अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष -2012

डॉ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)

 

सहकारिता की महिमा लिखी है, ऋग्वेद-अर्थवेद में |
इसमें सब कुछ दिखता है, इन्द्रधनुषी रंगों के भेद में ||
प्रगति की पौ बारह होगी 2012 में, सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा है सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

भारत के गाँव में विश्व का सबसे बड़ा सहकारी नेटवर्क |International Cooperation Year - bhagchandra.com
जन आन्दोलन यह, जो मिटा रहा अमीरी-गरीबी का फर्क ||
समानता और खुशहाली के लिए, सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

अनेकता में एकता से शोभित है, प्यारा हमारा भारत देश |
‘सब एक के लिए एक सबके लिए’ में सहकारिता विशेष ||
यत्र-तत्र-सर्वत्र विकास के लिए, सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

कृषि दुग्ध, सिंचाई, आवास आदि में इसका सहारा |
साख से साख यह बढ़ाये, बने बचत का आधार ||
विश्व व्यापीकरण के इस दौर में, सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

सर्व संपन्न हो दुनिया सारी, प्रगति है वरदान सहकारी |
सहकारी पथ पर बढ़ते जाओ, हर क्षेत्र में सफलता पाओ ||
घर में, बाहर में, गाँव.गाँव में, तुम सहकारिता अपनाओ |
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ||

प्रचार अधिकारी

कृषि महाविद्यालय, रायपुर

 

जल वर्ष-2016

प्रो. (डॉ.) भागचंद्र जैन

शास्त्रों में लिखी है जल की महिमा |
सागर और नदियों से है हरीतिमा ||
जल से जीवन, जल से है संसार |
जल के बिना, सूना है सब संसार ||

पानी है सचमुच, प्रकृति का वरदान |
पानी से पेड़-पौधे, पनी से इन्सान ||
अतः जल की कीमत को पहचानों |
बूंद.बूंद कितनी अमूल्य, यह जानो ||

जल का संरक्षण हमारा कर्म है |
जल का संरक्षण हमारा धर्म है ||
प्रयत्न करो, असंभव को संभव बनाओ |
मेहनत करो, कठौती में गंगा लाओ ||

पर्यावरण सुधारो, वृक्ष लगाओ |
जल के चक्र को उचित बनाओ ||
पानी से सब कुछ, पानी से जिंदगानी |
बूंद.बूंद बचाओ, गढ़ो नई कहानी ||

जल की रक्षा के लिये कीजिये प्रयास |
जिससे बुझे, पेड़-पौधों, जीवों की प्यास ||
सुखा-बाढ़, तूफान मान जायेगा हार |
जल वर्ष-2016 को सार्थक बनाओ ||

प्रचार अधिकारी
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय,
रायपुर 492006 (छत्तीसगढ़)

दलहन उत्पादन के लिए छत्तीसगढ़ को कृषि कर्मण अवार्ड

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
कृषि महाविद्यालय, रायपुर – 492012

Pulses production Chhattisgarh Krishi Karman Award - bhagchandra.com

‘कृषिरेव महालक्ष्मीः’ अर्थात् कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिशत व्यक्ति खेती कर रहें हैं। भारत सबसे बड़ा चांवल उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 के अनुसार भारत की आर्थिक पिकरा इी 7.4 प्रतिशत रहीं है। दालों में प्रोटीन, अमीनां अम्ल, विटामिन्स, खनिज पाये जाते हैं, इनमें प्रोटीन को प्रकृति का अनमोल उपहार कहा जाता है, विश्व के 171 देशों में विभिन्न प्रकार की दलहनी फसलों का आहार में उपयोग प्रोटीन की पूर्ति हेतु किया जा रहा है। दालों की उपयोगिता के कारण संयुक्त राष्ट्र महासभा की 68 वीं बैठक में वर्ष 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष घोषित किय गया है। आज प्रति दिन प्रति व्यक्ति दलहन उपलब्धता 41 ग्राम है, जोकि अनुशंसित मात्रा से 50 प्रतिशत कम है।

                      छत्तीसगढ़ में वर्ष 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि हर 13.20 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है। प्रदेश में कृषि विकास की दर 14.18 प्रतिशत आंकी गई है, जिसमें कृषि साथ-साथ सहयोगी व्यवसाय पशुपालन, वानिकी, मत्स्य आदि शामिल हैं। यहां उद्योग की विकास दर 10.62 प्रतिशत हेाने का अनुमान लगया गया है, जिसमें खनिज, निर्माण, मेनुफेक्चुरिंग, विद्युत, गैस और जल आपूर्ति को शामिल किया गया है। प्रदेश में सेवा क्षेत्र की विकास दर का अनुमान 15.21 प्रतिशत लगाया गया है। यहां वर्ष 2014-15 में प्रति व्यक्ति आय 64442 रूपये आंकी गई है, जो कि वर्ष 2013-14 में 58547 रूपये थी।

                      कृषि से सर्वांगीण विकास को साकार करने केे लिए शासन द्वारा किसान उपयोगी योजनाए चलायी जा रही हैं, अनुदान दिया जा रहा है तथा प्रोत्साहन हेतु पुरस्कार दिये जा रहे हैं। वर्ष 2014-15 में कृषि उत्पादन में श्रेष्ठता के लिए विभिन्न वर्गाें मं पुरस्कार घोषित किये गये हैं, जिसमें सकल खाद्यान्न उत्पादन, एक फसल और कुल उत्पादन में वृद्धि के आधार पर ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ दिये जायेंगे ।

                      छत्तीसगढ़ को तीन बार वर्ष 2010-11, 2012-13 और 2013-14 में चावल उत्पादन के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार मिल चुका है। अब दलहन की खेती के लिए प्रदेश को कृषि कर्मण पुरस्कार से सम्मानित किया जायेगा। इस पुरस्कार के लिए छत्तीसगढ़ का चयन वर्ष 2014-15 में दलहनी फसलों के उत्पादन में शानदार प्रदर्शन पर किया गया है। यहां वर्ष 2014-15 में 7.85 लाख हेक्टेयर रकबे में दलहनी फसलों की खेती की गई, जिसमें 6.55 लाख टन उत्पादन प्राप्त हुआ। यह उत्पादन वर्ष 2013-14 की तुलना में 39 प्रतिशत अधिक है।
तालिका: छत्तीसगढ़ में खाद्यान्न फसलों का क्षेत्रफल एवं उत्पादन

फसल
2012-13
क्षेत्रफल लाख हैउत्पादन लाख टन
2013-14
 क्षेत्रफल लाख हैउत्पादन लाख टन
2014-15
क्षेत्रफल लाख हैउत्पादन लाख टन
वर्ष 2013-14 की तुलना में वृध्दि
चावल
37.8573.40
38.0267.16
138.09175.90
13
मक्का1.072.071.112.291.222.300
मोटे अनाज2.642.452.392.642.472.650
कुल अनाज41.5077.2641.4371.1441.5379.9012
अरहर0.520.320.510.310.530.3410
चना2.672.852.762.132.802.9036
अन्य दलहन5.733.204.782.274.523.3146
कुल दलहन8.926.378.054.717.856.5539
कुल खाद्यान्न50.4283.6349.4875.8549.3986.4414

कृषि तकनीकी का सामयिक चित्रण

किसान मेले में

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
कृषि महाविद्यालय, रायपुर – 492012

                राज्य के प्रत्येक जिले में किसान मेले आयोजित किये जाने चाहिये। कृषि विकास में किसान मेलों की महत्वपूर्ण भूमिका से कृषि एवं संबंधित विभाग प्रभावित हुए हैं। वास्तव में किसान मेला कृषि तकनीकी का सामयिक आयोजन होता है, जिसमें किसान भाग लेकर प्रत्यक्ष लहलहाती फसलों को देखते हैं तथा उन्नत बीज, कृषि यंत्र, पौध संरक्षण सामग्री को देखकर उन्हें अपनाते हैं। किसान मेले में कृषि से संबंधित सभी गतिविधियों को शामिल करने का प्रयास किया जाता है। इस अवसर पर लगायी गई प्रदशनी में चित्र, चार्ट, पोस्टर आदि का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे किसानों को नई कृषि तकनीक की जानकारी मिलती है।

                किसान मेले का कृषि तकनीकी का सामयिक चित्रण - bhagchandra.comसबसे महत्वपूर्ण भाग होता है- किसान गोष्ठी, जिसमें किसान सीधे कृषि वैज्ञानिकों से अपने प्रश्न पूछकर अपनी समस्याओं का समाधान करते हैं अर्थात किसान गोष्ठी में कृषि वैज्ञानिकों और किसानों का सीधा संवाद होता है किसान मेला, कृषक दिवस, दलहन दिवस तिलहन दिवस, सोयाबीन दिवस, आलू दिवस, समय-समय पर आयोजित किये जाते हैं, जिनके आयोजन का सिलसिला वर्ष भर चलता रहता है। किसान मेले कृषकों के कितने हित में होते हैं, किसान इनका लाभ कैसे उठायें, यह जानकारी प्रस्तुत लेख मंे दी जा रही हैं।

                अंग्रजी की एक कहावत है – ‘र्सीइंग इज ब्लिविंग’ (Seeing is Bleving) अर्थात देखकर जल्दी विश्वास होता है। किसान मेले में प्रक्षेत्र भ्रमण के साथ-साथ प्रयोगशाला की तकनीकी प्रदर्शित की जाती है, जिसमें किसान नवीनतम तकनीक जैसे ऊतक संवर्धन, सत्य बीज से आलू उत्पादन आदि को प्रत्यक्ष देखकर काफी प्रभावित होते हैं तथा समुदाय में नई तकनीक अपनाने का विचार बनाते हैं।

                किसान मेले में दूर-दूर से आकर किसान भाई, एक-दूसरे से मिलते हैं तथा आपस में विचार-विमर्श कर अपने अनुभव बांटते हैं। किसान मेला के अवसर पर लगायी गई प्रदर्शनी में शासकीय, सहकारी तथा निजी संस्थाये अपनी-अपनी प्रदर्शनी या स्टाल लगाती हैं, जिनमें तरह-तरह के आदान उपलब्ध होते हैं, यदि किसान चाहें तो इन कृषि आदानों को वे खेरीद सकते हैं।

                कृषि विकास कार्यक्रमों को कृषि जलवायु के आधार पर क्रियान्वित किया जा रहा है तथा विभिन्नताओं को देखते हुये ‘कृषि जलवायु क्षेत्रीय परियोजना’ के क्षेत्र बनाये गये हैं, छत्तीसगढ़ में उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र, छत्तीसगढ़ का मैदान तथा बस्त्र का पठार नामक तीन जलवायु क्षेत्र बनाये गये हैं। इन जलवायु क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले 27 जिलों में कृषि विकास दु्रत गति से होगा। कृषि प्रसार की दृष्टि से क्षेत्र की विभिन्नता का पता लगाया जाता है तथा सामूहिक विकास हेतु व्यवहारिकता के अनुसार योजना बनायी जाती है, फिर लक्ष्य निर्धारित कर योजनाकी विषय वस्तु निश्चित की जाती है। किसान मेले में कृषि प्रसार की पांच अवस्थाएं एक साथ परिलक्षित होती हे, जहां किसान अपनी स्थिति, उपयुक्तता, व्यवहारिकता, लक्ष्य और अपनाने के बारे में निर्णय ले सकते हैं।

                 किसान मेले में सामयिक तकनीक का सजीव चित्रण किया जाता है, जिसमें बहुत कम समय में बड़ी संख्या में किसान भाग लेते हैं, खरीफ और रबी में किसान मेले आयोजित किये जाते हैं, किसान मेले का उद्देश्य सूचना के प्रसार तक सीमित नहीं होता है, बल्कि कृषि तकनीक के संदेश को ग्रहण करने पर आधारित होता है। मेले में प्रत्यक्ष देखने से विश्वास गहरा होता है। किसान मेले की सफलता का आंकलन हमें उपस्थित कृषकों की भीड़ से नहीं लगाना चाहिये, अपितु नई तकनीक को अपनाने से लगाना चाहिये।

                किसान मेेले में उत्कृष्ट सब्जी तथा फलों के नमूनों को प्रदर्शित किया जाता है, मेले में एक और जहां हरित क्रांति, श्वेत क्रांति और नीली क्रांति प्रदर्शित की जाती है, वहीं कृषि के साथ-साथ सहयोगी व्यवसाय अपनाने के लिये प्रेरित किया जाता है। किसान मेले का आयोजन जिला, आंचलिक, प्रांतीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है, जिसमें सैकड़ों-हजारों की संख्या में दूर-दूर से आकर किसान भाग लेते हैं तथा उन्नत कृषि तकनीक से प्रभावित होकर उसे अंगीकार करते हैं।

केंद्रीय बजट और किसान

डॉ. भागचंद्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
कृषि महाविध्यालय, रायपुर-492012

‘कृषिरेव महालक्ष्मी:’ अर्थात् कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है !  भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिशत व्यक्ति खेती कर रहे हैं ! भारत विकासशील देश है ! भारत सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है, जहां विश्व में सबसे ज्यादा दूध और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है ! आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के अनुसार भारत की आर्थिक विकास दर का अनुमान 7.00 से 7.50 के मध्य लगाया गया है ! सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान हर साल घटता जा रहा है ! भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2015-16 में कृषि एवं सहयोगी क्षेत्र में विकास दर  1.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है ! वर्ष 2014-15 में खाद्यान्न उत्पादन 25.30 करोड़ टन हुआ था, जिसमे वर्ष 2015-16 में आधा प्रतिशत कमी का अनुमान लगाया गया है ! वर्ष 2014-15 में खाद्यान्न उत्पादन 25.30 करोड़ टन हुआ था, जिसमे वर्ष 2015-16 में आधा प्रतिशत कमी का अनुमान लगाया गया है !

                       कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए वर्ष 2016-17 के बजट में विभिन्न प्रावधान किये गये हैं ! कृषि और सम्बंधित गतिविधियों के लिए 35984 करोड़ रूपये आवंटित किये हैं ! वर्ष 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया हैं ! केंद्रीय बजट में कृषि विकास के लिए कई योजनाओं की घोषणा की गयी है, जैसे – कृषि साख में वृध्दि, सिंचाई और जैविक खेती को बढ़ावा, फसल बीमा को प्रोत्साहन, उर्वरक अनुदान खाते में, कृषि विपणन एवं खाद्य प्रसंस्करण पर जोर आदि !

केंद्रीय बजट और किसान - bhagchandra.com
  • कृषि साख                                                                                                                                                                      

                      कृषि में ऋण इंजेक्शन की भूमिका निभाता है ! किसानों को समय पर कर्ज मिलेए जिससे कृषि में पूंजी निवेश बढ़े ! केंद्रीय बजट में कृषि ऋण के लिए 9 लाख करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया हैए जो की वर्ष 2015-16 में 8.5 लाख करोड़ रूपये था ! भारत कर्ज प्रधान देश हैए जहां किसानों पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा हैए बजट में इस बोझ को काम करने के लिए 15 हजार करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है ! कृषि में ऋण का प्रावधान बढ़ने से उन्नत तकनीक को बढ़ावा मिलेगा तथा किसानों की आमदनी बढ़ेगी!

 

  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना                                                                                                                                            

                      बजट में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को मिशन माड में  लागू करने की घोषणा की गई है ! सिंचाई की 89 परियोजनाओं को फास्ट ट्रेक किया जायेगाए जिसके लिए अगले पांच वर्षो में 86,500 करोड़ रूपये की आवश्यकता होगी ! जिससे 28 लाख हेक्टेयर में सिंचाई सुविधायें विकसित की जायेगी ! इनमें से 23 परियोजनाओं को 31 मार्च 2017 से पहले पूरा किया जायेगा ! प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना का उद्देश्य हर किसान की भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना है और सरकार का लक्ष्य ‘हर बून्द के साथ अधिक फसल’ के जरिये पानी का उचित उपयोग करना है, सिंचाई सुविधा बढ़ने से फसल विविधिकरण को बढ़ावा मिलेगा !
सिंचाई के लिए राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के अधीन 20 हजार करोड़ रूपये की निधि रखी गई है ! भू जल पुर्णमरण के लिए बजट में 60 हजार करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है !

 

  • उर्वरक अनुदान सीधे खाते में                                                                                                                                                    

                      किसानों को उर्वरकों पर मिलने वाला अनुदान अब सीधे उनके खाते में जमा होगा ! केंद्रीय बजट में ऐसा प्रावधान होने से किसानों को उचित मूल्य पर उर्वरक मिलेंगे !

 

  • जैविक खेती

बदलते हुये परिवेश में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है, इसलिये केंद्रीय बजट में जैविक खेती विकास हेतु 400 करोड़ रूपये आवंटित किये गए हैं ! जैविक खेती पांच लाख एकड़ में की जाएगी ! परम्परागत् कृषि विकास योजना के अंतर्गत आगामी तीन वर्षों में जैविक खेती पर 5 लाख करोड़ रूपये खर्च किये जायेंगे !

 

  • फसल बीमा

कृषि मौसमी व्यवसाय है, जहां प्राकृतिक आपदा के कारण फसलें खराब हो जाती हैं ! इन फसलों के नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए बजट में 5500 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है !

 

  • कृषि विपणन

                     फसलों, कृषि उत्पादों को उचित मूल्य दिलाने के लिए केंद्रीय बजट में प्रावधान किया गया है ! किसान उत्पादक अपनी फसलों, उत्पादों को विभिन्न मंडियों में बेंच सकेंगे ! राष्ट्रीय कृषि बाजार से देश की लगभग 550 मंडिया 14 अप्रैल 2016 से जुड़ेंगी, ऐसा होने से मध्यस्थों की भूमिका कम होगी ! बजट में प्रावधान है की कृषि मंडी कानून में परिवर्तन कर उसे व्यवहारिक बनाया जायेगा ! भारतीय खाद्य द्वारा ऑनलाइन खरीदी की जायेगी !

 

  • खाद्य प्रसंस्करण

केंद्रीय बजट में प्रावधन किया गया है कि खाद्य प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए उसमे 100 % विदेशी निवेश किया जा सकेगा !

 

  • दलहन विकास

आहार में दलहन की उपलब्धता दिनों – दिन कम होती जा रही है, इसलिए दलहन उत्पादन के लिए बजट में 500 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है ! दालें महँगी होती जा रहीं हैं, जिसके लिए बाजार स्थिरीकरण कोष हेतु 500 करोड़ रूपये दिए जायेंगे !

 

  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड

खेती मिट्टी पर आधारित होती है, जैसी मिट्टी होगी, जैसे उसमें पोषक तत्व होंगे – वैसी ही फसलों की खेती की जायेगी ! इसके लिए मिट्टी का स्वास्थ्य जानना आवश्यक है ! बजट में मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना में 14 करोड़ किसानों को शामिल करने के लक्ष्य निर्धारित किया गया है !

 

 

 

सहकारी आंदोलन में महिलाओं की भूमिका

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

‘यत्र नारी पूज्यन्ते, तत्र रमन्ते देवता‘ शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का वास होता है। भारतीय संस्कृति में नारी का योगदान स्मरणीय रहा है। समय परिवर्तनषील है, आज महिलायें अपनी योग्यता, गुणवत्ता, षिक्षा कार्य कुषलता के आधार पर पुरूषों के बराबर कार्य कर रही हैं तथा कुछ क्षेत्रों में महिलायें आगे भी हैं क्योंकि पुरूषों की तुलना में महिलाओं में धैर्य, नम्रता तथा विभिन्न परिस्थितियों में अपने आपको ढालने, घुल-मिल जाने की क्षमता प्रायः अधिक रहती है। बालिका से लेकर महिलाओं तक इनमें एक अच्छे प्रबंधन की क्षमता होती है किन्तु यह विडम्बना है कि भारत के व्यवसायों में महिलाओं की भागीदारी केवल 5 प्रतिषत है। सहकारिता के क्षेत्र में ‘ लिज्जत पापड़‘ उद्योग महिलाओं की अप्रत्याषित सफलता की कहानी सुना रहा है, लिज्जत पापड़ जैसे उद्योगों सें महिलायें अनुसरण कर सकती हैं।

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           ‘पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ग्रामीण विकास हेतु तीन आवष्यकतायें बतायी थीं – ग्राम पंचायत, सहकारी समिति और पाठशाला।  ग्राम पंचायत से सामाजिक उद्देष्यों की पूर्ति होती है,  सहकारी समिति से आर्थिक उद्देष्यों की पूर्ति होती है, और पाठशाला से शैक्षणिक उद्देष्यों की पूर्ति होती है।  गांव-गांव में ये तीनों संस्थायें कार्यरत हैं, बस जरूरत है इन संस्थाओं की समर्पण भावना से कार्य करने की।  पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सहकारिता में महिलाओं की भूमिका इस प्रकार बतायी थीं – ‘यदि जनता में जागृति पैदा करनी है तो पहले महिलाओं में जागृति पेैदा करों।  एक बार जब वे आगे बढ़ती हैं तो परिवार आगे बढ़ता है, गांव व शहर आगे बढ़ता है – सारा देश आगे बढ़ता है।‘

                        सहकारिता में महिलायें आगे आ सकती हैं, यदि वे संगठित हो जायें तथा सहकारी समिति गठित कर अपनी जरूरतों को पूर्ण करने में सक्षम बने। हमारे कृषि प्रधान देष में फसलों की बुवाई से लेकर कटाई तक के 5.0 प्रतिषत से अधिक कार्य महिलायें करती हैं  तो क्या वे मसाला, पापड़, दाल, बिसकुट, फल सब्जी संरक्षण में आगे्र क्यों नहीं आ सकती हैं – बस जरूरत है इनके मार्गदर्षन की ओर महिलाओं को जागृत करने की।

                         भारत का दुग्ध उत्पादन में विष्व में पहला स्थान है। यह गौरव का विषय है कि भारत में स्थित विभिन्न डेरियों में 18 लाख स्त्रियां कार्य कर रही हैं तथा वे दुग्ध उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं। दुग्ध सहकारिता के क्षेत्र में गुजरात में महिलाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। सहकारी संस्थाओं की संख्या में वृद्वि हो और उनमें महिलाओं की अधिक से अधिक भागीदारी बढ़े, इसके लिए सहकारी नियमों, उप नियमों में संषोधन कर महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिष्चित किया गया है।

                         पुरूषों की अपेक्षा महिलाओं में बचत करने की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है, इसलिए सहकारी साख समितियों में बचत बैंक खोले गये हैं।  महिलाओं की आर्थिक उन्नति के लिए विभिन्न योजनायें संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं में अनुदान भी दिया जा रहा है।

                         सदियों से उद्यम और परिश्रम के लिए महिलायें मषहूर रही हैं, परन्तु उन्हें जरूरी सहायता नहीं मिल पायी है, जिसके कारण वे देष में हो रहे विकास से लाभान्वित नहीं हो पायी हैं।  ऐसा प्रतीत होता है कि विकास के संसाधन जैसे – ऋण, तकनीकी, प्रषिक्षण, उन्नत औजार – उपकरण तथा वितरण के अवसर का अधिकांष लाभ पुरूषों पर केंद्रिक रहा है। इस असंतुलन को दूर करने के लिए उद्योगों से महिलाओं को जोड़ने के लिए प्रयास किये जा हैं,  जैसे – हाथ  करघा संचालनालय, रेषम संचालनालय, खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड, हस्त षिल्प विकास निगम, चर्म विकास निगम, चर्म विकास निगम, बुनकर सहकारी संघ, पावरलूम सहकारी संघ तथा औद्योगिक सहकारी संघ में महिला उद्यमियों की भागीदारी सुनिष्चित की गई है।

                        कृषि कार्यों और दुग्ध व्यवसाय में महिलायें लगी हुई हैं, वे स्वयं सेवी संस्थाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहीं है – इन बातों को सभी जानते हैं। अकेली कृषि से ही गांवों का विकास नहीं हो सकता, क्योंकि दिनों दिन जनसंख्या बढ़ती जा रही है। अब कृषि के साथ-साथ कृषि आधारित व्यवसायों, ग्रामोद्योगों को भी बढ़ावा देना होगा।  ग्रामोद्योगों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रमुख कदम उठाये जा रहे हैं, जैसे –

  • महिलाओं के लिए विभिन्न कार्यक्रमों का लाभ पहुंचाने हेतु महिला तथा पुरूषों की गणना पृथक रूप से की जा रही है।
  • शासकीय कार्यक्रमों के विभिन्न अंतर्गत ग्रामोद्योगों में कम से कम 50 प्रतिषत महिला हितग्राही शामिल किये जा रहें है।
  • महिला उद्यमियों को सभी प्रषिक्षण कार्यक्रमों में अनिार्य रूप से शामिल किया जा रहा है।
  • ग्रामोद्योगों के लिए जिला ग्रामीण विकास अभिकरण, महिला एवं बाल विकास विभाग, लोक  स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग द्वारा जरूरी सुविधायें उपलब्ध करायीं जा रहीं हैं।
  • महिलाओं में उद्यमिता बढ़ाने के लिए अषासकीय संस्थाओं और महिला समूहों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है!
  • महिलाओं को पंचायती राज के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी देकर ग्रामोद्योग को बढ़ावा दिया जा रहा है।                                                                                                                                                                                                                                                            महिलाओं को स्वावलम्बी बनाने के लिए सहकारिता महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है, यदि उन्हें साधन और पूंजी सहकारिता द्वारा उपलब्ध करा दी जाती है तो वे विपणन, बचत, उत्पाद की गुणवत्ता और आमदनी बढ़ाने में आगे आ सकती हैं।
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