वीतराता की प्रतिरूप-आचार्य विद्यासागर

वीतराता की प्रतिरूप-आचार्य विद्यासागर

प्रसंगवश 

Mahavir-Swami-Bhagwan-24th-Tirthankar-of-Jains

परम तपस्वी, बहुभाषाविद, पंचमकाल में चतुर्थकालीन चरित्रधारी, छोटे बाबा के नाम से आराध्य, अद्वितीय धर्म प्रभावक, सर्वोदयी संत आचार्य श्री विद्यासागर जी महराज विश्व की विरल विभूति. वीतरागता के प्रतिरूप है। चलते फिरते तीर्थ है, वे जहां विहार करते है, चातुर्मास करते है वहा धरती पावन हो जाती है। आचार्य श्री विद्यासागर जी महराज के चातुर्मास का सानिध्य सोनी की नशिय, केशरगंज, किशनगढ़, मदनगंज, नसीराबाद (जिला अजमेर), रेनवाल (जयपुर), फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश), कुण्डलपुर, नैनागिर, थूवोनजी, मुक्तागिरी, जबलपुर, आहार जी, पपोरा जी, नेमावार, सागर, गोम्टगिरी, अमरकंटक, बीना बारहा,(मध्यप्रदेश), रामटेके (नागपुर), महुआ (गुजरात), डोगरगढ़ (छत्तीसगढ़), और दुसरी (गिरीडीह), जैसे स्थानों को मिला चुका है, जिनके आर्शीवाद से धार्मिक प्रभावना देश ही नही अपुति विदेशों तक पहुंची है। छत्तीसगढ़ में पहला श्रीमाद जिनेन्द्र पंचकल्याणक एंव गजरथ महोत्सव दुर्ग में फरवरी 2012 में आयोजित हुआ था, इस अद्वितीय आयोजन में आचार्य श्री का संसघ आर्शीवाद मिला था. शरण पूर्णिमा (10 अक्टूबर 1946) को कार्नाटक प्रांत के बेलगांव जिले के सदलगा की धरती धन्य हो गयी, जब माता श्रीमती अष्टगे ने अद्भुत ज्ञान के सागर, आगम के प्रकाण्ड विद्वान, काव्य प्रतिभा के पयोनिधि, उदारता वात्सल्य की प्रतिमूर्ती बालक विद्याधर को जन्म दिया। धर्म-प्रमी, परोपकारी, करूणा के धनी श्री मल्लपा जी अष्टगेको इनके पिता बनने का भाग प्राप्त हुआ. बाल्यकाल में इन्हें पीलू, मरी, गिनी आदि नामों से संबोधित किया जाता था। इनके बड़े भाई का नाम श्री महावीर प्रसाद जी है और छोटे भाई द्वय श्री अनन्त नाथ जी एंव शांतिनाथ जी है- जो वर्तमान में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सघ में क्रमशः श्री 108 श्री मुनि योगसागर जी एंव श्री 108 श्री समयसागर जी के नाम से तपस्यारत है और जन-जन का कल्याण कर रहे है. आचार्य श्री के पूज्य पिता श्री मल्लपा ली और पूज्य माता ने आचार्य श्री धर्मसागर जी महराज से क्रमशः मुनि दीक्षा और आर्यिका दीक्षा लेकर सांसारिक बंधनो से मुक्ति ले ली थी और मोक्ष मार्ग का रास्ता अपना लिया था. इनकी दोनो बहने सुवर्णा और शांता भी मोक्ष मार्ग पर अग्रसर है, यह अत्यंत सौभाग्य की बात है कि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के वर्ष 2011 वर्ष 2012 में श्री दिगम्बर जैन तीर्थ, चन्द्रगिरी डोगरगढ़ (छत्तीसगढ़) में चातुर्मास हो चुके है इस तीर्थ पर नलकूप खनन में पानी नही निकल रहा था जहां आचार्य श्री के आर्शाीवाद से पानी आ गया था. लगभग 3 वर्ष दशक पहले आचार्य श्री का रायपुर आगमन हुआ था, श्री सकल दिगम्बर जैन समाज, रायपुर द्वारा आचार्य श्री के रायपुर आगमन हेतु बार-बार विनती की जाती रही है. संत शिरोमणी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का 28 फरवरी को रायपुर प्रवेश हुआ. वे चलते फिरते तीर्थ है। वीतरागता के प्रतिरूप है।

-प्रो. डाॅं. भागचन्द्र जैन