कल और आज प्याज ! प्याज!!

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    रसोई में प्रतिदिन तरह तरह की सब्जियां बनायीं जाती हैं, किन्तु यह सच है कि प्याज के बिना रसोई अधूरी है क्योंकि प्याज से सब्जियों के स्वाद में चार चांद लग जाते हैं। प्याज से सब्जी स्वादिष्ट हो जाती है प्याज का सूप भूख बढ़ाता है और शरीर के अनेक विकारों का नाष करता हैं। ताजा प्याज खाने से शरीर की सुस्ती दूर हो जाती है।
भारत में प्याज का उत्पादन लगभग 170 लाख टन होता है, जिसमें 150 लाख टन (84 प्रतिषत) की घरेलू खपत होती है, 6 प्रतिषत वफर स्टाक के रूप में रखी जाती है तथ षेष प्याज में से केवल 7 प्रतिषत प्याज का निर्यात किया जात हैं। मुम्बई, चेन्नई, काण्डला और कोलकाता बंदरगाह से दुबई, कुवेत, सउदी अरब, मलेषिया, सिंगापुर, बांगला देष आदि देषों के लिए प्याज का निर्यात किया जाता है । निर्यात करने पर लगभग 700 डालर प्रति टन भाव मिलता है। एक अनुमान के अनुसार सब्जियों के निर्यात से होने वाली आमदनी में लगभग 70 प्रतिषत विदेषी मुद्रा प्याज से मिलती है।
प्याज की खेती वर्ष भर की जाती है अर्थात् खरीफ रबी और जायद में प्याज का उत्पादन होता है। खरीफ में 10 से 15 प्रतिषत, ,खरीफ में देरी से की जाने वाली खेती में 30 से 40 प्रतिषत और रबी, जायद में 50 से 60 प्रतिषत प्याज का उत्पादन होता है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के अनुसार सबसे ज्यादा प्याज महाराष्ट्र में होती है।

प्रमुख प्याज उत्पादक प्रदेष (2011-12)

क््रं     प्रदेष        उत्पादन (प्रतिषत में )
1.    महाराष्ट्र           32.20
2.    कर्नाटक           14.00
3.    मध्यप्रदेष         11.18
4.    गुजरात            8.92
5     बिहार             7.06
6     आंध्रप्रदेष          4.71
7     राजस्थान         3.79
8     हरियाणा          3.37
9.    तमिलनाडू        3.18
10    उड़ीसा           2.39
11.   अन्य            9.20

कल और आज – प्याज ! प्याज !! इसका उत्पादन अधिक होने से कभी-कभी वह नासिक और अन्य स्थानों पर सड़कों पर फिकती है, किन्तु कभी-कभी इसका उत्पादन कम होने से भाव आसमान छू जाते हैं।
कहा जाता है कि प्याज रूलाती रहती है। प्याज काटने पर आसू आ जाते हैं। कम उत्पादन होने पर प्याज महंगी होने से आंसू आ जाते हैं तथा अधिक उत्पादन होने पर प्याज सस्ती बिकती है- इसलिए आंसू आ जाते हैं।
खरीफ में प्राप्त प्याज का उत्पादन भण्डारण के लिए उपयुक्त नहीं होता है। भण्डारण के लिए केवल रबी और जायद में लिया गया प्याज का उत्पादन भण्डारण के लिए उपयुक्त होता है, जिसे 5 से 6 माह तक भंडारित किया जाता है। भंडारित प्याज को प्रायः जून से अक्टूबर तक बेंचा जाता है। इसके भण्डारण हेतु राष्ट्रीय प्याज- लहसुन अनुसंधान केन्द्र, राजगुरू नगर द्वारा ‘कण्डा चाव‘ विधि विकसित की गई हैैै, जिसे अपनाने पर भण्डारण में क्षति कम होती है तथा उसकी गुणवत्ता बनी रहती है।
प्याज की मुख्य फसल अपै्रल-मई मे आती है, जबकि इसकी जरूरत साल भर रहती है, अंतः प्याज के कंदों का लम्बे समय तक भण्डारण आवष्यक है। भण्डारण में प्रायः प्याज के कंदों का सड़ने, सिकुड़ने और अंकुरित होने से नुकसान होता है। भण्डारण के परीक्षणों के आधार पर परिणाम सामने आये हैं, जिन्हें अपनाकर सुरक्षित भण्डारण किया जा सकता हैः

  • भण्डारण के पहले कंदों को अच्छी तरह सुखा लें।
  • केवल अच्छी तरह से पके हुए, चमकदार, ठोस और स्वस्थ कंदों का भण्डारण करें।
  • भण्डारण नमी रहित, हवादार घर में करें।
  • भण्डारण में प्याज की परत की गहराई 15 से.मी. से ज्यादा न हों।
  • भण्डार गृह में कंदों को बांस की या अन्य प्रकार की टोकनी में भरकर टोकनी की तह लगा देनी चाहिए।
  •  जहां टोकनी उपलब्ध न हों, वहां प्याज की परतों के बीच सूखी घास की परत लगानी चाहिए।
  •  समय-समय पर प्याज के सड़े-गले कंद भंडार गृह से निकालते रहें।
  • जहां तक संभव हो, प्याज का शीत गृह में भण्डारण करना अच्छा होता है।
  • प्याज को इधर-उधर ले जाने में सावधानी बरतनी चाहिए।
  • आलू या अन्यय उत्पाद के साथ में प्याज का भण्डारण नहीं करना चाहिए।
  •  प्लास्टिक के बोरे में प्याज को भंडारित नहीं करना चाहिए।
  • षीतगृह में कंटेनर में कटी हुई प्याज रख सकते हैं।

प्याज के लिए भण्डारण संरचना बनाने में लगभग 6000 रूप्ये प्रति टन लागत आती है, जिसमें शासन द्वारा 25 प्रतिषत अनुदान दिया जाता है। इसमें अनुदान की पात्रता भण्डारण 5,10,15,20,25,50 टन की क्षमता में होने पर मिलती है।
राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान व विकास प्रतिष्ठान (छंजपवदंस भ्वतजपबनसजनतम त्मेमंतबी ंदक क्मअमसवचउमदज थ्वनदकंजपवद) द्वारा प्याज की किस्म एन.एच.आर.डी.एफ. रेड-4 से अन्य भण्डारण वाली किस्मों से अधिक उपज मिलती है। इस किस्म की यह विषेषता है कि इसमें ऊपरी छिलके अधिक होते हैं तथा इसका खेतों से भण्डार गृहों और मण्डी तक ले जाने में नुकसान कम होता है।
प्याज की कंदीय फसल लेने में लगभग 60 हजार रूप्ए प्रति हेक्टर लागत आती है, जबकि इसकी 250 से 300 क्ंिवटल तक प्रति हेक्टेयर उपज होती है। इसे 1200 रूप्ये प्रति क्विंटल की दर से बेंचने पर लगभग तीन लाख रूप्ये से अधिक कुल आमदनी होती है।
इसका उत्पादन सिंचाई या अच्छी वर्षा पर निर्भर होता है, इसलिए प्याज की खेती में विषेष रूप् स ेजल प्रबंधन या सिंचाई पर ध्यान देना चाहिए। प्याज की उपलब्धता निरंतर बनाये रखने के लिए इसके भण्डारण और विपणन की प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए। प्याज उत्पादकों को संगठित होकर भण्डारण और विपणन की व्यवस्था जुटाना जरूरी है।

  • डाॅ. भागचन्द्र जैन
    प्राध्यापक
  • कु. प्रियंका जैन
    एम.एस.-सी. (कृषि)
    कृषि महाविद्यालय, रायपुर 492012

अनाज दलहन तिलहन फल सब्जी से

खेती बने लाभ का धंधा

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

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‘ कृषिरेव महालक्ष्मीः।‘ अर्थात् कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिषत व्यक्ति खेती कर रहे हैं। भारत विकासषील देष है। भारत सबसे बड़ा चांवल निर्यातक देष है, जहां सबसे ज्यादा दूध और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 के अनुसार भारत की कृषि विकास दर पांच प्रतिषत रही है, जबकि आर्थिक विकास की दर 7.4 प्रतिषत रही है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान हर साल घटता जा रहा है। वास्तविकता यह है कि कृषि केवल जीवन का साधन बनकर रह गई है।
समय परिवर्तनषील है। कृषि का बाजारू दृष्टिकोण हो गया है, इसलिए बाजार की मांग के अनुरूप फसलों की खेती करनी होगी। नकदी और लाभकारी फसलों की खेती को बढ़ावा देना होगा। वैकल्पिक योजना बनाकर फसल-चक्र के अनुसार तरह-तरह की फसलों की खेती करनी होगी। भूमि और जलवायु के अनुसार फसलों की खेती करनी होगी। फसल विविधिकरण को अपनाना होगा, तब नियमित आमदनी प्राप्त होगी। ‘ कम लागत तकनीक‘ के उपयोग से खेती की लागत कम की जा सकती है तथा आमदनी बढ़ायी जा सकती है। अब ऐसा समय आ गया है कि किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता । किसानों, ग्रामीणों, विषेषकर युवकों में कृषि के प्रति कम रूचि दिखायी देने लगी है। कृषि में पूंजी निवेष घटने लगा है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (छंजपवदंस ेनतअमल वतहंदप्रंजपवद) के 59 वें सर्वेक्षण से ऐसी जानकारी मिली है कि भारत के 40 प्रतिषत किसान अब कोई और काम धंधा करना चाहते हैं। खेत बटते जा रहे हैं। कृषि जोत का आकार कम होता जा रहा है, जिसके कारण लगभग 80 प्रतिषत कृषक परिवार सीमांत और लघु कृषकों की श्रेणी में आ गये हैं।

कृषि ‘उत्तम खेती‘  को चरितार्थ करे।ं  कृषि लाभकारी व्यवसाय बने। इसके लिए भूमि, जल, बीज,उर्वरक, खाद, नियंत्रण  एवं कर्षण विधियों, मानव-पषु श्रम तथा यां़ित्रक ऊर्जा को ऐसा जुटाना होगा कि अपेक्षित कृषि विकास दर प्राप्त हो सके।  उन्नत    तकनीक से लाभकारी फसलों, प्रजातियों की खेती करने पर लाभकारी व्यवसाय कृषि को बनाया जा सकता है।

लागत लाभ विष्लेषण

लागत लाभ खिेती से जुड़ी सम्पत्ति की सूचि (प्दअमदजवतल) लागत और लाभ की गणना की जाती है, जिसमें निम्नांकित जानकारी शामिल की जाती हैःवष्लेषण

  • भूमि, मषीनों,पषुधन, भवन और प्रक्षेत्र के विभिन्न उत्पादों की जानकारी,
  • प्रक्षेत्र परिसम्पत्ति (।ेेमजे) की घिसावट की जानकारी,
  • प्रक्षेत्र के विभिन्न उत्पादों के विक्रय की जानकारी
  • प्रक्षेत्र में लाये गये आदानो ं(प्दचनजे) के खरीदने की जानकारी,

वर्तमान योजना और वैकल्पिक योजना में शुद्व लाभ(प्रति प्रक्षेत्र रूपयों में)

a1

a2वैकल्पिक प्रक्षेत्र योजना

किसान चाहते हैं कि कम से कम लागत में अधिक से अधिक उत्पादन व आमदनी उन्हें मिले, इस आधार पर वे प्रत्येक फसल और सहायक व्यवसाय को ध्यान में रखकर अपनाते हैं,  इनके आय-व्यय को ध्यान में रखते हैं, जैसे –

  • विभिन्न प्रकार की फसलों से वर्तमान में कितनी शुद्व आय प्राप्त होगी?
  • यदि प्राप्त होने वाली शुद्व आय कम नजर आती है तो वह किस प्रकार इस आय को बढ़ा सकते हैं? आमदनी बढ़ाने के लिए
  • वर्तमान प्रक्षेत्र योजना में सुधार किया जाता है और इसके स्थान पर वैकल्पिक योजना बनायी जाती है। वर्तमान योजना में
  • निम्न परिवर्तन कर वैकल्पिक योजना बनायी जाती है।
    (प) भूमि उपयोग की अच्छी विधियां अपनाना, जैसे – जल निकास आदि।
    (पप) लाभकारी फसल-चक्र अपनाना,
    (पपप)सिंचाई की प्रभावी सुविधायें अपनाना,
    (पअ)उर्वरकों की उपयोगिता बढ़ाना,
    (अ) पौध संरक्षण का आर्थिक दृष्टि से उपयोग करना,

वर्तमान योजना में सुधार के लिए एक या अधिक वैकल्पिक योजनायें बनायी जा सकतीं हैं, किन्तु इन योजनाओं मंे ये ऐसी योजना का चयन करना चाहिए, जिसमें अपेक्षाकृत लागत कम और शुद्व लाभ अधिक हो। वैकल्पिक प्रक्षेत्र योजना प्रक्षेत्र के साधनों के अनुरूप होनी चाहिए। रायपुर जिले के अभनपुर और तिल्दा विकास खण्ड के 28 नलकूपधारी कृषकों के सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि वर्तमान योजना और वेैकल्पिक योजना में भूमि का क्षेत्रफल बराबर होते हुये भी 5.90 हेक्टेयर क्षेत्र से 93000 रूप्ये का शुद्व लाभ प्राप्त हुआ है। वैकल्पिक योजना का मुख्य उददेष्य संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार अधिक लाभ देने वाली फसलों की ख्ेाती को बढ़ावा देना है। तालिका में दर्षायी गई वैकल्पिक योजना में वर्तमान योजना की अपेक्षा डेढ़ गुना से अधिक शुद्व लाभ मिला है। वर्तमान योजना में लागत लाभ अनुपात केवल 1.00ः0.87 था, जो कि वैकल्पिक प्रक्षेत्र योजना में 1.00ः1.39 हो गया ।

फसलों की लागत 

फसलोें की लागत के आंकलन के लिए श्रमिक, सामग्री, स्थिर लागत और कार्यषील पूंजी पर ब्याज की गणना की जाती है। भूमि की तैयारी, खाद-उर्वरक देने, बौआई करने या रोपा लगाने, अंतः कृषि, सिंचाई, पौध संरक्षण, कटाई,गहाई एवं उड़ावनी और परिवहन में परिवार के श्रमिकों की संख्या, किराये पर लगाये गये श्रमिकों की संख्या, पषु श्रम, मषीन, ऊर्जा की दर दर्षाकर श्रमिक लागत की गणना की जाती है, जबकि सामग्री लागत में बीज, गोबर की खाद, उर्वरक और पौध संरक्षण रसायनों की मात्रा और उनके भाव से कुल सामग्री की लागत निकाल ली जाती है। स्थिर लागत की गणना हेतु भूमि के किराये की अनुमानित राषि, भूमि का लगान और मूल्यांकन को शामिल किया जाता है, जबकि फसल की अवधि का कार्यषील पूंजी अर्थात् श्रमिक लागत और सामग्री की कुल लागत पर ब्याज लगाया जाता है।

कुल फसल लागत – श्रमिक लागत$ सामग्री लागत$स्थिर लागत$कार्यषील पूंजी पर ब्याज

फसल उत्पादन

विभिन्न फसलों का उत्पादन प्रायः क्विंटल में आंका जाता है। उत्पादन में मुख्य और सह उत्पाद होते हैं, जिनकी मात्रा का बाजार मूल्य से गुणा कर आमदनी निकाली जाती है।
फसल योजना (चार हेक्टेयर प्रक्षेत्र के लिए)
(1) फसलों के अंतर्गत रकवा 3.6 हेक्टेयर

                                             pp(2) प्रक्षेत्र अभिन्यास का क्षेत्र 0.4 हेक्टेयर

(3) फसल सघनता त्र फसलों के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल ग 100

शुद्व बोया गया क्षेत्रफल त्र
6.90
3.60 ग 100
त्र 191ः

(4) स्थिर लागत
(अ) मूल्य ह्यस

  • पषुओं पर 10 प्रतिषत(रूपये 90000 पर) त्र 9000 रूपये
  • यंत्रों पर 10 प्रतिषत(रूपये 75000 पर) त्र 7500 रूपये
  • मकान पर 2 प्रतिषत (रूपये 600000 पर) त्र12000 रूपये

(ब) भूमि का किराया त्र 30000 रूपये
(स) भूमि का लगान त्र 600 रूपये
………………………
योग- 59100 रूपये
……………………………

(5)  अनुमानित लागत और आमदनी   

क््रं     फसलेें       क्षेत्रफल(हेक्टेयर)      लागत आमदनी        शुद्व लाभ        लगत लाभ          अनुपात

(अ)   खरीफ

1.     धान            1-70               40723                  71473          30750      1-00%0-75

2.    उड़द            0-50                20604                 75816          55212       1-00%2-68

3.     मूंग            0-50                16359                 30490          14131       1-00%0-86

4.     मक्का         0-20               3155                    8065            5710         1-00%1-81

5      लोबिया        0-70              24845                   66483          41638       1-00%1-67

(ब)   रबी, जायद
1.    धान           2-00              48450                    87450         39000        1-00%0-80

2.    मूंग           1-00               27000                   57000         30000         1-00%1-11

3.    गेहूं             0-30              7500                     20250         12750         1-00%1-70

      योग            6-90               188636                 417827       229191       1-00%1-21

(6)कार्यषील पूंजी पर ब्याज (रूपये 417827 पर) त्र 20891 रूपये
(7) प्रक्षेत्र की कुल आय
(अ) फसलों से त्र 417827 रूपये
(ब) पषुधन से त्र 200000 रूपये
                                    योग त्र 617827 रूपये

(8) कुल लागत (अ) परिवर्तनषील लागत(188636$20891)
(ब) स्थिर लागत त्र 209597 रूपये

त्र 59100 रूपये
                                     योग त्र 268697रूपये
(9) शुद्व लाभ (617827-268697)
त्र 349130 रूपये
(10) लागत लाभ अनुपात . 00ः1.30

दांतों की देखभाल कैसे करें?

डाॅ. अरविन्द जैन
एम0डी0एस0 स्कालर,
जैन मल्टी स्पेषियलिटी डेन्टल क्लीनिक, त्क्।
काम्पलेक्स, न्यू राजेन्द्र नगर,
रायपुर-492006

Jennifer Yust

Jennifer Yust

दांत मुंह की शोभा बढ़ाते हैं। दांतों की सुन्दरता हंसी की शोभा बढ़ाती है। शरीर को स्वस्थ रखने में दांत मदद करते हैं। क्योंकि दांतों पर रोगांें का प्रकोप होने पर हमारा स्वास्थ्य प्रभावित होता है। अतः दांतों की उचित तरीकों से देखभाल करें क्या जानते हैं आप अपने दांतों के बारे में ?
(अ)  उद्गम के आधार पर –   उद्गम के आधार पर दांतों को दो भागों में बांटा जाता हैः

(ं।) प्राथमिक, अस्थाई या दूध के दांत –

1.ये वह दांत है, जो जन्म के बाद उगते हैं तथा 5-6 वर्षों तक रहते हैं|
2.इनकी संख्या 20 होती है।
3.ये बिलकुल सफेद होते हैं, इसी कारण इन्हें दूध के दांत कहा जाता है।

(2)  स्थाई दांत –

1.बाद दूध के दांतों का स्थान लेते हैं।
2.ये रंग में पुर्णतः सफेद नहीं होते हैं।
3.ठनकी संख्या 32 होती है।
4.ये चार प्रकार के होते हैं।

(ब)  संरचना के आधार पर – इसके आधार पर दांतों को दो भागों में बांटा जा सकता हैः  जड़ और मुकुट

1. जड़ – यह वह भाग होता है, जो जबड़े के अंदर तथा मसूड़ों में छुपा हुआ रहता है। यह संवेदनषील तथा दांतों का जीवित भाग होता है।
2.ण्मुकुट – वह भाग, जो हमें मुंह के अंदर दिखाई देता है। यह भाग ही दांतों के कार्याें तथा उसके प्रकार का निर्धारण करता है।
दांतों की भूमिका हमारे जीवन मेंः-

दांतों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य भोजन को चबाना होता है, इसके अभाव में एक स्वस्थ जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
मुंह को आकार देने में दांतों का सबसे बड़ा योगदान हैं।
दांत हमारे होठों को आधार प्रदान करते हैं, इसी आधार पर ही हम बोल पाते हैं।
ये भोजन को चबाते वक्त उसकी सीमा तथा दिषा का निर्धारण करते हैं।
सौदर्य बढ़ाने में दांतों को अनदेखा नहीं किया जा सकता ? सफेद, चमचमाते दांत प्रत्येक को अपनी ओर आकर्षित करते है।  शारीरिक  रक्षा तंत्र भी दांतों द्वारा प्रभावित होता है। दांतों से भोजन को चबाते वक्त होने वाली लार का स्त्रवण हमारे शरीर को हानि पहुंचाने  वाले सूक्ष्म जीवों को नष्ट करता है।

दांतों में होने वाली सड़न, बीमारियां और उनका उपचारः-

1. दांतों में लगने वाल कीड़े, सड़न और काले धब्बे:-  

1. दांतों की सतह पर होने वाली ये सड़न दांतों की सतह की कठोरता को नष्ट कर देती है। वहां काले धब्बे दिखाई देते हैं, जिनका वकत के साथ उपचार न करने पर पीड़ा देते हैं।
2. दांत के सड़े हुये भाग को निकालकर उसमें सीमंेट द्वारा स्थानांतरित कर दिया जाता है।, जो स्थाइ्र्र तथा सम्पूर्ण आयु के लिए होता है।
3. सड़न बढ़ जाने की स्थिति में दांतों को बाहर निकाल दिया जाता है।

(2)   टेढ़े-मेड़े दांतों की समस्या और उपचार:-

दांतों का टेढ़ा-मेड़ापन दूर करने के लिए उन्हें तार द्वारा कसकर व्यवस्ािित किया जा सकता है, जिसमें छैः माह से लकर एक वर्ष तक का समय लग जाता है।

(3)   गिरे हुये, झड़े हुये दांतों की समस्या और उपचार:-गिरे हुये या झड़े हुये दांतों को नकली दांतों द्वारा स्थानांतरित कर सकते हैं। ये दांत पूर्णतः असली दांतों की तरह दिखाई देते हैं तथा कार्य करते है। लगाये गये नकली दांत संख्या मं एक या एक से अधिक या सम्पूर्ण जबड़ा हो सकता है।
दांत निकलवाने/सर्जरी के बाद हमें यह करना चाहिए:-

1.निकाले हुये दांत पर डाक्टर द्वारा दी गई रूई को एक घंटे तक दबाकर रखें।
2. ठण्डे एवं नरम भोजन का सेवन करें।
3.डाॅक्टर की सलाह के अनुसार दवाई का प्रयोग करें।
4. दांत निकलवाले क बाद थोड़ा-थोड़ा खून निकलना सामान्य सी बात है, यदि 24 घण्टे में भी खून निकलना नहीं रूकता है तो तुरंत डाॅक्टर से सम्पर्क करें।
5.छांत निकलवाने के एक दिन बाद कुनकुने पानी में एक चम्मच नमक डालकर दिन में चार बार कुल्ला करें, जिससे घाव जल्दी सूखता है।
6. स्ूजन को रोकने के लिए गाल के ऊपर बर्फ को 20 मिनट तक रखकर सिकाई करें। इस प्रक्रिया को पहले 24 घंटे में हर घंटे करें।

दांत निकलवाने/सर्जरी के बाद हमें यह नहीं करना चाहियेः-

1. दो दिन तक गरम, तीखा, कठोर आहार का सेवन नहीं करना है।
2.बीड़ी, सिगरेट,तम्बाखु,गुटखा एवं षराब का सेवन न करें, इन पदार्थों के सेवन से घाव देर से सूखता है।
3. पहले दिन थूकना, कुल्ला करना एवं ज्यादा बात करना मना है।
4. घाव में जमंे हुये खून/थक्का से छेड़़छाड़ न करें, इससे खून निकलना बढ़ सकता है।
5. घाव की जगह अंगुली/जीभ का प्रयोग न करें।
6. स्ट्रा मंे पेय पदार्थों का सेवन न करें।
7. गर्म की सिकाइ्र्र या बाम इत्यादि न लगायें।

दातों की देखभाल :-

1.दांतों को खराब करने या उनमें होने वाली सड़न का सबसे महत्वपूर्ण कारक तम्बाखु, गुटका, सुपारी, पान आदि है।
2. दांतों को साफ रखने के लिए किये जाने वाले मंजन में ब्रुष व पेस्ट या बारीक पाउडर का उपयोग होना चाहिए।
3. उपयोग में आने वाला ब्रुष मध्यम कठोरता वाला हो।
4. ब्रुष को सदैव 45 डिगरी के कोण पर ही करना चाहिए, प्रतिदिन दो बार दांतों की सफाई की जाये।
5.4-5 बार साधारण कुल्ला किया जाना चाहिए।
6. भोजन के पष्चात या कुछ खाने के पष्चात ध्यान रहे कि उसका कुछ भाग दांतों की सतह पर चिपका न रह गया हो।
7. मीठे खाद्य पदार्थ के पष्चात कुछ साधारण पदार्थ अवष्य खायें अर्थात मीठे पदार्थ का सेवल सदैव बीच में करें।
8.दांतों में होने वाली किसी भी परेषानी के लिए शीघ्र दंत चिकित्सक से परापर्ष लें।

कुछ महत्वपूर्ण याद रखने योग्य तथ्य:-

1. दांतों की सफाई या मंजन करने के लिए गुड़ाखु, दातौन या मिटटी का उपयोग दांतों के साथ-साथ पेट के लिए भी हानिकारक है।
2. मुंह में प्राकृतिक दांतों को उखाड़ने का असर नेत्रों की रोषनी पर नहीं पड़ता है।
3.अगर आप नकली दांतों का उपयोग करते हैं तो उसे रात को सोते वक्त उतार कर रख देना चाहिए तथा मुंह की उस सतह का हल्का मसाज करना चाहिए, जहां दांत पहनते हैं।
4.नकली दांतों को साबुन या सर्फ से साफ करना चाहिए, उन पर पेस्ट या ब्रष का उपयोग नहीं करना चाहिए।
5. टेढ़े-मेड़े दांतों के इलाज के लिए उपयुक्त उम्र 13-14 वर्ष होती है
6. दांतों के द्वारा किसी व्यक्ति की उम्र का निर्धारण नहीं किया जा सकता है।
7. दांत को उखड़वाने से पूर्व जरूर भोजन करना चाहिए, खाली पेट दांत उखड़वाना हानिकारक होता है।
8. दांत उखड़वाने के पष्चात तरल व ठण्डे खाद्य पदार्थों का सेवन करना चााहिए।

दांतों की सुरक्षा के बेहतरीन नुस्खे:-

  •  दिन में कम से कम दो बार ब्रुष और पेस्ट से अपने दांतों की और जीभ की सफाई करें।
  •  कुछ भी खाने के बाद पानी से कुल्ला करें।
  •  संतुलित आहार लें।
  • मीठे और चिपकने वाले पदार्थों का सेवन कम करें।
  • पान, सुपारी तथा धूम्रपान से बचें।
  • नियमित जांच के लिए दांतों के डाॅक्टर से सम्पर्क करें।

अगर आप इनमें से किसी भी लक्षण से पीड़ित हैं, तो दंत चिकित्सक से सम्पर्क करें।

  • गर्म तथा ठण्डे पदार्थ या मिठाईयों के प्रति दांत का संवेंदनषील होना।
  • मसूड़े के किनारे या उसके नीचे सूजन या सूखापन होना।
  • दांत पर धब्बे पड़ना।
  • मुंह में असहनीय दर्द का होना।
  • मंुह का तीन अंगुलियों से कम खुलना।

       दांतों की सुरक्षा कीजिये

    आपके दांत

    जीवन की अंतिम घड़ी तक के लिए बने हैं……
    केवल आप ही अपने दांतों की सुरक्षा कर सकते हैं।

Major products produced in India by organic farming

Ecologically_grown_vegetables

Products

Commodity :   Tea, Coffee, Rice, Wheat

Spices         :   Cardamom, Black pepper, white pepper,  Ginger, Turmeric,Tarn rind,  Clove, Chili.

Pulses         :    Red gram, Black gram

Fruits          :    Mango, Banana, Pine apple, Sugarcane, Orange, Cashew nut.

Vegetable   :    Okra,  Brinjal,  Garlic, Onion, Tomato, Potato .

Oilseeds     :     Mustard, Sesame, Castor, Sunflower,

Others        :     Cotton,   Herbal extracts.

 

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India’s  Share in World Production & Export (2004)

m2

 

Leading Exports  of Agricultural Products (2004)

m3

Hindrances of Export Promotion

Poor Transport and Port Facilities

Adequately and timely availability of transport facilities in the form of railway wagons & shipping space is responsible.

Protectionist Policies of Other Countries

Many countries have imposed non-discriminatory protection policies like quotas, monopoly practices.

Opportunities not Exploited

International markets never remain stable but are subjected to Continual changes in tastes, fashions, technology.

Foreign Competition

In some of export commodities the competition from other suppliers is so great that Indian exporters final it difficult to sell a desired quantity.

Infra – Structural set-up for Export Promotion

Central Advisory Council on Trade

Advise the Government on matters relating to:

Export & import policy & programmes.

The operation of import & export controls.

Organisation and development of commercial services.

2. The Zonal Export-Import Advisory Committee

Problems faced by exporters such as :

Import licensing and clearance

drawback payment

pre-shipment inspection

export incentives

Port trust and shipping problems

 

Zonal Committee

New Delhi         Mumbai       Calcutta             Madras

3.Export- Promotion Councils

To undertake surveys of foreign markets.

publicity work to promote exports

information about opportunities for export through their bulletins.

to undertake research programmes to find out better and new uses of the commodities.

4.Commodity Boards.

Tean Board

Coffee Board

Cardamom Board

Rubber

Silk Board

Handicrafts Board

Handloom Board

 

5.The Development Councils

Inorganic Chemicals

internal combustion engines for power driven pumps.

instruments, bicycles

sugar

light electrical s

heavy electrical

drugs and pharmaceuticals

woolen textiles

art silk

machine tolls.

6.Directorate of Export Promotion

implementing Government Policies formulated.

7.The Trade Development Authority

8.Indian Institute of Foreign Trade

Training of personnel in modern techniques of international trade.

Organizing research

9.Indian Institute of Packaging

Research on raw materials

To organize consultancy services for industry.

10.Indian Council of Arbitration

Settlement of commercial disputes

administrative assistance in the conduct of arbitration cases.

11.Export Houses

The minimum export performance for the grant of Export House Certificate (E.H.C.) should be Rs. ————–crore.

12.The Export Inspection Council

Controlling all activities of compulsory quality control & pre-shipment

Inspection.

 

13.The Indian Standards Institution (ISI )

The standers formulated by ISI are made use of by various public & private sector organizations.

Some 600-700 standards are produced every year.

14.Export Processing Zones

Kandla

Santa Cruz Electronics

15.Appointment of Trade Representatives Abroad

For developing the exports of the Indian Goods, trade representative in almost all the important trading centers of the world.

 

 

 

छत्तीसगढ़ में हल्दी का विपणन

डाॅ भागचन्द्र जैन,
प्राध्यापक
कृषि महाविद्यालय, रायपुुर

haldi

सदियों से हल्दी का उपयोग धार्मिक, रीति रिवाजों में किया जाता हैः दाल हो या सब्जी या हो स्वादिष्ट पकवान, सभी में हल्दी का उपयोग किया जाता है।  यह एक मसाले वाली महत्वपूर्ण फसल है, जिसकी खेती बगीचों में भी अद्र्व छायादार स्थान में अंतवर्ती फसल के रूप में कर सकते हैं।

विष्व की 70 प्रतिषत हल्दी भारत में उत्पन्न होती हैं।  भारत में वर्ष 2011-12 में 6.30 लाख टन हल्दी का उत्पादन हुआ था तथा वर्ष 2012-13 में 33 प्रतिषत वृद्वि का अनुमान लगाया गया है।  भारत में हल्दी की खेती करने वाले प्रमुख राज्य आंध्रप्रदेष कर्नाटक, उड़ीसा तथा तमिलनाडू हैं।  आंध्रप्रदेष में व्यापक रकवा है, जहां 40 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में हल्दी की खेती की जाती है।  देष के कुल हल्दी उत्पादन का लगभग 54 प्रतिषत उत्पादन आंध्रप्रदेष में हेाता है।  देष का दूसरा सबसे बड़ा हल्दी उत्पादक प्रदेष उड़ीसा है, जहां लगभग 24,300 हेक्टेयर क्षेत्र में हल्दी की खेती की जाती है।  उपज की दृष्टि से कर्नाटक राज्य का प्रथम स्थान है, जहां सर्वाधिक उत्पादकता 1301 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त हुई है। ब्रिटेन, नीदरलैंड, जर्मनी, मलेषिया, श्रीलंका, अफ्रीका, स्पेन, सिंगापुर, सऊदी अरेबिया में हल्दी का निर्यात किया जाता है।

भारत से हल्दी का निर्यात

    वर्ष             निर्यात (टन)
2010            107924
2011              94093
2012              98707
2013              69550

हल्दी को उत्पन्न करना जितना महत्वपूर्ण  होता है, उतना ही महत्वपूर्ण इसका विक्रय होता है।  हल्दी की विपणन व्यवस्था निम्नलिखित बिंदुओं से जुड़ी हुई हैः

1. हल्दी उत्पादन:  हल्दी उत्पादन में वृद्वि के लिए उन्नत तकनीक अपनायी जायेः अधिक उत्पादन होने पर उसे प्रक्रिया इकाईयों तक सीधे पहुंचाया जा सकता है।  उत्पादन की मात्रा कम होने पर उसे घरेलू विधि द्वारा प्रसंस्करित किया जा सकता है।

साफ किये हुये कंदों को पानी में उबालें

मटका या तांबे की कड़ाही में उबालें

कड़ाही के ऊपरी भाग को पत्तियों से ढंक दें,

सफेद धुंआ के साथ गंध निकलने तक उबालें

मुलायम हल्दी

खुरदरे फर्ष पर हल्दी को बोरों की सहायता से रगड़ें ऊपर का छिलका निकल जायेंगा

10-12 दिन तक धूप में हल्दी सुखायें

पुनः सूखने पर उसे फर्ष पर रगड़कर सूखे छिलके को निकालें

कुछ हल्दी पीसगर, शेष हल्दी को रंगकर चमकायें

2. हल्दी भण्डारण

खुदाई के बाद हल्दी के मूल प्रकंदों को छाटें

मिटटी के फर्ष को खोदें

उसमें हल्दी के पत्ते, आदि भरें

बीज वाले मातृकंद को भरें

अंत मंे घास, पत्ते डालकर मिटटी से ढकें।

छत्तीसगढ़ में हल्दी की खेती की व्यापक संभावनाएं हैं।   जहां  उत्पादक अपना संध बनाकर सामूहिक रूप से हल्दी की विक्री कर सकते है।

  •  हल्दी उत्पादक क्षेत्रों में उत्पादन की मात्रा का पता लगाया जाये तथा उत्पादन की मात्रा अधिक होने पर ही जरूरत के अनुसार प्रसंस्करण इकाई लघु उद्योग के रूप् में खोली जायें।
  •  हल्दी भण्डारण हेतु उत्पादक क्षेत्रों में पंचायत स्तर पर व्यवस्था की जानी चाहिए।

विक्री हेतु माध्यम

(अ) घरेलू प्रसंस्करित हल्दी: यदि हल्दी  का प्रसंस्करण घर पर कर लिया जाता हेै तो उसे
निम्नलिखित माध्यमों द्वारा बैचा जा सकता हैः

1. उत्पादक – उपभेक्ता
2. उत्पादक – व्यापारी – उपभोक्ता

(ब) बिना प्रसंस्करण वाली हल्दीः अधिक उत्पादन होने पर उसे बिना प्रसंस्करण के सीधे प्रक्रिया
इकाईयों तक पहुंचाया जा सकता है।

1. उत्पादक – प्रसंस्करणकर्ता – व्यापारी – उपभोक्ता
2. उत्पादक – उत्पादक संघ – प्रसंस्करणकर्ता – व्यापारी – उपभोक्ता

कृषि में बढ़ती हुई लागत, समर्थन मूल्य से राहत

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‘कृषिरेव महालक्ष्मीः‘ अर्थात् कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है, भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिषत व्यक्ति खेती कर रहे हैं। भारत विकासषील देष है। यहां से विभिन्न देषों को वर्ष 2013-14 में 3792.2 करोड़ डालर का कृषि निर्यात किया गया है, जिसमें 774.2 करोड़ डालर का चावल निर्यात शामिल है। भारत सबसे बड़ा चांवल निर्यातक देष है, जहां सबसे ज्यादा दूध और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है। वर्ष 2013-14 में कृषि विकास की दर 4.6 प्रतिषत रही है, जबकि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 4.7 प्रतिषत रही है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान केवल 13.9 प्रतिषत रह गया है। भारत मंे वर्ष 2013-14 में खाद्यान्न के उत्पादन का अनुमान 26.3 करोड़ टन लगाया गया है, जबकि वर्ष 2012-13 में 25.53 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। कृषि केवल जीवन यापन का साधन बनकर रह गई है, प्रति व्यक्ति कुल आमदनी की दृष्टि से भारत का विष्व में 161 वां स्थान है। कृषि में नई-नई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है तथा बीज, उर्वरक, पौध संरक्षण सामग्री और श्रमिक व्यय दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। बौआई से लेकर कटाई-गहाई तक समय पर श्रमिक नहीं मिलते हैं। अन्य व्यवसायों से कृषि की तुलना करते हुये कृषि श्रमिक मजदूरी मांगते हैं। कृषि में समय पर आदानों की उपलब्धता न होना एक बड़ी समस्या है। स्वस्थ और गुणवक्तापूर्ण बीज महंगे होते जा रहे हैं। उर्वरकों के भाव भी बढ़ते जा रहे हैं। बढ़ती हुई महंगाई को देखते हुये आर्थिक दृष्टि से कृषि आदानों का उपयोग जरूरी है।
उर्वरक
1 जून 2012 से उर्वरकों के मूल्य में 11.1 प्रतिषत से लेकर 62 प्रतिषत तक वृद्वि की गई है। अपेै्रल 2010 के पहले डाई अमोनियम फाॅस्फेट (डी.ए.पी. ) की कीमत 9350 रूपये प्रति टन थी, जिसके मूल्य को अप्रैल 2010 में बढ़ाकर 18200 रूपये प्रति टन किया गया और वर्तमान में इसका मूल्य लगभग 32 प्रतिषत बढ़ कर 24000 रूप्ये प्रति टन हो गया है।
म्यूरेट आॅफ पोटाष (एम.ओ.पी.) का मूल्य अपै्रल 2010 के पहले 4455 रूपये प्रति टन था, जो कि अपै्रल 2010 से बढ़कर 12000 रूप्ये प्रति टन हो गया तथा वर्तमान में इसका मूल्य 41 प्रतिषत बढ़कर 17000 रूपये प्रति टन हो गया है। इसी प्र्रकार सिंगल सुपर फाॅस्फेट (एस.एस.पी.) का मूल्य 4800 रूप्ये प्रति टन से 62 प्रतिषत बढ़कर 7800 रूप्ये प्रति टन हो गया है, जबकि यूरिया के मूल्य में 11.1 प्रतिषत की वृद्वि हुई है, जिससे यूरिया का मूल्य 4830 रूप्ये से बढ़कर 5365 रूप्ये प्रति टन हो गया है।
50 किलो डी.ए.पी. को बोरी 1125 से 1223 रूप्ये में मिल रही है। एम.ओ.पी. की बोरी 910 रूपये में एस.एस.पी. की बोरी 263 रूपये से 363 रूपये में बिक रही है।
समर्थन मूल्य
समर्थन मूल्य की घोषणा शासन द्वारा प्रति वर्ष की जाती है, जिसमें अनाज, दलहन, तिलहन, कपास, जूट और तम्बाखू शामिल होती है। समर्थन मूल्य पर किसानों से कृषि उत्पाद खरीदकर उनके हितों की रक्षा की जाती है। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए आवष्यक वस्तुओं की पूर्ति सुनिष्चित की जाती है। समर्थन मूल्य प्रायः बाजार मूल्य से कम होता हेैं।
औद्योगिक उत्पादन की अपेक्षा कृषि में मूल्य का उतार-चढ़ाव अधिक होता है, जिसका प्रभाव उत्पादकों और उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ता है, इसका लाभ मध्यस्थ उठाते हैं। यदि कृषि उत्पादों के मूल्य अधिक बढ़ जाते हेैं तो कम आय वाले व्यक्ति ये उत्पाद खरीद नहीं पाते हैं।
कृषि में बढ़ती हुई लागत को समर्थन मूल्य से राहत मिली है। प्राथमिक कृषि सहकारी साख समितियों में उर्वरकों के लिए अग्रिम उठाओं योजना चलायी जा रही हैय जिसमें उर्वरकों के लिए ऋण के ब्याज में कुछ अवधि के लिए छूट दी जा रही है। कृषि में उपयोग किये जाने वाले आदानों को अब भूमि, किस्म, फसल अवधि के अनुसार उपयोग करना आवष्यक हो गया है, जिससे कम लागत में अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त हो और ‘उत्तम खेती मध्यम बंज‘ की उक्ति चरितार्थ हो सके।

 

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