्यापक प्रचार-प्रसार की जवाबदारी आत्मा की होती है। इसमें जिले के उप संचालक कृषि को परियोजना निदेषक और कृषि विज्ञान केन्द्र के कार्यक्रम समन्वयक को उप परियोजना निदेषक नामांकित किये जाते हैं।
गवर्निंग बोर्ड
यह बोर्ड जिला स्तर पर आत्मा की नीति तैयार करती है, प्रषासकीय एवं वित्तिय स्वीकृति देती है, क्रियान्वयन की समीक्षा करती है। गवर्निंग बोर्ड के अध्यक्ष कलेक्टर और सचिव परियोजना निदेषक होते हैं।
प्रबंधन समिति
यह आत्मा की कार्य योजना बनाती है तथा गतिविधियों के क्रियान्वयन करती है, जिसमें आत्मा द्वारा जिले के कृषि एवं संबंधित विभागों जैसे-उद्यानिकी, पषुधन, मत्स्य, रेषम पालन, विपणन, कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि अनुसंधान केन्द्र, लीड बेैंक, गैर शासकीय संगठनों और कृषि से जुड़े विभिन्न संगठनों से सम्पर्क किया जाता है तथा इनमें समन्वय स्थापित किया जाता है। इस समिति में जिले में कार्यरत इन विभागों के वरिष्ठ अधिकारी सक्रिय सदस्य होते हैं। यह समिति प्रति माह बैठक का आयोजन करती है तथा प्रगति की समीक्षा करती है। प्रबंधन समिति द्वारा प्रगति प्रतिवेदन तैयार कर राज्य प्रकोष्ठ को भेजा जाता है।
जिला कृषक सलाहकार समिति
इसमें अधिकतम 25 सदस्य होते हैं। यह समिति किसानों की ओर से कार्य योजना बनाने और इसके क्रियान्वयन हेतु फीड बैक तथा आवष्यक सलाह गवर्निंग बोर्ड और प्रबंधन समिति को देती है। इसमें सभी वर्ग के प्रगतिषील, पुरस्कृत कृषक सदस्य होते हैं, जो कि विभिन्न विकास खण्डों की कृषक सलाहकार समिति से नामांकित होते हैं। इस समिति की बैठक प्रत्येक तीन माह मंे प्रायः प्रबंधन समिति की बैठक के पहले आयोजित की जाती ै।
विकास खण्ड तकनीकी दल (ठसवबा ज्मबीदवसवहल ज्मंउ)
यह विकास खण्ड स्तर पर कृषि एवं संबंधित विभागों के अधिकारियों का दल होता है, जिसके द्वारा आत्मा की विभिन्न गतिविधियों की वार्षिक कार्य योजना बनाकर जिले की आत्मा को उपलब्ध कराती है तथा उसका विकास खण्ड में क्रियान्वयन करती है। इस तकनीकी दल को सहयोग के लिए विकास खण्ड तकनीकी प्रबंधक और सहायक तकनीकी प्रबंधक कार्यरत होते हैं, जो विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित कर गतिविधियों का क्रियान्वयन कराते हैं।
विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति
इसमें संबंधित विकास खण्ड के प्रगतिषील/पुरस्कृत कृषक, अभिरूचि समूहों/ कृषक संगठनों के प्रतिनिधि सदस्य होते हैं। इसमें सदस्यों की संख्या 20 से 25 तक होती हैं। इस समिति की बैठक प्रत्येक दो माह में होती है, जिसमें विकास खण्ड तकनीकी दल को किसानों की ओर से फीड बैक और सलाह दी जाती है।
कृषक मित्र
प्रत्येक दो गांवों के बीच में एक कृषक मित्र नामांकित किया जाता है । कृषक मित्र प्रगतिषील कृषक होते हैं, जो कृषि प्रसार तंत्र और किसानों के बीच में महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। कृषक मित्र विभागीय योजनाओं, जानकारी को किसानों तक पहुंचाते हैं तथा किसानों की समस्योओं के सम्बंध में किसान काल सेंटर से सुझाव लेते हैं। प्रत्येक कृषक मित्र को रूप्ये 6000/- प्रति वर्ष मानदेय दिया जाता है।

खाद्य सुरक्षा समूह ( कृषक अभिरूचि समूह, कमोडिटी अभिरूचि समूह)
ये समूह अपने सदस्यों के बीच में कृषि तकनीक के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समूहों के सदस्यों को प्रषिक्षण, शैक्षणिक भ्रमण, प्रदर्षन, कार्य कुषलता वृद्वि और चक्रीय निधि (त्मअवसअपदह थ्नदक) देकर सषक्त बनाया जाता है।

प्रक्षेत्र विद्यालय
प्रगतिषील किसानों के माध्यम से अन्य किसानों तक कृषि तकनीक के प्रचार-प्रसार में प्रक्षेत्र विद्यालय अच्छे माध्यम है।
कृषि उद्यमी गांवों में कृषि उद्यमी गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान सामग्री एवं तकनीकी सलाह किसानों को उपलब्ध कराकर मदद करते हैं।

अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना
जिल के चहुमुखी विकास के लिए कृषि की पंचवर्षीय योजना तैयार करना
आत्मा का पहला कार्य है, इस योजना का कृषकों, ग्रामीणों की भागीदारी से बनाया जाता है। इस योजना में वर्तमान कृषि पद्वति की सूचनाओं का विष्लेषण, अनुसंधान और विस्तार का अंतराल तथा समय के अनुरूप कृषि पद्वति में परिवर्तन आदि शामिल होता है, जिसमें अनुसंधान एवं विस्तार की प्राथमिकतायें निर्धारित की जाती हैं। यह योजना जिले के कृषि विकास की आधार स्तम्भ होती है। इसमें कृषि अनुसंधान एवं विस्तार सम्बंधी जरूरतों की पूर्ति हेतु प्राथमिकता के अनुसार प्रत्येक वर्ष जिला वार्षिक कार्य योजना (क्पेजतपबज ।ददनंस ।बजपवद च्संद)बनाकर गतिविधियों का क्रियान्वयन किया जाता है। पांच वर्ष बाद इस कार्य योजना की समीक्षा की जाती है तथा शेष बचे हुये कार्योंे को शामिल कर आवष्यकतानुसार पुनः पंचवर्षीय कार्य योजना बनायी जाती है।
मुख्य गतिविधियां
कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी द्वारा कृषक उन्मुखी, तकनीकी विस्तार, कृषक
सम्पर्क और नवोन्मेषी गतिविधियों का संचालन किया जाता हैः

कृषक उन्मुखी
कृषक उन्मुखी गतिविधियों में अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना बनाना, कृषक समूह बनाना, महिला समूह बनाना, खाद्य सुरक्षा समूह बनाना, कृषक समूहों का प्रषिक्षण देना, प्रदर्षन डालना, शैक्षणिक भ्रमण और प्रक्षेत्र विद्यालय आदि शामिल हैं। इसके अलावा कृषकों की क्षमता बढ़ाने और तकनीकी के प्रचार-प्रसार में कृषकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता है। इसमें किसानों, कृषक समूहों, वैज्ञानिकों, विस्तार में लगे हुये अधिकारियों, कर्मचारियों और उत्कृष्ट आत्मा को पुरस्कृत किया जाता है।

कृषि तकनीकी के प्रचार
कृषि तकनीकी के प्रचार -प्रसार हेतु किसान मेला,कृषि प्रदर्षनि का आयोजन किया जाता है तथा किसानोपयोगी साहित्य प्रकाषित किया जाता है। सफलता की कहानी पर केंद्रित वीडियो फिल्में भी बनायी जाती है।

अनुसंधान-विस्तार कृषक सम्पर्क
कृषि अनुसंधान और विस्तार गतिविधियों से सम्पर्क स्थापित करने के लिए कृषकों और वैज्ञानिकों के बीच में परिचर्चा आयोजित की जाती है। कृषक गोष्ठी, प्रक्षेत्र भ्रमण और स्थानीय जरूरतों पर अनुसंधान किया जाता है।

नवोन्मेषी
इसमें गांवों, ग्राम पंचायतों में सूचना पटल लगाये जाते हैं। कम्युनिटी रेडियो स्टेषन स्थापित किये जाते हैं। मोबाइल – इंटरनेट, पाइको प्रोजेक्टर और कला जत्था द्वारा कृषि तकनीक का प्रचार-प्रसार किया जाता है।

वित्तीय प्रावधान
आत्मा योजना के वित्तीय प्रावधानों का लाभ सभी वर्गके किसानों को मिलता है
किन्तु लद्यु-सीमांत और महिला कृषकों को लाभ हेतु प्राथमिकता दी जाती है।
1. कृषक प्रषिक्षण
अ. अंतर्राज्यीय – प्रति कृषक प्रतिदिन रूपये 1250 की दर से औसत 50 मानव दिवस
प्रति विकास खण्ड ।
ब. राज्य के अंदर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूपये 1000 की दर से औसत 1000 मानव
दिवस प्रति विकास खण्ड।
स. जिले के अन्दर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 400 या 250 रूप्ये की दर से औसत
1000 मानव दिवस प्रति विकास खण्ड।
2. प्रदर्षन
अ. कृषि – प्रति प्रदर्षन 0.40 हेक्टेयर क्षेत्र हेतु रूप्ये 3000/- धान, गेंहूं,दलहन -तिलहन एवं मक्का हेतु रूप्ये 2000 की दर से औसत 125 प्रदर्षन प्रति विकास खण्ड ।
ब. उद्यानिकी, प्षुपालन, मत्स्य पालन,रेषम पालन-प्रति प्रदर्षन रूप्ये 4000 की दर से औसत 50 प्रदर्षन प्रति विकास खण्ड।
3. शैक्षणिक भ्रमण
अ. अंतर्राज्यीय – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 800 की दर से औसत 5 कृषक प्रति
विकास खण्ड।
ब. राज्य के अंदर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 400 की दर से औसत 25 कृषक प्रति
विकास खण्ड।
4. क्षमता विकास एवं कौषल उन्नयन
कृषक समूहों की क्षमता विकास हेतु रूप्ये 5000 प्रति समूह प्रति वर्ष
तथा अधिकतम लक्ष्य 20 समूह प्रति विकास खण्ड प्रति वर्ष।

कृषक प्रषिक्षण, प्रदर्षन, शैक्षणिक भ्रमण और क्षमता विकास के लिए आयोजन हेतु सामान्य कृषकों से 10 प्रतिषत तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति और महिला कृषकों से 5 प्रतिषत कृषक अंष लिया जाता है। इन कार्यक्रमों में न्यूनतम 30 प्रतिषत महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य है।

5. खाद्य सुरक्षा समूह
इसमें प्रति विकास खण्ड न्यूनतम दो खाद्य सुूरक्षा समूह प्रति वर्ष गठित करने का प्रावधान है, जिसके लिए प्रति समूह रूप्ये 10000 निर्धारित हैं।
6. कृषक पुरस्कार
कृषि, उद्यानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कृषकों को प्रति वर्ष पुरस्कृत किया जाता हैः
अ. राज्य स्तर पर – 10 उत्कृष्ट कृषकों को, 50 हजार रूप्ये प्रति कृषक का
पुरस्कार।
ब. जिला स्तर पर – 10 उत्कृष्ट कृषकों को, 25 हजार रूप्ये प्रति कृषक का
पुरस्कार।
स. विकास खण्ड स्तर पर – 5 उत्कृष्ट कृषकों को, 10 हजार रूप्ये प्रति कृषक
का पुरस्कार ।
7. कृषक समूह पुरस्कार
कृषि, उद्यानिकी, प्षुपालन, मत्स्य पालन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कृषक समूहों को जिला स्तर पर पुरस्कृत करने का प्रावधान है, जिसमें प्रति वर्ष पांच कृषक समूहों को 20 हजार रूप्ये प्रति समूह की दर से पुरस्कृत किया जाता है। इसमें प्रत्येक जिले से प्रति वर्ष पांच कृषक समूह पुरस्कृत किये जाते हैं।
8. फार्म स्कूल
क्षेत्र विषेष में पारंगत विषेषज्ञ कृषक द्वारा अपने क्षेत्र के 25 प्रषिक्षणर्थी कृषकों तक तकनीकी हस्तांतरण का प्रावधान है। फार्म स्कूल के लिए हर स्कूल को रूप्ये 29414 दिये जाते हैं।
9. कृषक – वैज्ञानिक परिचर्चा
प्रगतिषील या जिला कृषक सलाहकार समिति और विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति के सदस्यों के लिए वैज्ञानिक परिचर्चा आयोजित की जाती है, जिसमें उन्नत कृषि तकनीक की जानकारी दी जाती है तथा रणनीति बनायी जाती है। यह परिचर्चा प्रत्येक जिले में खरीफ और रबी के पहले आयोजित की जाती है, जिनकी खरीफ और रबी में एक-एक संख्या होती है।
10. किसान गोष्ठी/प्रक्षेत्र दिवस
आत्मा द्वारा प्रति वर्ष प्रत्येक जिले में खरीफ और रबी में किसान गोष्ठी, प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया जाता है।
11. विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति की बैठक
इस समिति की बैठक प्रत्येक दो माह के अंतराल में विकास खण्ड में आयोजित की जाती हेै, जिसमें कृषि और सम्बंधित विभागों के अधिकारी भाग लेते हैं। वर्ष में इन बैठकों की संख्या छै होती है।
12. जिला कृषक सलाहकार समिति की बैठक
इस समिति की बैठक वर्ष में चार बार होती है।
13. कृषक मित्र
प्रत्येक दो गांव के बीच में एक कृषक मित्र बनाया जाता है, जिसका चयन ग्राम सभा द्वारा किया जाता है। कृषक मित्र को प्रति वर्ष 6000 रूप्ये देने का प्रावधान है।

हे किसान ! देष की शान

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हे किसान ! देष की शान।
खेती में तुम समर्पित,
तुम्हारा सारा जीवन दान।
तुम्हारी कड़ी मेहनत का
भू कण-कण करे बखान।
तुमसे उज्जवलित हो रहा,
खेत और खलिहान।
हे किसान ! देष की शान।
तुम तो भूमि पुत्र हो,
है तुम्हारी महिमा महान्।
ताप-षीत का तुम्हें भय नहीं,
तुमसे तो प्रकृति डरती है।
अपार परिश्रम से तुम्हारे
देती अन्न धरती है।
हे किसान ! देष की शान।
परहित में तुम कर रहे
अपने तन का दान।
गूंज रही है चहुंदिषि
बस एक ही आवाज।
कृषि से ही होगी प्रगति
और खुषहाली आज।
हे किसान ! देष की शान।
खेती है तुम्हारी सहेली,
फसलों में तुम्हारी जान् ।
तुम्हारी तपस्या से होगी,
खाद्य् समस्या समाधान््।
हे जन जीवन दाता किसान।
समृद्वि रहे तुझे वरदान।

आदि पुरूष आदिवासी

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धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरक, वन के वासी।
वनों के अंचल में बिखरे हैं भारत के गांव।
जहां ये त्यागी – वीर, कोसों चलते नंगे पांव।
बैगा, गांेड़, कोल, कोरकू इनका परिचय परिभाषी।
भीषण गर्मी-षीत के तपस्वी – ये आदिवासी।

जहां वन हैं – वहां इनकी जन्मभूमि हैं।
वनोपज देन जिनकी, व नही कर्मभूमि है।
करते हैं कड़ी मेहनत, कम कीमत पाते हैं।
खुद भूखे रहकर, दूसरों को खिलाते हैं।
ईमानदार भोले-भाले, ये सचमुच सन्यासी।
तन-मन के धनी हैं, ये आदिवासी।

अन्याय से मुक्ति हेतु इनका जीवन छटपटाता था।
शोषण से जिनका दिल कुछ घबड़ाता था।
तेंदूपत्ता, चिरौंजी, शहद से जुड़ा जब सहकार।
तब वनवासी विकास के खुज गये सब द्वार।
कर्तव्यों से बदल जायेगी, इनकी भाग्य राषि ।
क्रान्ति के अग्रदूत बनेंगे, ये वीर आदिवासी।

ये वन मार्गों के निर्माता, वन के प्रहरी हैं।
प्रकृति जिनकी सहेली, गाथा उनकी गहरी है।
स्वावलम्बी हैं सदियों से, ये प्रगति के अभिलाषी।
अग्रणीय रहे हैं सदैव, साहित्य कहता इतिहासी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरकक, वन के वासी।
धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।

नई कृषि नीति का संदेष

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हे किसान । देष की शान।
हमारा देष है कृषि प्रधान।
हमारा लक्ष्य कृषि उपज बढ़ाना।
यत्र तत्र सर्व्रत्र समृद्वि लाना।
नई कृषि नीति का संदेष।
विकसित बनाओ भारत देष।

बढ़ते जाओ सिंचाई का क्षेत्र।
व्यवसायिक बनाओ हर प्रक्षेत्र।
भूमि जलवायु के अनुसार करो
उन्नत तकनीक का विस्तार।
नई कृषि नीति का संदेष।
मिश्रित खेती अपनाओ विषेष।

दलहन-तिलहन और धान्य।
फसलों में हैं ये तीन महान।
फसल विविधिता को अपनाओ।
समग्र विकास कृषि से लाओ।
नई कृषि नीति का संदेष।
फलों-सब्जियों की खेती विषेष।

करो हरित क्र्र्रांति का विस्तार।
जिससे होगी गरीबी रेखा पार।
खेतांे में हरियाली लाओ।
गांवों में खुषहाली लाओ।
नई कृषि नीति का संदेष।
विकसित बनाओ भारत देष।

मेरा छत्तीसगढ़

 

 

 

 

 

 

 

 

ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।
सुन्दर है, छोटा है, प्यारा है, मेरा छत्तीसगढ़ महान।
यहां से फैली विष्व में सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान।
धान का यह कटोरा, है पूरे भारत की शान।

जहां राजा मोरध्वज, वाणासुर ने शासन चलाये थे।
वहां माता शबरी की कुटिया में, राम ने बेर खाये थे।
मेरा छत्तीसगढ़ सचमुच प्राकृतिक संसाधनों की खान।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

जहां जीवनदायिनी महानदी, अरपा, इंद्रावती, षिवनाथ।
वहां की अमीर धरती पर सब मिलकर रहते साथ।
जहां तक देखो । बस वहां दिखती है धान ही धान।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

27 जिले, एक दर्जन विष्वविद्यालय, यहां लघु भारत भिलाई।
कोरबा, बैलाडीला यहां है, कर रहे उद्योगों की भरपायी।
छत्तीसगढ़ की माटी के कण-कण में है भगवान।
र्ऋिष मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

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