समग्र कृषि विकास की राष्ट्रीय योजना-आत्मा

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‘कृषिरेव महालक्ष्मीः‘अर्थात कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थ्रव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिषत व्यक्ति खेती कर रहें हैं। भारत विकासषील देष है। भारत सबसे वड़ा चावल निर्यातक देष है। वर्ष 2013-14 में 3792ण्2 करोड़ डालर का कृषि निर्यात किया गया है, जिसमें 774.2 करोड़ डालर का चांवल निर्यात शामिल है। भारत में वर्ष 2013-14 में 26.3 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान लगाया गया है, जबकि वर्ष 2012-13 में 25.53 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। भारत में सबसे ज्यादा दूध और बागवानी फसलों का उत्पादन होता है। वर्ष 2012-13 में यहां 13.24 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ था। भारत में वर्ष 2013-14 में कृषि विकास की दर 4.6 प्रतिषत रही है। जबकि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 4.7 प्रतिषत रही है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटता जा रहा है। जो कि वर्तमान में घटकर 13.9 प्रतिषत रह गया है। कृषि केवल जीवन यापन का साधन बन कर रह गई है तथा प्रति व्यक्ति कुल आमदनी की दृष्टि से भारत का विष्व में 161 वां स्थान है।
समय परिवर्तनषील है। कृषि में नई-नई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। बीज, उर्वरक, पौध संरक्षण सामग्री और श्रमिक व्यय दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। बौआई से लेकर कटाई- गहाई तक उपयुक्त समय पर श्रमिक नहीं मिलते हैं तथा वे अन्य व्यवसायों से कृषि की तुलना करते हुये मजदूरी मांगते है। कृषि मेें समय पर आदानों की उपलब्धता न होना एक बड़ी समस्या है। कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा तरह -तरह की योजनाएं चलायीं जा रही हैं, जिनमें कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजंेसी अर्थात् । आत्मा ऐसी योजना है, जो देष के 639 जिलों में संचालित की जा रही है। आत्मा ऐसी केन्द्र प्रवर्तित योजना है, जिसे वर्ष 2014-15 से राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रौद्योगिकी मिषन के सब मिषन एस.एम.ए.ई. में समाहित किया गया है। इसे सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंषन प्रोग्राम्स फाॅर एक्सटेंषन रिफाम्र्स भी कहा जाता है।

योजना के उददेष्य
1. कृषि प्रसार में शासकीय विभागों के साथ-साथ विभिन्न अषासकीय संस्थाओं, गैर शासकीय संगठनों, कृषि उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाना।
2. कृषि और संबंधित विभागों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, कृषि अनुसंधान केन्द्रों में समन्वय स्थापित कर साथ-साथ कार्य करना तथा कृषि विकास की कार्य योजना तैयार करना।
3. समन्वित कृषि पद्वति (कृषि , उद्यानिकी, पषुपालन जैसे सहायक व्यवसायों को एक साथ अपनाना) अर्थात् कृषि पद्वति पर आधारित कृषि प्रसार सुनिष्चित करना।
4. कृषि विस्तार हेतु सामूहिक प्रयास करना। फसल या रूचि पर आधारित कृषकोें के समूह की उनकी जरूरत के अनुसार क्षमता विकसित करना।
5. अन्य विभागीय योजनाओं में विस्तार सम्बंधी प्रावधान न होने पर उसका एक्सटेंषन रिफाम्र्स योजना में समावेष करना।
6. महिला कृषकों को समूह के रूप् में संगठित करना और कृषि के क्षेत्र में उनकी क्षमता बढ़ाना।
7. किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और विस्तार कार्यकर्ताओं के बीच में बेहतर तालमेल स्थापित करना।
भारत में फसल उत्पादन (करोड़ टन)

 

योजना की विषेषताएं
– जमीनी स्तर से कार्य योजना तैयार करना तथा उसे प्रस्तुत करना।
– किसानों की जरूरत के अनुरूप् गतिविधियों का चयन करना तथा उन्हें क्रियान्वित करना।
– कार्य योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन में किसानों की भागीदारी बढ़ाना।
– कार्य प्रणाली में लचीलापन होना और निर्णय लेने की प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण करना।
– एकल खिड़की प्रणाली द्वारा कृषि विस्तार करना।
– कृषि विस्तार सेवाओं को टिकाऊ बनाने के लिए हितग्राहियों से 5 से 10 प्रतिषत
हिस्सा प्राप्त करना।
रणनीति
इसमें राज्य, जिला, विकास खण्ड और ग्राम स्तर पर विभिन्न विस्तार गतिविधियों का क्रियान्वयन किया जाता हैः
राज्य प्रकोष्ठ
यह कृषि विभाग के अधीनस्थ कार्य करता है। इस प्रकोष्ठ विभिन्न जिलों से वार्षिक कार्य योजना प्राप्त करता है, उसमें राज्य कृषक सलाहकार समिति के सुझाओं को शामिल करता है, फिर राज्य कृषि विस्तार कार्य योजना तैयार की जाती है। इस कार्य योजना को प्रदेष की अंर्त-विभागीय कार्यकारी समूह ओर भारत सरकार से अनुमोदन कराया जाता है। इसके बाद कार्य योजना को क्रियान्वयन एजेंसी को अवगत कराया जाता है। इसमें केन्द्र और राज्य सरकारों से राषि प्राप्त कर एजंेसी आत्मा को आबंटित की जाती है तथा योजना के क्रियान्वयन का अनुश्रवण और मूल्यांकन किया जाता है।
राज्य कृषि प्रषिक्षण संस्थान
यह संस्था कृषि विस्तार से जुड़े शासकीय, निजी, गैर शासकीय संगठनों की प्रषिक्षण आवष्यकताओं का आंकलन करती है तथा प्रषिक्षण की वार्षिक कार्य योजना तैयार करती है, जिसके अनुसार राषि प्राप्त कर विभिन्न वर्गों के लिए प्रषिक्षण आयेजित करती है। इसके अलावा परियोजना तैयार करने, परीक्षण, क्रियान्वयन एवं अनुश्रवण करने के लिए आवष्यक मार्गदर्षन दिया जाता है। यह संस्था कृषि विस्तार को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रबंधन तरीकों के विकास एवं उनके उपयोग को बढ़ावा देती है।
कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजंेसी
आत्मा जिला स्तरीय संस्था है, जो किसानों तक कृषि विस्तार सेवाओं को पहुंचाती है। इसमें सक्रिय योगदान देने वाले व्यक्ति सदस्य होते हैं। भारत सरकार और राज्य सरकार से सीधे आत्मा को बजट मिलता है। इसके अलावा सदस्यों से सदस्यता शुल्क और लाभान्वितों से कृषक अंष की राषि प्राप्त होती है। कृषि एवं कृषि संबंधी तकनीक के व्यापक प्रचार-प्रसार की जवाबदारी आत्मा की होती है। इसमें जिले के उप संचालक कृषि को परियोजना निदेषक और कृषि विज्ञान केन्द्र के कार्यक्रम समन्वयक को उप परियोजना निदेषक नामांकित किये जाते हैं।
गवर्निंग बोर्ड
यह बोर्ड जिला स्तर पर आत्मा की नीति तैयार करती है, प्रषासकीय एवं वित्तिय स्वीकृति देती है, क्रियान्वयन की समीक्षा करती है। गवर्निंग बोर्ड के अध्यक्ष कलेक्टर और सचिव परियोजना निदेषक होते हैं।
प्रबंधन समिति
यह आत्मा की कार्य योजना बनाती है तथा गतिविधियों के क्रियान्वयन करती है, जिसमें आत्मा द्वारा जिले के कृषि एवं संबंधित विभागों जैसे-उद्यानिकी, पषुधन, मत्स्य, रेषम पालन, विपणन, कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि अनुसंधान केन्द्र, लीड बेैंक, गैर शासकीय संगठनों और कृषि से जुड़े विभिन्न संगठनों से सम्पर्क किया जाता है तथा इनमें समन्वय स्थापित किया जाता है। इस समिति में जिले में कार्यरत इन विभागों के वरिष्ठ अधिकारी सक्रिय सदस्य होते हैं। यह समिति प्रति माह बैठक का आयोजन करती है तथा प्रगति की समीक्षा करती है। प्रबंधन समिति द्वारा प्रगति प्रतिवेदन तैयार कर राज्य प्रकोष्ठ को भेजा जाता है।
जिला कृषक सलाहकार समिति
इसमें अधिकतम 25 सदस्य होते हैं। यह समिति किसानों की ओर से कार्य योजना बनाने और इसके क्रियान्वयन हेतु फीड बैक तथा आवष्यक सलाह गवर्निंग बोर्ड और प्रबंधन समिति को देती है। इसमें सभी वर्ग के प्रगतिषील, पुरस्कृत कृषक सदस्य होते हैं, जो कि विभिन्न विकास खण्डों की कृषक सलाहकार समिति से नामांकित होते हैं। इस समिति की बैठक प्रत्येक तीन माह मंे प्रायः प्रबंधन समिति की बैठक के पहले आयोजित की जाती ै।
विकास खण्ड तकनीकी दल (ठसवबा ज्मबीदवसवहल ज्मंउ)
यह विकास खण्ड स्तर पर कृषि एवं संबंधित विभागों के अधिकारियों का दल होता है, जिसके द्वारा आत्मा की विभिन्न गतिविधियों की वार्षिक कार्य योजना बनाकर जिले की आत्मा को उपलब्ध कराती है तथा उसका विकास खण्ड में क्रियान्वयन करती है। इस तकनीकी दल को सहयोग के लिए विकास खण्ड तकनीकी प्रबंधक और सहायक तकनीकी प्रबंधक कार्यरत होते हैं, जो विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित कर गतिविधियों का क्रियान्वयन कराते हैं।
विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति
इसमें संबंधित विकास खण्ड के प्रगतिषील/पुरस्कृत कृषक, अभिरूचि समूहों/ कृषक संगठनों के प्रतिनिधि सदस्य होते हैं। इसमें सदस्यों की संख्या 20 से 25 तक होती हैं। इस समिति की बैठक प्रत्येक दो माह में होती है, जिसमें विकास खण्ड तकनीकी दल को किसानों की ओर से फीड बैक और सलाह दी जाती है।
कृषक मित्र
प्रत्येक दो गांवों के बीच में एक कृषक मित्र नामांकित किया जाता है । कृषक मित्र प्रगतिषील कृषक होते हैं, जो कृषि प्रसार तंत्र और किसानों के बीच में महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं। कृषक मित्र विभागीय योजनाओं, जानकारी को किसानों तक पहुंचाते हैं तथा किसानों की समस्योओं के सम्बंध में किसान काल सेंटर से सुझाव लेते हैं। प्रत्येक कृषक मित्र को रूप्ये 6000/- प्रति वर्ष मानदेय दिया जाता है।

खाद्य सुरक्षा समूह ( कृषक अभिरूचि समूह, कमोडिटी अभिरूचि समूह)
ये समूह अपने सदस्यों के बीच में कृषि तकनीक के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समूहों के सदस्यों को प्रषिक्षण, शैक्षणिक भ्रमण, प्रदर्षन, कार्य कुषलता वृद्वि और चक्रीय निधि (त्मअवसअपदह थ्नदक) देकर सषक्त बनाया जाता है।

प्रक्षेत्र विद्यालय
प्रगतिषील किसानों के माध्यम से अन्य किसानों तक कृषि तकनीक के प्रचार-प्रसार में प्रक्षेत्र विद्यालय अच्छे माध्यम है।
कृषि उद्यमी गांवों में कृषि उद्यमी गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान सामग्री एवं तकनीकी सलाह किसानों को उपलब्ध कराकर मदद करते हैं।

अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना
जिल के चहुमुखी विकास के लिए कृषि की पंचवर्षीय योजना तैयार करना
आत्मा का पहला कार्य है, इस योजना का कृषकों, ग्रामीणों की भागीदारी से बनाया जाता है। इस योजना में वर्तमान कृषि पद्वति की सूचनाओं का विष्लेषण, अनुसंधान और विस्तार का अंतराल तथा समय के अनुरूप कृषि पद्वति में परिवर्तन आदि शामिल होता है, जिसमें अनुसंधान एवं विस्तार की प्राथमिकतायें निर्धारित की जाती हैं। यह योजना जिले के कृषि विकास की आधार स्तम्भ होती है। इसमें कृषि अनुसंधान एवं विस्तार सम्बंधी जरूरतों की पूर्ति हेतु प्राथमिकता के अनुसार प्रत्येक वर्ष जिला वार्षिक कार्य योजना (क्पेजतपबज ।ददनंस ।बजपवद च्संद)बनाकर गतिविधियों का क्रियान्वयन किया जाता है। पांच वर्ष बाद इस कार्य योजना की समीक्षा की जाती है तथा शेष बचे हुये कार्योंे को शामिल कर आवष्यकतानुसार पुनः पंचवर्षीय कार्य योजना बनायी जाती है।
मुख्य गतिविधियां
कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी द्वारा कृषक उन्मुखी, तकनीकी विस्तार, कृषक
सम्पर्क और नवोन्मेषी गतिविधियों का संचालन किया जाता हैः

कृषक उन्मुखी
कृषक उन्मुखी गतिविधियों में अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना बनाना, कृषक समूह बनाना, महिला समूह बनाना, खाद्य सुरक्षा समूह बनाना, कृषक समूहों का प्रषिक्षण देना, प्रदर्षन डालना, शैक्षणिक भ्रमण और प्रक्षेत्र विद्यालय आदि शामिल हैं। इसके अलावा कृषकों की क्षमता बढ़ाने और तकनीकी के प्रचार-प्रसार में कृषकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता है। इसमें किसानों, कृषक समूहों, वैज्ञानिकों, विस्तार में लगे हुये अधिकारियों, कर्मचारियों और उत्कृष्ट आत्मा को पुरस्कृत किया जाता है।

कृषि तकनीकी के प्रचार
कृषि तकनीकी के प्रचार -प्रसार हेतु किसान मेला,कृषि प्रदर्षनि का आयोजन किया जाता है तथा किसानोपयोगी साहित्य प्रकाषित किया जाता है। सफलता की कहानी पर केंद्रित वीडियो फिल्में भी बनायी जाती है।

अनुसंधान-विस्तार कृषक सम्पर्क
कृषि अनुसंधान और विस्तार गतिविधियों से सम्पर्क स्थापित करने के लिए कृषकों और वैज्ञानिकों के बीच में परिचर्चा आयोजित की जाती है। कृषक गोष्ठी, प्रक्षेत्र भ्रमण और स्थानीय जरूरतों पर अनुसंधान किया जाता है।

नवोन्मेषी
इसमें गांवों, ग्राम पंचायतों में सूचना पटल लगाये जाते हैं। कम्युनिटी रेडियो स्टेषन स्थापित किये जाते हैं। मोबाइल – इंटरनेट, पाइको प्रोजेक्टर और कला जत्था द्वारा कृषि तकनीक का प्रचार-प्रसार किया जाता है।

वित्तीय प्रावधान
आत्मा योजना के वित्तीय प्रावधानों का लाभ सभी वर्गके किसानों को मिलता है
किन्तु लद्यु-सीमांत और महिला कृषकों को लाभ हेतु प्राथमिकता दी जाती है।
1. कृषक प्रषिक्षण
अ. अंतर्राज्यीय – प्रति कृषक प्रतिदिन रूपये 1250 की दर से औसत 50 मानव दिवस
प्रति विकास खण्ड ।
ब. राज्य के अंदर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूपये 1000 की दर से औसत 1000 मानव
दिवस प्रति विकास खण्ड।
स. जिले के अन्दर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 400 या 250 रूप्ये की दर से औसत
1000 मानव दिवस प्रति विकास खण्ड।
2. प्रदर्षन
अ. कृषि – प्रति प्रदर्षन 0.40 हेक्टेयर क्षेत्र हेतु रूप्ये 3000/- धान, गेंहूं,दलहन -तिलहन एवं मक्का हेतु रूप्ये 2000 की दर से औसत 125 प्रदर्षन प्रति विकास खण्ड ।
ब. उद्यानिकी, प्षुपालन, मत्स्य पालन,रेषम पालन-प्रति प्रदर्षन रूप्ये 4000 की दर से औसत 50 प्रदर्षन प्रति विकास खण्ड।
3. शैक्षणिक भ्रमण
अ. अंतर्राज्यीय – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 800 की दर से औसत 5 कृषक प्रति
विकास खण्ड।
ब. राज्य के अंदर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 400 की दर से औसत 25 कृषक प्रति
विकास खण्ड।
4. क्षमता विकास एवं कौषल उन्नयन
कृषक समूहों की क्षमता विकास हेतु रूप्ये 5000 प्रति समूह प्रति वर्ष
तथा अधिकतम लक्ष्य 20 समूह प्रति विकास खण्ड प्रति वर्ष।

कृषक प्रषिक्षण, प्रदर्षन, शैक्षणिक भ्रमण और क्षमता विकास के लिए आयोजन हेतु सामान्य कृषकों से 10 प्रतिषत तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति और महिला कृषकों से 5 प्रतिषत कृषक अंष लिया जाता है। इन कार्यक्रमों में न्यूनतम 30 प्रतिषत महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य है।

5. खाद्य सुरक्षा समूह
इसमें प्रति विकास खण्ड न्यूनतम दो खाद्य सुूरक्षा समूह प्रति वर्ष गठित करने का प्रावधान है, जिसके लिए प्रति समूह रूप्ये 10000 निर्धारित हैं।
6. कृषक पुरस्कार
कृषि, उद्यानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कृषकों को प्रति वर्ष पुरस्कृत किया जाता हैः
अ. राज्य स्तर पर – 10 उत्कृष्ट कृषकों को, 50 हजार रूप्ये प्रति कृषक का
पुरस्कार।
ब. जिला स्तर पर – 10 उत्कृष्ट कृषकों को, 25 हजार रूप्ये प्रति कृषक का
पुरस्कार।
स. विकास खण्ड स्तर पर – 5 उत्कृष्ट कृषकों को, 10 हजार रूप्ये प्रति कृषक
का पुरस्कार ।
7. कृषक समूह पुरस्कार
कृषि, उद्यानिकी, प्षुपालन, मत्स्य पालन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कृषक समूहों को जिला स्तर पर पुरस्कृत करने का प्रावधान है, जिसमें प्रति वर्ष पांच कृषक समूहों को 20 हजार रूप्ये प्रति समूह की दर से पुरस्कृत किया जाता है। इसमें प्रत्येक जिले से प्रति वर्ष पांच कृषक समूह पुरस्कृत किये जाते हैं।
8. फार्म स्कूल
क्षेत्र विषेष में पारंगत विषेषज्ञ कृषक द्वारा अपने क्षेत्र के 25 प्रषिक्षणर्थी कृषकों तक तकनीकी हस्तांतरण का प्रावधान है। फार्म स्कूल के लिए हर स्कूल को रूप्ये 29414 दिये जाते हैं।
9. कृषक – वैज्ञानिक परिचर्चा
प्रगतिषील या जिला कृषक सलाहकार समिति और विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति के सदस्यों के लिए वैज्ञानिक परिचर्चा आयोजित की जाती है, जिसमें उन्नत कृषि तकनीक की जानकारी दी जाती है तथा रणनीति बनायी जाती है। यह परिचर्चा प्रत्येक जिले में खरीफ और रबी के पहले आयोजित की जाती है, जिनकी खरीफ और रबी में एक-एक संख्या होती है।
10. किसान गोष्ठी/प्रक्षेत्र दिवस
आत्मा द्वारा प्रति वर्ष प्रत्येक जिले में खरीफ और रबी में किसान गोष्ठी, प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया जाता है।
11. विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति की बैठक
इस समिति की बैठक प्रत्येक दो माह के अंतराल में विकास खण्ड में आयोजित की जाती हेै, जिसमें कृषि और सम्बंधित विभागों के अधिकारी भाग लेते हैं। वर्ष में इन बैठकों की संख्या छै होती है।
12. जिला कृषक सलाहकार समिति की बैठक
इस समिति की बैठक वर्ष में चार बार होती है।
13. कृषक मित्र
प्रत्येक दो गांव के बीच में एक कृषक मित्र बनाया जाता है, जिसका चयन ग्राम सभा द्वारा किया जाता है। कृषक मित्र को प्रति वर्ष 6000 रूप्ये देने का प्रावधान है।

हे किसान ! देष की शान

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हे किसान ! देष की शान।
खेती में तुम समर्पित,
तुम्हारा सारा जीवन दान।
तुम्हारी कड़ी मेहनत का
भू कण-कण करे बखान।
तुमसे उज्जवलित हो रहा,
खेत और खलिहान।
हे किसान ! देष की शान।
तुम तो भूमि पुत्र हो,
है तुम्हारी महिमा महान्।
ताप-षीत का तुम्हें भय नहीं,
तुमसे तो प्रकृति डरती है।
अपार परिश्रम से तुम्हारे
देती अन्न धरती है।
हे किसान ! देष की शान।
परहित में तुम कर रहे
अपने तन का दान।
गूंज रही है चहुंदिषि
बस एक ही आवाज।
कृषि से ही होगी प्रगति
और खुषहाली आज।
हे किसान ! देष की शान।
खेती है तुम्हारी सहेली,
फसलों में तुम्हारी जान् ।
तुम्हारी तपस्या से होगी,
खाद्य् समस्या समाधान््।
हे जन जीवन दाता किसान।
समृद्वि रहे तुझे वरदान।

आदि पुरूष आदिवासी

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धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरक, वन के वासी।
वनों के अंचल में बिखरे हैं भारत के गांव।
जहां ये त्यागी – वीर, कोसों चलते नंगे पांव।
बैगा, गांेड़, कोल, कोरकू इनका परिचय परिभाषी।
भीषण गर्मी-षीत के तपस्वी – ये आदिवासी।

जहां वन हैं – वहां इनकी जन्मभूमि हैं।
वनोपज देन जिनकी, व नही कर्मभूमि है।
करते हैं कड़ी मेहनत, कम कीमत पाते हैं।
खुद भूखे रहकर, दूसरों को खिलाते हैं।
ईमानदार भोले-भाले, ये सचमुच सन्यासी।
तन-मन के धनी हैं, ये आदिवासी।

अन्याय से मुक्ति हेतु इनका जीवन छटपटाता था।
शोषण से जिनका दिल कुछ घबड़ाता था।
तेंदूपत्ता, चिरौंजी, शहद से जुड़ा जब सहकार।
तब वनवासी विकास के खुज गये सब द्वार।
कर्तव्यों से बदल जायेगी, इनकी भाग्य राषि ।
क्रान्ति के अग्रदूत बनेंगे, ये वीर आदिवासी।

ये वन मार्गों के निर्माता, वन के प्रहरी हैं।
प्रकृति जिनकी सहेली, गाथा उनकी गहरी है।
स्वावलम्बी हैं सदियों से, ये प्रगति के अभिलाषी।
अग्रणीय रहे हैं सदैव, साहित्य कहता इतिहासी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरकक, वन के वासी।
धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।

मेरा छत्तीसगढ़

 

 

 

 

 

 

 

 

ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।
सुन्दर है, छोटा है, प्यारा है, मेरा छत्तीसगढ़ महान।
यहां से फैली विष्व में सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान।
धान का यह कटोरा, है पूरे भारत की शान।

जहां राजा मोरध्वज, वाणासुर ने शासन चलाये थे।
वहां माता शबरी की कुटिया में, राम ने बेर खाये थे।
मेरा छत्तीसगढ़ सचमुच प्राकृतिक संसाधनों की खान।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

जहां जीवनदायिनी महानदी, अरपा, इंद्रावती, षिवनाथ।
वहां की अमीर धरती पर सब मिलकर रहते साथ।
जहां तक देखो । बस वहां दिखती है धान ही धान।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

27 जिले, एक दर्जन विष्वविद्यालय, यहां लघु भारत भिलाई।
कोरबा, बैलाडीला यहां है, कर रहे उद्योगों की भरपायी।
छत्तीसगढ़ की माटी के कण-कण में है भगवान।
र्ऋिष मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज

डाॅ. भागचन्द्र जैन

प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र), प्रचार अधिकारी,
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय रायपुर दृ 492012 ;छत्तीसगढ़)

 

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत की आत्मा गांवों में बसती है।‘ गांवों की प्रगति से सबकी प्रगति जुड़ी है। भारत गांवों का देष है, जहां पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण है। बापू ने कल्पना की थी कि ग्राम राज से स्वराज का सपना साकार हो। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत गांवों में रहता है, नगरों में नहीं। यदि मुझे गांवों को निर्धनता से मुक्त करनें में सहायता मिल जाये तो मैं समझूंगा कि मैंने सारे भारत के लिए स्वराज प्राप्त कर लिया है। यदि गांव नष्ट होता है तो भारत भी नष्ट हो जायेगा।‘ गांधी जी ऐसे पहले दार्षनिक थे, जिन्होंने ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर विषेष बल दिया, उनके राजनैतिक जीवन और अहिंसात्मक दर्षन की ग्रामीण विकास ही आधार-षिला थी। उन्होंने अपने प्रारम्भिक जीवन से जीवन से ही ऐसे रचनात्मक कार्यों को अपनाया, जिनका सीधा सम्बन्ध जीवन को सरस, सम्पूर्ण तथा सुखी बनाना था। उनका कहना था कि भारत की आत्मा गांव है-इसलिए यदि गांव-गांव में नव जीवन और आषा का संवार नहीं होता, तो स्वराज बेकार है। रचनात्मक कार्यक्रम में निम्नांकित क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई थीः

  1. साम्प्रदायिक एकता
  2. अस्पृष्यता निवारण
  3. मद्य निषेध
  4. खादी का प्रचार
  5. ग्रामीण उद्योगों का विकास
    (क) गुड़ बनाना
    (क) तेल निकालना
    (क) धान कूटना
    (क) बुनाई
    (क) नीम का तेल निकालना
  6. पषुधन विकास
  7. बुनियादी षिक्षा
  8. प्रौढ़ षिक्षा
  9. ग्रामीण स्वच्छता
  10. महिला विकास
  11. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग उत्थान
  12. नीय साधनों से क्षेत्रीय विकास
  13. हिन्दी को बढ़ावा
  14. कृषक, श्रमिक तथा विद्यार्थियों के संगठन
  15. प्राकृतिक चिकित्सा
  16. आर्थिक विषमता दूर करना
  17. स्वावलम्बी गांवों का निर्माण
  18. श्रम में निष्ठा

इस प्रकार के व्यापक कार्यक्रम में गांवों के पुर्ननिर्माण और सर्वांगीण विकास की छटा दिखायी देती थी। गांधी जी एक नये समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसमें विषमता न हो और जो शोषणमुक्त हो । ऐसा समाज तब बनेगा, जबकि गांवों की समस्याओं का निराकरण किया जाये। गांधी जी ने गांवों की समस्याओं का निराकरण भी किया, क्योंकि वे केवल आदर्षवाद में विष्वास नहीं करते थे, वे एक व्यावहारिक महा पुरूष थें। उन्होंने सेवाग्राम आश्रम द्वारा निकटवर्ती क्षेत्रों में यह कार्यक्रम लागू किया, जिसके कुछ ही दिनों में सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे।
महात्मा गांधी मानते थें कि अच्छा स्वास्थ्य समाज, परिवार और व्यक्ति तीनों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। देष की वास्तविक सम्पत्ति वहां के निवासियों का अच्छा स्वास्थ्य है। उन्होंने लिखा है कि ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के पष्चात् सबसे पहला कार्य देष में यह होगा कि प्रत्येक व्यक्ति को ठीक से रोटी तथा कपड़ा मिल सके।‘स्वस्थ और सुखी जीवन की यह प्राथमिक आवष्यकता है, परन्तु स्वस्थ जीवन के लिए वातावरण की स्वच्छता के महत्व को पीछे नही रखा जा सकता।ं देष में होने वाली बहुत कुछ बीमारियां गावों को साफ-सुथरा बनाकर सरलतापूर्वक कम की जा सकती है।
गांधी जी के सपनों का पंचायती राज
पंचायत य पंचायती राज का उददेष्य केवल अधिकार से व्यवस्था और प्रषासन चलाना नहीं है, वरन् व्यक्तियों को सामुदायिक विकास के लिए निरंतर चलने वाले कार्याें के विकास में लगाना है। महात्मा गांधी मानते थे कि आरम्भ में लोंगों को यह अनुभव होना चाहिए कि व्यक्तियों के हित में पंचायत कार्य कर रही है। ऐसी स्थिति मंे यदि अधिकारों का यथायोग्य ध्यान रख कर उपयोग होगा तो उससे क्षति नहीं होगी, वरन् गांव के स्वायत्त प्रषासन की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
पंचायत को अपनी प्रतिष्ठा स्थिर करने के लिए यह आवष्यक है कि वह उन कार्यों को प्राथमिकता दे, जिनका लोगों के जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध हो। इसमें गांव के व्यक्ति भी सहयेाग देंगे और धीरे-धीरे ऐसी ही अन्य जिम्मेदारियांे को बहन करने में वे सक्षम होगे। पंचायत का कार्य-क्षेत्र बढ़ता जायेगा और अन्त में यह सिद्व हो जायेगा कि पंचायते ऐसे कार्यों की जिम्मेदारी निभाने में उच्च स्तर की संस्थाओं से अच्छी हैं।
वैधानिक स्वरूप
पंचायत कानूनी अधिकार युक्त संस्था होनी चाहिए, साथ ही कानून ऐसा हो, जो समझने तथा समझाने मंे स्पष्ट हो, सरल हो।

सामान्यतया प्रत्येक उपयोगी कार्य के लिए कानून होना चाहिए, किन्तु यह कानून जटिल न हो।

  • पंचायत का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें स्वस्थ और उच्च-परम्पराओं का विकास हो।
  • इसमें लोकतांत्रिक कार्य प्रणाली उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितनी कि व्यवहारिक कार्य-विधि महत्वपूर्ण है।
  • अधिक महत्व के निर्णयों के लिए अधिक से अधिक व्यक्तियों की अनुमति लेनी चाहिए।
  • बहुमत के आधार पर महत्व के निर्णयों को मान लेने से पंचायत की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी, प्रतिष्ठा उससे बढ़ती है जहां समुदाय के सभी व्यक्ति एकमत हों।
  • यदि किसी कार्य को करने के लिए सभी व्यक्ति एकमत होते हैं तो वे सब मिलकर उसे पूरा करने का प्रयास करेंगे, जिससे सच्चे लोकतन्त्र की जड़ें मजबूत हांेगी।

आजादी के पहले पंचायतें
अंग्रेजों के शासन काल में शासक चाल्र्स मेटकाल्फ ने पंचायतों की सराहना करते हुये उन्हें ‘लद्यु गणराज्य‘ की संज्ञा दी, किन्तु बाद में बड़े-बड़े व्यक्तियों ने निर्माण और विकास कार्यों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। राॅयल आयोग ने वर्ष 1909 में अपने प्रतिवेदन में अनुषंसा की कि विकेंद्रीकरण के लिए ग्राम पंचायतों के माध्यम से व्यक्तियों को जोड़ा जाये। इसके बाद विभिन्न राज्यों द्वारा समय-समय पर पंचायत अधिनियम पारित किए गए, जिनमें ‘बंगाल ग्राम स्वषासन अधिनियम (1919), मद्रास-बाम्बे एवं सयुक्त प्रांत ग्राम पंचायत अधिनियम (1920), बिहार एवं उड़ीसा ग्राम प्रषासन अधिनियम, असम ग्राम स्वषासन अधिनियम (1926), पंजाब ग्राम पंचायत अधिनियम (1935), आदि प्रमुख हैं, ये अधिनियम ग्राम मुददों एवं ग्राम विकास की देखरेख पर आधारित थे। स्थानीय स्वषासन को गांव के छोटे मामलों के निपटानें का अधिकार था, किन्तु ये निकाय लोकतात्रिक नहीं थे, इनके वित्तीय संसाधन सीमित थे, ऐसी स्थिति वर्ष 1950 तक ज्यों की त्यों बनी रही।
आजादी के बाद पंचायतें
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस बात पर जोर दिया था कि स्वतंत्रता की शुरूआत सर्वप्रथम निम्न स्तर से होनी चाहिए, जिसमें प्रत्येक ग्राम एक पंचायत वाला गणराज्य (ग्राम स्वराज) होना चाहिए, इसमें पंचायत को सभी शक्तियां प्राप्त हों। जनता की भागीदारी सुनिष्चित करने के लिए वर्ष 1952 मं सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, किन्तु इस कार्यक्रम का लाभ ग्रामीण निर्धनों तक नहीं पहुंच पाया। इसकी वस्तु स्थिति की समीक्षा के लिए वर्ष 1957 में बलवंतराय मेहता समिति का गठन किया गया, जिसमें निर्वाचित स्थानीय निकायों की स्थापना और पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था की अनुषंसा की । वर्ष 1977 में राष्ट्रीय स्तर पर अषोक मेहता समिति का गठन किया गया, इस समिति का मानना था कि ग्रामीण भारत सभी विकासोन्मुखी कार्यक्रमों का आधार है। पंचायती राज की समीक्षा हेतु जी.वी.के. राव समिति, एल.एम. सिंघवी समिति, सरकारियां आयोग का गठन किया गया। वर्ष 1989 में भारत सरकार ने संविधान के भाग प्ग् में पंचायतों को शामिल करने के लिए 64 वां संविधान संषोधन विधेयक पेष किया, अंततः 20 अपै्रल 1993 को भारत के राष्ट्रपति ने इस पर अपनी स्वीकृति दी।
पंचायतों की भूमिका
पंचायतों को विभिन्न विकास गतिविधियों को शुरू करने के लिए पर्याप्त निधि उपलब्ध हों। प्रत्येक राज्य में 73 वें संषोधन अधिनियम- 1992 के अनुसार वित आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। आर्थिक कार्यक्रमों की योजना बनाने और उन्हंे लागू करने के लिए संषोधन अधिनियम पंचायतों को शक्तियां और जिम्मेदारियां देता है। ग्यारहवीं अनुसूची में कुल मिलाकर 29 गतिविधियां सूचीबद्व है। पंचायती राज संस्थाओं के लिए इन गतिविधियों को पांच श्रेणी में बांटा गया हैः

1. आर्थिक विकास:- ऐसे 11 मद हैं, जो आर्थिक विकास पर आधारित हैं, जिसमें शामिल हैः
(अ) निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम, जैसे एस.वाई., एस.जी.आर.वाई. आदि।
(ब) भू सुधार ।
(ग) लघु सिंचाई ,
(द) पषुपालन,
(इ) मत्स्य पालन,
(ई) सामाजिक वानिकी,
(फ) लघु वनोपज,
(ग) लघु एवं कुटीर उद्योग,
(ह) कृषि
(ज) ईंधन, चारा ।
2. षिक्षा – इसमें प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय, गैर- औपचारिक षिक्षा, पुस्तकालय, तकनीकी प्रषिक्षण एवं सांस्कृतिक कार्यकलाप शामिल है।
3. स्वास्थय – इसमें स्वास्थ्य एवं स्वच्छता और परिवार कल्याण शामिल है।
4. महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण – इसमें महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण, कमजोर वर्गोंं का कल्याण और सार्वजनिक वितरण शामिल हैं।
5. ढ़ाचागत विकास – इसमें सड़कें, आवासीय सुविधायें, पेय जल, बाजार, विद्युतीकरण, गैर परंपरागत – उर्जा स्त्रोत, सामुदायिक सम्पत्तियों का संरक्षण शामिल है।
महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज ‘ग्राम राज से स्वराज‘ पर आधारित है।
ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर उन्होंने जोर देते हुये अंिहंसात्मक दर्षन से ग्रामीण विकास की आधारषिला रखी थी। गांधी जी के आर्थिक समानता, षिक्षा, सामाजिक एकता पर केन्द्रित रचनात्मक कार्यक्रम से पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी थी, ऐसे में त्रिस्तरीय पंचायती राज में 29 गतिविधियां सूचीबद्व की गई हैं, जिनके प्रभावी क्रियान्वयन से पंचायतों से ग्रामीण विकास का सपना साकार होगा। पंचायतों को ग्रामीण विकास के व्यापक अधिकार दिये गये हैं, इन अधिकारों का क्रियान्वयन निष्पक्ष रूप से इस प्रकार किया जाये, जिससे ‘पंच परमेष्वर की भूमिका चरितार्थ हो सके। गांव में बेरोजगारी की समस्या न रहे, स्वास्थ्य सेवाएं घर-घर पहुंचे, विकास योजनाओं का लाभ योग्य हितग्राही तक पहुंचे।

11 वीं अनुसूची (अनुच्छेद 243 जी)
पंचायती राज का अभिप्राय ग्रामीण स्थानीय स्वषासन से है। पंचायती राज स्वराज को सार्थक करे, इसके लिए वर्ष 1002 में 73वें संविधान संषोधन अधिनियम संविधान में शामिल किया गया है। इस अधिनियम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला है। इस अधिनियम से संविधान में 11 वीं अनुसूची जुड़ गई है, जिसमें पंचायतों की 29 गतिविधियां सूचीबद्व है

  1. कृषि (कृषि विस्तार सहित)।
  2. भूमि विकास, भूमि सुधार, भूमि चकबंदी, भूमि संरक्षण
  3. लद्यु सिंचाई, जल प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्र विकास।
  4. पषुपालन, दुग्ध व्यवसाय तथा मुर्गी पालन।
  5. मत्स्य पालन, सामाजिक वानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी।
  6. लद्यु वनोपज।
  7. लद्यु उद्योग (खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित)।
  8. खादी, कुटीर एवं ग्रामोद्योग।
  9. ग्रामीण आवास।
  10. पेय जल।
  11. र् इंंधन तथा पषु चारा।
  12. सड़कों, पुलों, तटीय, जल मार्गों तथा अन्य संचार के साथ।
  13. ग्रामीण विद्युती (विद्युत वितरण सहित)।
  14. गैर परम्परागत ऊर्जा स़्त्रोत।
  15. गरीबी उन्मूलन काय्रक्रम।
  16. षिक्षा (प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय सहित )।
  17. तकनीकी प्रषिक्षण एवं व्यवसायिक षिक्षा।
  18. व्यस्क एवं गैर व्यस्क औपचारिक षिक्षा।
  19. पुस्तकालय।
  20. सांस्कृतिक गतिविधियां।
  21. बाजार एवं मेले।
  22. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं (चिकित्सालय प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र्र तथा औषधालय)।
  23. परिवार कल्याण।
  24. महिला एवं बाल विकास।
  25. सामाजिक कल्याण (विकलांग व मानसिक रोगी का कल्याण)
  26. कमजोर वर्ग (विषेषकर अनुसूचित जाति अनुसूचित जन जाति)।
  27. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
  28. समुदायिक सम्पत्ति की देखरेख ।

संविधान के 40 वें अनुच्छेद में इस अधिनियम से व्यवहारिक रूप दिया गया है जिसके अनुसार ‘‘ग्राम पंचायतों को गठित करने के लिए राज्य कदम उठाएगा और उन्हें उन आवष्यक शक्तियों और अधिकारों से विभूषित करेगा, जिसमें िकवे स्वषासन की इकाई की तरह कार्य करने में सक्षम हों। यह अनुच्छेद राज्य की नीति के निर्देषक सिद्वांतों का एक हिस्सा है।‘‘ 73 वें संविधान संषोधन अधिनियम में अनिवार्य एवं एच्छिक प्रावधानों को शामिल किया गया है।
(अ) अनिवार्य प्रावधान
1. एक गांव या गांवों के समूह में ग्राम सभा का गठन
2. ग्राम जनपद और जिला स्तर पर पंचायतों की स्थापना।
3. तीनों स्तरों पर सभी सीटों के लिए पं्रत्यक्ष चुनाव।
4. जनपद (Block) और जिला (District) स्तर के प्रमुख के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव।
5. पंचायतों में चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष।
6. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति वर्ग का आरक्षण।
7. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए एक तिहाई महिला आरक्षण।
8. त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष है। किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्ति के बाद 6 माह की अवधि के भीतर नये चुनाव का प्रावधान है।
9. पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना।
10. पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित आयोग की स्थापना।
(ब) एच्छिक प्रावधान
1. विधानसभा एवं लोक सभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायती राज संस्थाओं में लोक सभा और विधानसभा के प्रतिनिधियों को शामिल करना।
2. त्रिस्तरीय पंचायतों में किसी भी स्तर पर सदस्यों एवं प्रमुख के लिए पिछड़े वर्ग का आरक्षण ।
3. स्थानीय सरकार के रूप में कार्य करने के लिए पंचायतों को अधिकार एवं शक्तियां देना।
4. सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास के लिए पंचायतों को योेजना बनाने अधिकार एवं शक्तियां देना तथा 11 वीं अनुसूची के 29 कार्यों में से सभी या कुछ कार्यों को सम्पन्न करना।
5. पंचायतों को विषेष अधिकार देना, उन्हें पथकर, शुल्क आदि लगाने के लिए अधिकार देना।

छत्तीसगढ़ में जल संसाधन और कृषि विकास

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रामराज्य का कौषल प्रदेष तथा भारत का 26वां प्रदेष छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। यहां उपजाऊं जमीन है। जंगल है। रत्नगर्भा धरती हैं। दुर्लभ जैव विविधता है। महानदी, इन्द्रावती, षिवनाथ, अरपा, खारून जैसी जीवनदायिनी नदियां है। यहां 1041, सिंचाई जलाषय और 36 हजार से अधिक ग्रामीण तालाब हैं अर्थात छत्तीसगढ़ में सतही जल और भू-जल अधिक है, यहां ऊपर पानी है और नीचे पानी हैं- बस जरूरत ह ैजल संसाधनों के दोहन की। छत्तीसगढ़ अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। जहां तरह-तरह की भूमि है। जलवायु है। महान दार्षनिक टालस्टाय ने लिखा है कि महानदी की रेत में हीरे पाये जाते हैं। यहां हीरा बाक्साईट, लौह अयस्क कोयला चूना डोलोमाइट, टिन, कोरण्डम तथा क्वार्टजाईट जैसे खनिजों के दोहन से राजस्व की भारी राषि प्राप्त होती है। छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है, जहां सिंचाई क्षेत्र में बड़ी विसंगति है।
छत्तीसगढ़ का कुल भोैगोलिक क्षेत्रफल 137.89 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से केवल 46.71 लाख हेक्टेयर में फसलों की खेती की जा रही है। इस प्रदेष में धान की खेती अधिकांष क्षेत्र में की जाती है, जबकि यहां की जलवायु दलहन-तिलहन -फल-सब्जी तथा नकदी फसलों के लिए उपयुक्त है।
जलाषयों और तालाबों का प्रदेषः
छत्तीसगढ़ में 1041 जलाषय हैं, जिनमें माड़म सिल्ली, दुधावा, रविषंकर सागर, सोंढूर प्रमुख हैं। प्रदेष में 36844 सिंचाई तालाब हैं। तालाबों प्रदेष छत्तीसगढ़ कहलाता है। जलाषयों और तालाबों का समुचित दोहन कर यहां एक फसली क्षेत्र को बहुफसली में बदला जा सकता है।
सामूहिक उद्वहन योजनाः
किसानों ने सिंचाई की उपयोगिता को समझते हुये सामूहिक उद्वहन योजना को अपनाया है, जिससे खरीफ के अलावा रबी और जायद में फसलों का क्षेत्र बढ़ा है। फसलों की उत्पादकता में वृद्वि हुई है तथा कृषि विकास में अपेक्षित सफलता मिली है।
फसलों की उत्पादकता मंे वृद्वि:
छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के तिल्दा और अभनपुर विकास खण्ड के कृषकों के सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि किसानों को सब्जी वाली फसलों से अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक आमदनी मिलती है।

 

 


स्त्रोत: कृषि विभाग, छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर, 2013

 

तिल्दा और अभनपुर विकास खण्ड में भटा की खेती से क्रमषः 50 हजार रूप्ये तथा 45.5 हजार रूपये प्रति हेक्टेयर आमदनी प्राप्त हुई है जबकि धान में यह आमदनी 14 हजार रूपये से लेकर 17 हजार रूपये तक प्राप्त हुई है। जायद मंे की गई धान की सिंचित खेती में खरीफ धान की अपेक्षा अधिक आय प्राप्त हुई है। जायद में भटा, भिण्डी की अपेक्षा धान की कम आमदनी आंकी गई है।

 

सिंचाई:

प्रदेष में केवल 31 प्रतिषत क्षेत्र मंे सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। जहां शून्य से लेकर 87 प्रतिषत तक सिंचाई का क्षेत्रफल विभिन्न जिलों में उपलब्ध है। यहां सिंचाई के क्षेत्र में बड़ा अंतर नजर आता है। छत्तीसगढ़ में अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, जहां जल संसाधनों के प्रबंधन हेतु प्रभावी जल नीति बनायी जानी चाहिए।

प्रदेष में जहां सिंचाई साधन उपलब्ध हैं:- वहां अधिक आमदनी देने वाली फसलों की खेती को अपनाया जाये। सदियों से दाल-भात का सम्बंध रहा है, जहां धान की खेती की जाती है-वहां दलहन की खेती अवष्य की जानी चाहिए।
प्रदेष मंे अधिकांष क्षेत्र में सिंचाई नहरों द्वारा की जाती है, जहां जल के वितरण और नहरों के रखरखाव पर ध्यान देने की आवष्यकता है। जल वितरण में किसानों की भागीदारी सुनिष्चित की जानी चाहिए।
जल-चक्र को बनाये रखने के लिए जंगलों के विनाष को रोका जाये तथा वन क्षेत्र में वृक्षारोपण किया जाये।
नलकूप, कुंआ निर्माण हेतु छत्तीसगढ़ शासन के कृषि विभाग में एक पृथक प्रकोष्ठ (ैमचंतंजम ब्मसस) बनाया जाये, जिससे किसानों को कूप, नलकूप खनन की कार्यवाही में सरलता हो।

प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय,
कृषि महाविद्यालय,कृषक नगर,
रायपुर 492012 (छत्तीसगढ़)

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