अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी 

महावीर दर्शन की मुल धुरी अहिंसा है जियो और जीने दो का उद्घोष भगवान महावीर ने किया था. मन वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है. अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है. भगवान महावीर के विश्व बंधुत्व संदेश से उनकी तपस्या से जन-जन में आत्मीय और दया की भावना सजीव हो गई थी.

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी

अहिंसा परमोधर्मः अर्थात अहिंसा ही परम धर्म है. अहिंसा को केन्द्र मानकर भगवान महावीर ने सत्य अस्तेय, अपरिग्रह संभव है. अहिंसा से विश्व की शांति जुड़ी हुई है. मानव ही नही प्रत्येक जीव का कल्याण अहिंसा पर केद्रित है. भारत में सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना विहार के वैशाली राज्य में हुई थी. इस राज्य के प्रमुख महराज चेटक थे, जिनके भनेज के रूप में महावीर का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को ईसा से 599 वर्ष पहले कुण्डल पुर नगर में हुआ था. नालंदा जिले में स्थित इस कुण्डलपुर नगरी के कण-कण में महावीर के जन्म की पवित्रता आज भी विद्यमान है, इसलिए यहां की रज प्राप्त करने के लिए देश विदेश से जैन धर्मावलंबी कुण्डलपुर पहुंचते है. और कुण्डलपुर अवतारी, त्रिशलानंद विभो आदि संबोधन से भगवान महावीर की आरती उतारते ह. सिद्धार्थ के सोने के महल ष् नद्यावर्त ष् में महावीर का जन्म हुआ था, जिसका प्रतिरूप आज भी उसके पालने और जीवन संबंधी प्राचीन कलाकृतियों को सचित्र दर्शाता है. नद्यावर्त महल के आंगन में धन कुबेर द्वारा रत्नांे की वर्षा की गई थी. महावीर के जन्म के पूर्व माता त्रिशाला को सोहल स्वप्न आये थे, जिनका फल माता ने महाराज सिद्धार्थ से पूछा था. संजय-विजय महामुनी ने बालक वर्धमान का नाम रखा. संगमेदव को वर्धमान का नाम ष् महावीर ष् रखा. वे कर्म को जीतने से ष् वीर ष् धर्म उपदेश देने से ष् सन्मति ष् और उपसर्गों के सहन करने से महावीर कहलाये. 2600 वर्ष बीत जाने के बाद भी कुण्डलपुर के नद्यावर्त महल में महावीर के नामकरण , स्वर्ग से देवों द्वारा लाये गये वस्त्रों-अलंकारों का वर्धमान द्वारा पहनना, देवगणों द्वारा उनके लिए भोजन लाना, उद्यान में सर्प के फन पर उनका खेलना , संगीत सभा और सभा में पुछे गये प्रश्नो के उत्तर देते हुए महावीर की अभिनव प्रस्तुति सबका मन मोह लेती है. भगवान महावीर ने बाल्यकाल मे कठिन तपस्या के लिए वन में गमन किया , जिन्हे आहार देने के कारण चंदना सती हुई और संसार में पसिद्ध हुई. भगवान महावीर का पहला सातवां और नौवा चर्तुमास कुण्डलपुर में हुआ था. कठोर तपस्या के बाद उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा अपनी इद्रियों पर विजय प्राप्त की. त्याग पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए उन्होने अपूर्व साहस और मनोबल का परिचय दिया. अंत में वो पावापुरी पहुंचे, जहां मनोहर नामक वन में पहुंचकर आत्म ध्यान करने लगे. कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को 72 वर्ष की उर्म में उन्होने मो़क्ष प्राप्त किया. उनके साथ 26 मुनी मोक्ष गये. निर्वाण भूमि पावापुरी मे पद्म सरोवर के मध्य में जल मंदिर बना हुआ है कि यहां भगवान महावीर का निर्वाण होने पर उनका अंतिम संस्कार देवताओं ने किया था. पावापुरी की भूमि इतनी पावन है कि यहां से धर्मावलंबी मिट्टी ले जाते रहे है, जिसके कारण 1459 फुट लंबे और 1223 चैडे़ पद्म सेरोवर का निर्माण हो गया. महावीर दर्शन की मुल धुरी अहिंसा है. जियो और जीने दो का उद्घोष भगवान महावीर ने किया था. मन वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है. अहिंसा का यर्ह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है भगवान महावीर के विश्व बंधुत्व संदेश से, उनकी तपस्या से जन-जन में आत्यमीय और दया की भावना सजीव हो गई थी. सच से बड़ा कोई धर्म नही होता और झुठ से बड़ा पाप नही, इसलिए मन वचन और कर्म द्वारा सत्य का पालन करना चाहिए. दुसरो पर शासन मत करो अपने शरीर पर अपने वाणी पर, अपने मन पर. सभी प्रकार की वासनाओं को त्याग कर संयमी जीवन व्यतीत करना चाहिए. महावीर ने अपने उपदेशो में आत्म अनुसंधान पर विशेष बल दिया है. आत्मशुद्धि साधनं धर्मः आत्मा की शुद्धि का साधन ही धर्म है. आज की विषम परिस्थितियों में भी महावीर स्वामी के उपदेश प्रत्येक मानव को सुख शांति प्रदान कर सकते है, अखिल विश्व के स्वामी अनंत गुणों के सागर, धर्मरूपी चक्र के धारक भगवान महावीर की स्तुति महावीर पुराण में इस प्रकार की गई है –

सागर अतुलित गुणों के,
सर्वमान्य अखिलेश।
धर्मचक्र धारी महा,
बन्दो वीर जिनेश ।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
प्रचार अधिकारी
कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

धान के कटोरा छत्तीसगढ़

धान के कटोरा छत्तीसगढ़

“धान के कटोरा में “

 farmer_66fb66b9-32ef-11e5-a8da-005056b4648eहे किसान, देश की शान, हमारा देश कृषि प्रधान।

कौशल्य की जन्म भूमि में छिपी छत्तीसगढ़ की शान।।
धान का कटोरा प्रगतिशील है, शुष्क खेती प्रधान।
जहां महानदी-इन्द्रावती-शिवनाथ की महिमा महान ।।

प्राकृतिक सम्पदा का धनी है छत्तीसगढ़ प्यारा।
भिलाई-कोरबा-बैलाडीला देश-प्रदेश में न्यारा।।
सदियो कि संस्कृति लिये हुये है वन के वासी।
भोले भाले , कठिन परिश्रमी, आदि पुरूष आदिवासी।।

छत्तीसगढ़ के सर्वक्षण से मिला कृषि समाचार।
कन्हार, डोरसा, मटासी, भाटा भूमि का अघिकाार।।
कहीं गोबर की खाद जरूरी और भूमि उपचार।
यहां कि भूमि कर रही परिश्रम का इंतजार।।

जियो और जीने दो के उद्घोष भगवान महावीर

जियो और जीने दो के उद्घोष भगवान महावीर

जियो और जीने दो के उद्घोष भगवान महावीर

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी है-जियो और जीने दो का उद्घोष महावीर स्वामी ने किया था. मन वचन और कार्य से किसी जीव को संताप न पहुंचाना की सच्ची अहिंसा है। अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्पारा का विशिष्ट देन है। अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है। महावीर स्वामी के विश्व बधुत्व संदेश से, उनकी तपस्या से जन-जन में आत्मीयता और दया की भावना संजीव हो गई थी। सच से बड़ा कोई धर्म नही और झुठ से बड़ा पाप नही, इसलिए मन वचन और कर्म द्वारा सत्य का पालन करना चाहिए।

स्वयं जियो औरों को भी जीने दो प्रत्येक प्राणी जीना चाहता है, मरना नही- अतः प्राणी मात्र की हिंसा मत करो हिंसा में अधर्म, आत्म पतन होता है और अहिंसा में आत्म उत्थान होता है। असत्य बोलने का त्याग करना सौ सत्य धर्म के बराबर है. सभी दुख हिंसा से उत्पन्न होते है। ब्रम्हचर्य मोक्ष का सोपान होता है। इच्छा रहित होना अपरिग्रह है. भगवान महावीर के एैसे उपदेश आत्मा को परमात्मा से जोड़ने और विश्व शांति स्थापित करने में आज अधिक प्रासंगिक है।

अहिंसा परमोधर्माः आर्थात अहिंसा ही परम धर्म है। अहिंसा को केन्द्र मानकर भगवान महावीर ने सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रम्हचर्य जैसे महाव्रतों का उपदेश दिया था। अहिंसा से सत्य जुड़ा है. अहिंसा से ही अपरिग्रह संभव है। अहिंसा से विश्व शांति जुड़ी है। मानव ही नही प्रत्येक जीव का कल्याण अहिंसा पर आधारित है।

भारत में सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना बिहार के वैशाली राज्य में हुई थी। इस राज्य के प्रमुख महराज चेटक थे,जिनके भनेज के रूप में महावीर का जन्म ईसा ईसा के 599 पहले कुण्डलपुर नगर के सोने के महल नद्यावर्त में हुआ था। माता त्रिशाला को यहां सोहल स्वप्न आये थे,जिनका फल माता ने महराज सिद्धार्थ से पुछा था। नालंदा जिले में स्थित इस कुण्डलपुर नगरी के कण-कण में महावीर के जन्म की पवि़त्रता आज भी विद्यमान है- इसलिए यहां के रज प्राप्ति करने के लिए देश विदेश से धर्मानुरागी कुण्डलपुर पहुंचते है।

पांच-महाव्रत
चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को बड़े धुम-धाम से महावीर जयंती मानई जाती है. महावीर स्वामी ने कहा था मनुष्य जन्म से नही कर्म से महान बनता है। उनके सिद्धांत आज अधिक प्रासंगिक है- जिनके अहिंसा सत्य, अचैर्य, अपरिग्रह और ब्रम्हचर्य पर केन्द्रित उपदेशों में अकेेले मानव ही नही अपितु प्रत्येक प्राणी का हित छुपा है। अहिंसा महावीर दर्शन की मुल धुरी है. जियो और जीने दो का उद्घोष महावीर स्वामी ने किया था। मन वचन और कार्य से किसी जीव को संताप न पहुुंचाना ही सच्ची अहिंसा है। अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्परा कि विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाईचारा कायम रह सकता है महावीर स्वामी के विश्व बधुत्व संदेश से, उनकी तपस्या से जन-जन में दया और आत्मीयता की भावना सजीव हो गई थी। सांच से बड़ा कोई धर्म नही होता है और झुठ से बड़ा पाप नही, इसलिए मन, वचन और कर्म द्वारा सत्य का पालन करना चाहिए। आज रोग द्वेष और झुठ का बोलबाला है। अचैर्य अर्थात चोरी होता है, इस दुषित प्रवृति से छुटकारा पाने के लिए महावीर स्वामी ने अनेकांतवाद का उपदेश दिया था। महावीर स्वामी ने कहा था आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह नही करना चाहिए भारत की जनसंख्या बढ़ती जा रही है, जिसें मुलभुत साधनो जैसे- आहार, वस्त्र और आवास की उपलब्धता होना जरूरी है। कोई भी व्यक्ति यदि जरूरत से अधिक इन आवश्यकताओं का संग्रह करता है तो दुसरे व्यक्ति इनसे वंचित रह जाते है-इसलिए सग्रह अनुचित है। दुसरो पर शासन मत करो, शासन करो अपने शरीर पर, अपनी वाणी पर, अपने मन पर सभी प्रकार की भावनाओं को त्यागकर संयमी जीवन व्यतीत करना चाहिए। महावीर स्वामी ने बाल्याकाल में कठिन तपस्या के लिए वन गमन किया जिन्हें आहार देने के कारण चंदना सती हुई और संसार में प्रसिद्ध हुई, जिन्होने केवल ज्ञान प्राप्त कर मोक्ष देने वाले जैन धर्म का प्रचार किया. वे कर्म को जीतने से वीर धर्म उपदेश देने से सन्मति और उपसर्गो को सहन करने से महावीर कहलायेगें।

कठोर तपस्या के बाद महावीर स्वामी को केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई, उन्होने अपने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की। उन्होने अपूर्व साहस व मनेबल का परिचय दिया था। अंत में वे पावापुरी पहुंचे, जहां मनोहर नामक वन में पहुंचकर आत्म ध्यान करने लगे। उन्होेंने 72 वर्ष की उर्म में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मोक्ष प्राप्त किया. महावीर स्वामी की निर्वाण भूमि पावापुरी है। जहां पद्म सरोवर के मध्य में जल मंदिर बना हुआ है. एैसा माना जाता है की यहां महावीर यहां महावीर स्वामी का अंतिम संस्कार हुआ था।

आज कि विषम परिस्थितियों में भी महावीर स्वामी के उपदेश प्रत्येक मानव को सुख-शांति प्रदान कर सकते है, उनके संदेश ह्दय को प्रभावी ढंग से स्पर्श करते ह। अखिल विश्व के स्वामी,अनंत गुणो के सागर, धर्मरूपी चक्र के धारक भगवान महावीर की स्तुती महावीर पुराण में इस प्रकार की गई है-

सागर अतुलित गुणों के,
सर्वमान्य अखिलेश।
धर्मचक्र धारी महा,
बन्दो वीर जिनेश।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
प्रचार अधिकारी
कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

 

जन्म से नही कर्म से महान

जन्म से नही कर्म से महान

जन्म से नही कर्म से महान

धर्म-दर्शन
डाॅं. भागचन्द्र जैन

मनुष्य जन्म से नही कर्म से महान बनता है – महावीर स्वामी के सिद्वांत आज अधिक प्रासंगिक है- जिनके अहिंसा, सत्य, अचैर्य अपरिग्रह और बम्हचर्य पर केंद्रित उपदेशो में अकेले मानव ही नही अपितु प्रत्येक प्राणी का हित छिपा है.

महावीर दर्शन की मूल धुरी अहिंसा है. ष् जियो और जीने दो ष् का उद्घोष महावीर स्वामी ने किया था. मन वचन और कार्य से किसी जीव संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है। अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है। विश्व में अहिंसा से ही शांति भाई-चारा कायम रह सकता है। आज शोशण उत्पीड़न, अप्रमाणिक माप-तौल व्यपार, जमीन जायजाद जैसी दुष्प्रवृत्तियां पनप रही है। इस स्थति में अहिंसा ही सबसे कारगार उपाय है। इसके अतिरिक्त सत्य अचैर्य अपरिग्रह, ब्रम्हचर्य जैन धर्म में शामिल है। कठोर तपस्या के बाद महावीर स्वामी को कैवल्य की प्राप्ति हुई, उन्होने अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की। उन्होने अपूर्व साहस और मनोबल का परिचय दिया था। अंत में वे पावापुरी पहुंचे, जहां मनोहर नामक वन में पहुंचकर आत्म ध्यान करने लगे। उन्होने 72 वर्ष की उम्र में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को मोक्ष प्राप्त किया।

महावीर स्वामी की निर्माण भूमि पावापुरी है, जहां पद्म सरोवर के मध्य मे जल मंदिर बना हुआ है, एैसा माना जाता है कि यहां महावीर स्वामी का अंतिम सस्कार हुआ था, यह भूमि इतनी पावन है कि वहां से धर्मावलंबी मिट्टी ले जाते रहें, जिसके कारण 1459 फुट लंबे और 1223 फुट चैडे़ पद्म सरोवर का निर्माण हुआ।

भागवान महावीर के उपदेश आज कि विषम परिस्थितियों में प्रत्येक मानव को सुख शांति प्रदान कर सकते है। उनके संदेश प्रभावी ढंग से ह्दय को स्पर्श करते है। अखिल विश्व के स्वामी, अनंत गुणों के सागर भागवान महावीर की स्तुति महावीर पुराण में इस प्रकार की गई है-

सगर अतुलित गुणों के,
सर्वमान्य अखिलेश।
धर्मचक्र धारी महा ,
बंदो वीर जिनेश।।

 

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी

अहिंसा महावीर दर्शन की मूल धुरी

महावीर दर्शन की मुल धुरी अहिंसा है. जियो और जीने दो का उद्घोष भगवान महावीर ने किया था. मन वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है. अहिंसा का यह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है. भगवान महावीर के विश्व बंधुत्व संदेश से उनकी तपस्या से जन-जन में आत्मीय और दया की भावना सजीव हो गई थी.

अहिंसा परमोधर्मः अर्थात अहिंसा ही परम धर्म है. अहिंसा को केन्द्र मानकर भगवान महावीर ने सत्य अस्तेय, अपरिग्रह संभव है. अहिंसा से विश्व की शांति जुड़ी हुई है. मानव ही नही प्रत्येक जीव का कल्याण अहिंसा पर केद्रित है. भारत में सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना विहार के वैशाली राज्य में हुई थी. इस राज्य के प्रमुख महराज चेटक थे, जिनके भनेज के रूप में महावीर का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को ईसा से 599 वर्ष पहले कुण्डल पुर नगर में हुआ था. नालंदा जिले में स्थित इस कुण्डलपुर नगरी के कण-कण में महावीर के जन्म की पवित्रता आज भी विद्यमान है, इसलिए यहां की रज प्राप्त करने के लिए देश विदेश से जैन धर्मावलंबी कुण्डलपुर पहुंचते है. और कुण्डलपुर अवतारी, त्रिशलानंद विभो आदि संबोधन से भगवान महावीर की आरती उतारते ह. सिद्धार्थ के सोने के महल ष् नद्यावर्त ष् में महावीर का जन्म हुआ था, जिसका प्रतिरूप आज भी उसके पालने और जीवन संबंधी प्राचीन कलाकृतियों को सचित्र दर्शाता है. नद्यावर्त महल के आंगन में धन कुबेर द्वारा रत्नांे की वर्षा की गई थी. महावीर के जन्म के पूर्व माता त्रिशाला को सोहल स्वप्न आये थे, जिनका फल माता ने महाराज सिद्धार्थ से पूछा था. संजय-विजय महामुनी ने बालक वर्धमान का नाम रखा. संगमेदव को वर्धमान का नाम ष् महावीर ष् रखा. वे कर्म को जीतने से ष् वीर ष् धर्म उपदेश देने से ष् सन्मति ष् और उपसर्गों के सहन करने से महावीर कहलाये. 2600 वर्ष बीत जाने के बाद भी कुण्डलपुर के नद्यावर्त महल में महावीर के नामकरण , स्वर्ग से देवों द्वारा लाये गये वस्त्रों-अलंकारों का वर्धमान द्वारा पहनना, देवगणों द्वारा उनके लिए भोजन लाना, उद्यान में सर्प के फन पर उनका खेलना , संगीत सभा और सभा में पुछे गये प्रश्नो के उत्तर देते हुए महावीर की अभिनव प्रस्तुति सबका मन मोह लेती है. भगवान महावीर ने बाल्यकाल मे कठिन तपस्या के लिए वन में गमन किया , जिन्हे आहार देने के कारण चंदना सती हुई और संसार में पसिद्ध हुई. भगवान महावीर का पहला सातवां और नौवा चर्तुमास कुण्डलपुर में हुआ था. कठोर तपस्या के बाद उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई तथा अपनी इद्रियों पर विजय प्राप्त की. त्याग पूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए उन्होने अपूर्व साहस और मनोबल का परिचय दिया. अंत में वो पावापुरी पहुंचे, जहां मनोहर नामक वन में पहुंचकर आत्म ध्यान करने लगे. कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को 72 वर्ष की उर्म में उन्होने मो़क्ष प्राप्त किया. उनके साथ 26 मुनी मोक्ष गये. निर्वाण भूमि पावापुरी मे पद्म सरोवर के मध्य में जल मंदिर बना हुआ है कि यहां भगवान महावीर का निर्वाण होने पर उनका अंतिम संस्कार देवताओं ने किया था. पावापुरी की भूमि इतनी पावन है कि यहां से धर्मावलंबी मिट्टी ले जाते रहे है, जिसके कारण 1459 फुट लंबे और 1223 चैडे़ पद्म सेरोवर का निर्माण हो गया. महावीर दर्शन की मुल धुरी अहिंसा है. जियो और जीने दो का उद्घोष भगवान महावीर ने किया था. मन वचन और कर्म से किसी जीव को संताप न पहुंचाना ही सच्ची अहिंसा है. अहिंसा का यर्ह उत्कर्ष जैन परम्परा की विशिष्ट देन है. अहिंसा से ही विश्व में शांति, भाई चारा कायम रह सकता है भगवान महावीर के विश्व बंधुत्व संदेश से, उनकी तपस्या से जन-जन में आत्यमीय और दया की भावना सजीव हो गई थी. सच से बड़ा कोई धर्म नही होता और झुठ से बड़ा पाप नही, इसलिए मन वचन और कर्म द्वारा सत्य का पालन करना चाहिए. दुसरो पर शासन मत करो अपने शरीर पर अपने वाणी पर, अपने मन पर. सभी प्रकार की वासनाओं को त्याग कर संयमी जीवन व्यतीत करना चाहिए. महावीर ने अपने उपदेशो में आत्म अनुसंधान पर विशेष बल दिया है. आत्मशुद्धि साधनं धर्मः। आत्मा की शुद्धि का साधन ही धर्म है. आज की विषम परिस्थितियों में भी महावीर स्वामी के उपदेश प्रत्येक मानव को सुख शांति प्रदान कर सकते है, अखिल विश्व के स्वामी अनंत गुणों के सागर, धर्मरूपी चक्र के धारक भगवान महावीर की स्तुति महावीर पुराण में इस प्रकार की गई है –

सागर अतुलित गुणों के,
सर्वमान्य अखिलेश।
धर्मचक्र धारी महा,
बन्दो वीर जिनेश ।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)
प्रचार अधिकारी
कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष-2012

अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता वर्ष-2012

सहकारिता की महिमा लिखी है, ऋृगवे – अर्थर्ववेद में ।
इसमें सब कुछ दिखता है, इन्द्र धनुष रंगों के भेद में ।।
प्रगति की पौ बारह होगी 2012 में, सहकारिता अपनाओं ।
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ।।

भारत के गांवों में विश्व का सबसे बड़ा सहकारी नेटवर्क ।
जन आंदोलन यह, जो मिटा रहा अमीरी-गरीबी का फर्क ।।
समानता और खुशहाली के लिए सहकारिता अपनाओ।
विश्व मेे मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ।।

अनेकता में एकता में शोभित है, प्यारा हमारा भारत देश ।
सब एक के लिए एक सबके लिए मै सहकारिता विशेष ।।
यत्र तत्र सर्वत्र विकास के लिए, सहकारिता अपनाओ ।
विश्व में मनाया जा रहा सहकारिता दिवस, तुम भी मनाओ ।।

कृषि, दुग्घ, सिंचाई आवास आदि में इसका सहारा ।
साख से साख यह बढ़ाये, बने बचत का आधारा ।।
विश्व व्यापीकरण के इस दौर में, सहकारिता अपनाओ ।
विश्व में मानाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ।।

सर्व सम्पन्न हो दुनिया सारी, प्रगति है वरदान सहकारी ।
सहकारी पथ पर बढ़ते जाओं, हर क्षेत्र में सफलता पाओ ।।
घर में, बाहर में, गांव-गांव में, तुम सहकारिता अपनाओ ।
विश्व मेें मनाया जा रहा सहकारिता वर्ष, तुम भी मनाओ ।।

डाॅं. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थशास्त्र)प्रचार अधिकारी
कृषि महाविद्यालय, रायपुर (छ.ग.) 492012

 

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