महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज

डाॅ. भागचन्द्र जैन

प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र), प्रचार अधिकारी,
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय रायपुर दृ 492012 ;छत्तीसगढ़)

 

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत की आत्मा गांवों में बसती है।‘ गांवों की प्रगति से सबकी प्रगति जुड़ी है। भारत गांवों का देष है, जहां पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण है। बापू ने कल्पना की थी कि ग्राम राज से स्वराज का सपना साकार हो। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत गांवों में रहता है, नगरों में नहीं। यदि मुझे गांवों को निर्धनता से मुक्त करनें में सहायता मिल जाये तो मैं समझूंगा कि मैंने सारे भारत के लिए स्वराज प्राप्त कर लिया है। यदि गांव नष्ट होता है तो भारत भी नष्ट हो जायेगा।‘ गांधी जी ऐसे पहले दार्षनिक थे, जिन्होंने ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर विषेष बल दिया, उनके राजनैतिक जीवन और अहिंसात्मक दर्षन की ग्रामीण विकास ही आधार-षिला थी। उन्होंने अपने प्रारम्भिक जीवन से जीवन से ही ऐसे रचनात्मक कार्यों को अपनाया, जिनका सीधा सम्बन्ध जीवन को सरस, सम्पूर्ण तथा सुखी बनाना था। उनका कहना था कि भारत की आत्मा गांव है-इसलिए यदि गांव-गांव में नव जीवन और आषा का संवार नहीं होता, तो स्वराज बेकार है। रचनात्मक कार्यक्रम में निम्नांकित क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई थीः

  1. साम्प्रदायिक एकता
  2. अस्पृष्यता निवारण
  3. मद्य निषेध
  4. खादी का प्रचार
  5. ग्रामीण उद्योगों का विकास
    (क) गुड़ बनाना
    (क) तेल निकालना
    (क) धान कूटना
    (क) बुनाई
    (क) नीम का तेल निकालना
  6. पषुधन विकास
  7. बुनियादी षिक्षा
  8. प्रौढ़ षिक्षा
  9. ग्रामीण स्वच्छता
  10. महिला विकास
  11. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग उत्थान
  12. नीय साधनों से क्षेत्रीय विकास
  13. हिन्दी को बढ़ावा
  14. कृषक, श्रमिक तथा विद्यार्थियों के संगठन
  15. प्राकृतिक चिकित्सा
  16. आर्थिक विषमता दूर करना
  17. स्वावलम्बी गांवों का निर्माण
  18. श्रम में निष्ठा

इस प्रकार के व्यापक कार्यक्रम में गांवों के पुर्ननिर्माण और सर्वांगीण विकास की छटा दिखायी देती थी। गांधी जी एक नये समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसमें विषमता न हो और जो शोषणमुक्त हो । ऐसा समाज तब बनेगा, जबकि गांवों की समस्याओं का निराकरण किया जाये। गांधी जी ने गांवों की समस्याओं का निराकरण भी किया, क्योंकि वे केवल आदर्षवाद में विष्वास नहीं करते थे, वे एक व्यावहारिक महा पुरूष थें। उन्होंने सेवाग्राम आश्रम द्वारा निकटवर्ती क्षेत्रों में यह कार्यक्रम लागू किया, जिसके कुछ ही दिनों में सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे।
महात्मा गांधी मानते थें कि अच्छा स्वास्थ्य समाज, परिवार और व्यक्ति तीनों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। देष की वास्तविक सम्पत्ति वहां के निवासियों का अच्छा स्वास्थ्य है। उन्होंने लिखा है कि ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के पष्चात् सबसे पहला कार्य देष में यह होगा कि प्रत्येक व्यक्ति को ठीक से रोटी तथा कपड़ा मिल सके।‘स्वस्थ और सुखी जीवन की यह प्राथमिक आवष्यकता है, परन्तु स्वस्थ जीवन के लिए वातावरण की स्वच्छता के महत्व को पीछे नही रखा जा सकता।ं देष में होने वाली बहुत कुछ बीमारियां गावों को साफ-सुथरा बनाकर सरलतापूर्वक कम की जा सकती है।
गांधी जी के सपनों का पंचायती राज
पंचायत य पंचायती राज का उददेष्य केवल अधिकार से व्यवस्था और प्रषासन चलाना नहीं है, वरन् व्यक्तियों को सामुदायिक विकास के लिए निरंतर चलने वाले कार्याें के विकास में लगाना है। महात्मा गांधी मानते थे कि आरम्भ में लोंगों को यह अनुभव होना चाहिए कि व्यक्तियों के हित में पंचायत कार्य कर रही है। ऐसी स्थिति मंे यदि अधिकारों का यथायोग्य ध्यान रख कर उपयोग होगा तो उससे क्षति नहीं होगी, वरन् गांव के स्वायत्त प्रषासन की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
पंचायत को अपनी प्रतिष्ठा स्थिर करने के लिए यह आवष्यक है कि वह उन कार्यों को प्राथमिकता दे, जिनका लोगों के जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध हो। इसमें गांव के व्यक्ति भी सहयेाग देंगे और धीरे-धीरे ऐसी ही अन्य जिम्मेदारियांे को बहन करने में वे सक्षम होगे। पंचायत का कार्य-क्षेत्र बढ़ता जायेगा और अन्त में यह सिद्व हो जायेगा कि पंचायते ऐसे कार्यों की जिम्मेदारी निभाने में उच्च स्तर की संस्थाओं से अच्छी हैं।
वैधानिक स्वरूप
पंचायत कानूनी अधिकार युक्त संस्था होनी चाहिए, साथ ही कानून ऐसा हो, जो समझने तथा समझाने मंे स्पष्ट हो, सरल हो।

सामान्यतया प्रत्येक उपयोगी कार्य के लिए कानून होना चाहिए, किन्तु यह कानून जटिल न हो।

  • पंचायत का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें स्वस्थ और उच्च-परम्पराओं का विकास हो।
  • इसमें लोकतांत्रिक कार्य प्रणाली उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितनी कि व्यवहारिक कार्य-विधि महत्वपूर्ण है।
  • अधिक महत्व के निर्णयों के लिए अधिक से अधिक व्यक्तियों की अनुमति लेनी चाहिए।
  • बहुमत के आधार पर महत्व के निर्णयों को मान लेने से पंचायत की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी, प्रतिष्ठा उससे बढ़ती है जहां समुदाय के सभी व्यक्ति एकमत हों।
  • यदि किसी कार्य को करने के लिए सभी व्यक्ति एकमत होते हैं तो वे सब मिलकर उसे पूरा करने का प्रयास करेंगे, जिससे सच्चे लोकतन्त्र की जड़ें मजबूत हांेगी।

आजादी के पहले पंचायतें
अंग्रेजों के शासन काल में शासक चाल्र्स मेटकाल्फ ने पंचायतों की सराहना करते हुये उन्हें ‘लद्यु गणराज्य‘ की संज्ञा दी, किन्तु बाद में बड़े-बड़े व्यक्तियों ने निर्माण और विकास कार्यों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। राॅयल आयोग ने वर्ष 1909 में अपने प्रतिवेदन में अनुषंसा की कि विकेंद्रीकरण के लिए ग्राम पंचायतों के माध्यम से व्यक्तियों को जोड़ा जाये। इसके बाद विभिन्न राज्यों द्वारा समय-समय पर पंचायत अधिनियम पारित किए गए, जिनमें ‘बंगाल ग्राम स्वषासन अधिनियम (1919), मद्रास-बाम्बे एवं सयुक्त प्रांत ग्राम पंचायत अधिनियम (1920), बिहार एवं उड़ीसा ग्राम प्रषासन अधिनियम, असम ग्राम स्वषासन अधिनियम (1926), पंजाब ग्राम पंचायत अधिनियम (1935), आदि प्रमुख हैं, ये अधिनियम ग्राम मुददों एवं ग्राम विकास की देखरेख पर आधारित थे। स्थानीय स्वषासन को गांव के छोटे मामलों के निपटानें का अधिकार था, किन्तु ये निकाय लोकतात्रिक नहीं थे, इनके वित्तीय संसाधन सीमित थे, ऐसी स्थिति वर्ष 1950 तक ज्यों की त्यों बनी रही।
आजादी के बाद पंचायतें
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस बात पर जोर दिया था कि स्वतंत्रता की शुरूआत सर्वप्रथम निम्न स्तर से होनी चाहिए, जिसमें प्रत्येक ग्राम एक पंचायत वाला गणराज्य (ग्राम स्वराज) होना चाहिए, इसमें पंचायत को सभी शक्तियां प्राप्त हों। जनता की भागीदारी सुनिष्चित करने के लिए वर्ष 1952 मं सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, किन्तु इस कार्यक्रम का लाभ ग्रामीण निर्धनों तक नहीं पहुंच पाया। इसकी वस्तु स्थिति की समीक्षा के लिए वर्ष 1957 में बलवंतराय मेहता समिति का गठन किया गया, जिसमें निर्वाचित स्थानीय निकायों की स्थापना और पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था की अनुषंसा की । वर्ष 1977 में राष्ट्रीय स्तर पर अषोक मेहता समिति का गठन किया गया, इस समिति का मानना था कि ग्रामीण भारत सभी विकासोन्मुखी कार्यक्रमों का आधार है। पंचायती राज की समीक्षा हेतु जी.वी.के. राव समिति, एल.एम. सिंघवी समिति, सरकारियां आयोग का गठन किया गया। वर्ष 1989 में भारत सरकार ने संविधान के भाग प्ग् में पंचायतों को शामिल करने के लिए 64 वां संविधान संषोधन विधेयक पेष किया, अंततः 20 अपै्रल 1993 को भारत के राष्ट्रपति ने इस पर अपनी स्वीकृति दी।
पंचायतों की भूमिका
पंचायतों को विभिन्न विकास गतिविधियों को शुरू करने के लिए पर्याप्त निधि उपलब्ध हों। प्रत्येक राज्य में 73 वें संषोधन अधिनियम- 1992 के अनुसार वित आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। आर्थिक कार्यक्रमों की योजना बनाने और उन्हंे लागू करने के लिए संषोधन अधिनियम पंचायतों को शक्तियां और जिम्मेदारियां देता है। ग्यारहवीं अनुसूची में कुल मिलाकर 29 गतिविधियां सूचीबद्व है। पंचायती राज संस्थाओं के लिए इन गतिविधियों को पांच श्रेणी में बांटा गया हैः

1. आर्थिक विकास:- ऐसे 11 मद हैं, जो आर्थिक विकास पर आधारित हैं, जिसमें शामिल हैः
(अ) निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम, जैसे एस.वाई., एस.जी.आर.वाई. आदि।
(ब) भू सुधार ।
(ग) लघु सिंचाई ,
(द) पषुपालन,
(इ) मत्स्य पालन,
(ई) सामाजिक वानिकी,
(फ) लघु वनोपज,
(ग) लघु एवं कुटीर उद्योग,
(ह) कृषि
(ज) ईंधन, चारा ।
2. षिक्षा – इसमें प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय, गैर- औपचारिक षिक्षा, पुस्तकालय, तकनीकी प्रषिक्षण एवं सांस्कृतिक कार्यकलाप शामिल है।
3. स्वास्थय – इसमें स्वास्थ्य एवं स्वच्छता और परिवार कल्याण शामिल है।
4. महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण – इसमें महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण, कमजोर वर्गोंं का कल्याण और सार्वजनिक वितरण शामिल हैं।
5. ढ़ाचागत विकास – इसमें सड़कें, आवासीय सुविधायें, पेय जल, बाजार, विद्युतीकरण, गैर परंपरागत – उर्जा स्त्रोत, सामुदायिक सम्पत्तियों का संरक्षण शामिल है।
महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज ‘ग्राम राज से स्वराज‘ पर आधारित है।
ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर उन्होंने जोर देते हुये अंिहंसात्मक दर्षन से ग्रामीण विकास की आधारषिला रखी थी। गांधी जी के आर्थिक समानता, षिक्षा, सामाजिक एकता पर केन्द्रित रचनात्मक कार्यक्रम से पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी थी, ऐसे में त्रिस्तरीय पंचायती राज में 29 गतिविधियां सूचीबद्व की गई हैं, जिनके प्रभावी क्रियान्वयन से पंचायतों से ग्रामीण विकास का सपना साकार होगा। पंचायतों को ग्रामीण विकास के व्यापक अधिकार दिये गये हैं, इन अधिकारों का क्रियान्वयन निष्पक्ष रूप से इस प्रकार किया जाये, जिससे ‘पंच परमेष्वर की भूमिका चरितार्थ हो सके। गांव में बेरोजगारी की समस्या न रहे, स्वास्थ्य सेवाएं घर-घर पहुंचे, विकास योजनाओं का लाभ योग्य हितग्राही तक पहुंचे।

11 वीं अनुसूची (अनुच्छेद 243 जी)
पंचायती राज का अभिप्राय ग्रामीण स्थानीय स्वषासन से है। पंचायती राज स्वराज को सार्थक करे, इसके लिए वर्ष 1002 में 73वें संविधान संषोधन अधिनियम संविधान में शामिल किया गया है। इस अधिनियम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला है। इस अधिनियम से संविधान में 11 वीं अनुसूची जुड़ गई है, जिसमें पंचायतों की 29 गतिविधियां सूचीबद्व है

  1. कृषि (कृषि विस्तार सहित)।
  2. भूमि विकास, भूमि सुधार, भूमि चकबंदी, भूमि संरक्षण
  3. लद्यु सिंचाई, जल प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्र विकास।
  4. पषुपालन, दुग्ध व्यवसाय तथा मुर्गी पालन।
  5. मत्स्य पालन, सामाजिक वानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी।
  6. लद्यु वनोपज।
  7. लद्यु उद्योग (खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित)।
  8. खादी, कुटीर एवं ग्रामोद्योग।
  9. ग्रामीण आवास।
  10. पेय जल।
  11. र् इंंधन तथा पषु चारा।
  12. सड़कों, पुलों, तटीय, जल मार्गों तथा अन्य संचार के साथ।
  13. ग्रामीण विद्युती (विद्युत वितरण सहित)।
  14. गैर परम्परागत ऊर्जा स़्त्रोत।
  15. गरीबी उन्मूलन काय्रक्रम।
  16. षिक्षा (प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय सहित )।
  17. तकनीकी प्रषिक्षण एवं व्यवसायिक षिक्षा।
  18. व्यस्क एवं गैर व्यस्क औपचारिक षिक्षा।
  19. पुस्तकालय।
  20. सांस्कृतिक गतिविधियां।
  21. बाजार एवं मेले।
  22. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं (चिकित्सालय प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र्र तथा औषधालय)।
  23. परिवार कल्याण।
  24. महिला एवं बाल विकास।
  25. सामाजिक कल्याण (विकलांग व मानसिक रोगी का कल्याण)
  26. कमजोर वर्ग (विषेषकर अनुसूचित जाति अनुसूचित जन जाति)।
  27. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
  28. समुदायिक सम्पत्ति की देखरेख ।

संविधान के 40 वें अनुच्छेद में इस अधिनियम से व्यवहारिक रूप दिया गया है जिसके अनुसार ‘‘ग्राम पंचायतों को गठित करने के लिए राज्य कदम उठाएगा और उन्हें उन आवष्यक शक्तियों और अधिकारों से विभूषित करेगा, जिसमें िकवे स्वषासन की इकाई की तरह कार्य करने में सक्षम हों। यह अनुच्छेद राज्य की नीति के निर्देषक सिद्वांतों का एक हिस्सा है।‘‘ 73 वें संविधान संषोधन अधिनियम में अनिवार्य एवं एच्छिक प्रावधानों को शामिल किया गया है।
(अ) अनिवार्य प्रावधान
1. एक गांव या गांवों के समूह में ग्राम सभा का गठन
2. ग्राम जनपद और जिला स्तर पर पंचायतों की स्थापना।
3. तीनों स्तरों पर सभी सीटों के लिए पं्रत्यक्ष चुनाव।
4. जनपद (Block) और जिला (District) स्तर के प्रमुख के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव।
5. पंचायतों में चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष।
6. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति वर्ग का आरक्षण।
7. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए एक तिहाई महिला आरक्षण।
8. त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष है। किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्ति के बाद 6 माह की अवधि के भीतर नये चुनाव का प्रावधान है।
9. पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना।
10. पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित आयोग की स्थापना।
(ब) एच्छिक प्रावधान
1. विधानसभा एवं लोक सभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायती राज संस्थाओं में लोक सभा और विधानसभा के प्रतिनिधियों को शामिल करना।
2. त्रिस्तरीय पंचायतों में किसी भी स्तर पर सदस्यों एवं प्रमुख के लिए पिछड़े वर्ग का आरक्षण ।
3. स्थानीय सरकार के रूप में कार्य करने के लिए पंचायतों को अधिकार एवं शक्तियां देना।
4. सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास के लिए पंचायतों को योेजना बनाने अधिकार एवं शक्तियां देना तथा 11 वीं अनुसूची के 29 कार्यों में से सभी या कुछ कार्यों को सम्पन्न करना।
5. पंचायतों को विषेष अधिकार देना, उन्हें पथकर, शुल्क आदि लगाने के लिए अधिकार देना।

छत्तीसगढ़ में जल संसाधन और कृषि विकास

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रामराज्य का कौषल प्रदेष तथा भारत का 26वां प्रदेष छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। यहां उपजाऊं जमीन है। जंगल है। रत्नगर्भा धरती हैं। दुर्लभ जैव विविधता है। महानदी, इन्द्रावती, षिवनाथ, अरपा, खारून जैसी जीवनदायिनी नदियां है। यहां 1041, सिंचाई जलाषय और 36 हजार से अधिक ग्रामीण तालाब हैं अर्थात छत्तीसगढ़ में सतही जल और भू-जल अधिक है, यहां ऊपर पानी है और नीचे पानी हैं- बस जरूरत ह ैजल संसाधनों के दोहन की। छत्तीसगढ़ अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। जहां तरह-तरह की भूमि है। जलवायु है। महान दार्षनिक टालस्टाय ने लिखा है कि महानदी की रेत में हीरे पाये जाते हैं। यहां हीरा बाक्साईट, लौह अयस्क कोयला चूना डोलोमाइट, टिन, कोरण्डम तथा क्वार्टजाईट जैसे खनिजों के दोहन से राजस्व की भारी राषि प्राप्त होती है। छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है, जहां सिंचाई क्षेत्र में बड़ी विसंगति है।
छत्तीसगढ़ का कुल भोैगोलिक क्षेत्रफल 137.89 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से केवल 46.71 लाख हेक्टेयर में फसलों की खेती की जा रही है। इस प्रदेष में धान की खेती अधिकांष क्षेत्र में की जाती है, जबकि यहां की जलवायु दलहन-तिलहन -फल-सब्जी तथा नकदी फसलों के लिए उपयुक्त है।
जलाषयों और तालाबों का प्रदेषः
छत्तीसगढ़ में 1041 जलाषय हैं, जिनमें माड़म सिल्ली, दुधावा, रविषंकर सागर, सोंढूर प्रमुख हैं। प्रदेष में 36844 सिंचाई तालाब हैं। तालाबों प्रदेष छत्तीसगढ़ कहलाता है। जलाषयों और तालाबों का समुचित दोहन कर यहां एक फसली क्षेत्र को बहुफसली में बदला जा सकता है।
सामूहिक उद्वहन योजनाः
किसानों ने सिंचाई की उपयोगिता को समझते हुये सामूहिक उद्वहन योजना को अपनाया है, जिससे खरीफ के अलावा रबी और जायद में फसलों का क्षेत्र बढ़ा है। फसलों की उत्पादकता में वृद्वि हुई है तथा कृषि विकास में अपेक्षित सफलता मिली है।
फसलों की उत्पादकता मंे वृद्वि:
छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के तिल्दा और अभनपुर विकास खण्ड के कृषकों के सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि किसानों को सब्जी वाली फसलों से अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक आमदनी मिलती है।

 

 


स्त्रोत: कृषि विभाग, छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर, 2013

 

तिल्दा और अभनपुर विकास खण्ड में भटा की खेती से क्रमषः 50 हजार रूप्ये तथा 45.5 हजार रूपये प्रति हेक्टेयर आमदनी प्राप्त हुई है जबकि धान में यह आमदनी 14 हजार रूपये से लेकर 17 हजार रूपये तक प्राप्त हुई है। जायद मंे की गई धान की सिंचित खेती में खरीफ धान की अपेक्षा अधिक आय प्राप्त हुई है। जायद में भटा, भिण्डी की अपेक्षा धान की कम आमदनी आंकी गई है।

 

सिंचाई:

प्रदेष में केवल 31 प्रतिषत क्षेत्र मंे सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। जहां शून्य से लेकर 87 प्रतिषत तक सिंचाई का क्षेत्रफल विभिन्न जिलों में उपलब्ध है। यहां सिंचाई के क्षेत्र में बड़ा अंतर नजर आता है। छत्तीसगढ़ में अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, जहां जल संसाधनों के प्रबंधन हेतु प्रभावी जल नीति बनायी जानी चाहिए।

प्रदेष में जहां सिंचाई साधन उपलब्ध हैं:- वहां अधिक आमदनी देने वाली फसलों की खेती को अपनाया जाये। सदियों से दाल-भात का सम्बंध रहा है, जहां धान की खेती की जाती है-वहां दलहन की खेती अवष्य की जानी चाहिए।
प्रदेष मंे अधिकांष क्षेत्र में सिंचाई नहरों द्वारा की जाती है, जहां जल के वितरण और नहरों के रखरखाव पर ध्यान देने की आवष्यकता है। जल वितरण में किसानों की भागीदारी सुनिष्चित की जानी चाहिए।
जल-चक्र को बनाये रखने के लिए जंगलों के विनाष को रोका जाये तथा वन क्षेत्र में वृक्षारोपण किया जाये।
नलकूप, कुंआ निर्माण हेतु छत्तीसगढ़ शासन के कृषि विभाग में एक पृथक प्रकोष्ठ (ैमचंतंजम ब्मसस) बनाया जाये, जिससे किसानों को कूप, नलकूप खनन की कार्यवाही में सरलता हो।

प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय,
कृषि महाविद्यालय,कृषक नगर,
रायपुर 492012 (छत्तीसगढ़)

छत्तीसगढ़ के बजट में कृषि को प्राथमिकता

  • डाॅ. भागचन्द्र जैन
    प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
    कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012
    (छत्तीसगढ़)

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                                                  रामराज्य का कौषल प्रदेष तथा भारत का 26 वां प्रदेष छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, क्या नहीं है हमारे छत्तीसगढ़ में ? उपजाऊ जमीन है। जंगल है। रत्न-गर्भा धरती है। दुर्लभ जैव विविधता है। महानदी, इन्द्रवती, षिवनाथ, अरपा, खारून जैसी जीवनदायिनी नदियां है। यहां 1041 सिंचाई जलाषय और 36844 तालाब हैं अर्थात यहां सतही जल और भू-जल अधिक है। यहां ऊपर पानी है और नीचे पानी है- बस जरूरत है इन संसाधनों के दोहन की। छत्तीसगढ़ अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। प्रदेष में भाटा, मटासी, डोरसा, कन्हार तरह-तरह की भूमि हेै। तरह-तरह की जलवायु है। महान दार्षनिक टालस्टाय ने लिखा है कि महानदी की रेत में हीरे पाये जाते हैं। हीरा, वाक्साईट,लौह अयस्क, कोयला, चूना, डोलामाईट, टिन, कोरण्डम तथा क्वार्टजाइट जैसे खनिजों के दोहन से राजस्व की भारी राषि प्राप्त होती है।

छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है, यहां की संस्कृति धान से जुड़ी है। प्रदेष वर्ष 2015-16 का बजट 13 मार्च 2015 को प्रस्तुत किया गया, जिसमें 65 हजार करोड़ रूप्ये का प्रावधान है। बजट में कृषि के लिए 10676 करोड़ रूप्ये आबंटित किये गये हैं, जबकि वर्ष 2014-15 में कृषि के लिए 8495 करोड़ रूप्ये रखे गये थे। कृषि एवं उद्यानिकी, पषुपालन, सहकारिता, सिंचाई, कृषि पम्प अनुदान के लिए आबंटित राषि इस प्रकार हैः

सकल घरेलू उत्पाद
छत्तीसगढ़ में वर्ष 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 13.20 प्रतिषत रहने का अनुमान लगाया गया है, जबकि भारत में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 11.59 प्रतिषत होने का अनुमान लगाया गया है। प्रदेष में कृषि की विकास दर 14.18 प्रतिषत आंकी गई है, जिसमें कृषि के साथ-साथ सहयोगी व्यवसाय पषुपालन, वानिकी, मत्स्य आदि शामिल हैं। उद्योग की विकास दर 10.62 प्रतिषत होने का अनुमान लगाया गया है, जिसमें खनिज, निर्माण, मेनुफेक्चुरिंग, विद्युत, गैस और जल आपूर्ति को शामिल किया गया है। सेवा क्षेत्र की विकास दर का अनुमान 15.21 प्रतिषत लगाया गया है। वर्ष 2014-15 में प्रदेष में प्रति व्यक्ति आय 64442 रूप्ये होने का अनुमान लगाया गया है, जो कि वर्ष 2013-14 में 58547 रूपये थी।

मुख्य प्रावधान

  •  प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए 30 करोड़ रूप्ये
  • 20 नये पषु औषधालय
  • अरपा, भैंसाझार परियोजना के लिए 201 करोड़ रूपये
  • 92 मध्यम -लद्यु सिंचाई योजनाओं के लिए 97 करोड़ रूप्ये
  •  सिंचाई के लिए खारून विकास प्राधिकरण की स्थापना
  •  पषु चिकित्सा विष्वविद्यालय के लिए 60 करोड़ रूप्ये
  •  इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय, रायपुर में चार नये विषयों की शुरूआत
  •  जैविक उर्वरक एवं कीटनाषकों की गुणवत्ता सुनिष्चित करने के लिए रायपुर में बायो कंट्रोल प्रयोगषाला की स्थापना
  • दुर्ग की तांदुल नहर परियोजना की लाइनिंग के लिए 28 करोड़ रूप्ये
  • पंडरिया में नये शक्कर कारखाने की स्थापना
  • रायगढ़ जिले की केलो सिंचाई परियोजना के तहत नहर निर्माण के लिए 30 करोड़ रूप्ये
  • ब्याज मुक्त अल्पकालीन कृषि ऋण के लिए 158 करोड़ रूपये

छत्तीसगढ़ के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 22 प्रतिषत आंका गया है, जबकि औद्योगिक और सेवा क्षेत्र का योगदान क्रमषः 38 और 40 प्रतिषत रहा है। यहां कृषि विकास के लिए प्र्याप्त अवसर हैं। प्रदेष में तरह-तरह की धान की किस्में हैं, जहां 27 जिलों की पहचान वहां होने वाली सुगंधित धान की किस्मो से है। बजट में कृषि को प्राथमिकता दी गई है। छत्तीसगढ़ का मैदान, उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र और बस्तर का पठार तीन कृषि जलवायु क्षेत्र है – जहां दलहन-तिलहन, फल-सब्जी की खेती सीमित क्षेत्र में की जाती है। बजट में कृषि-उद्यानिकी-पषुपालन की योजनाओं, कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी गई है, जिनका लाभ लेकर कृषक, पषुपालक, सब्जी-फल उत्पादक खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित कर सकते हैं तथा प्रदेष में दूसरी हरित क्रांति का बिगुल बजा सकते हैं।

केन्द्रीय बजट और किसान

  • डाॅ. भागचन्द्र जैन
    प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
    कृषि महाविद्यालय, रायपुर-492012

 

‘कृषिरेव महालक्ष्मीः‘अर्थात कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थ्रव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिषत व्यक्ति खेती कर रहे हैं। भारत विकासषील देष है। भारत सबसे बड़ा चांवल निर्यातक देष है, जहां सबसे ज्यादा दूध और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 के अनुसार भारत की कृषि विकास दर 5 प्रतिषत रही है, जबकि आर्थिक विकास की दर 7.4 प्रतिषत रही है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान हर साल घटता जा रहा है। वास्तविकता यह है कि कृषि केवल जीवन यापन का साधन बनकर रह गई है।
कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए वर्ष 2015-16 के बजट में विभिन्न प्रावधान किये गये हैं, जैसे- कृषि साख में वृद्वि, डाकघर से गावों में कर्ज देना, भूमि स्वास्थ्य कार्ड, ग्रामीण साख निधि में वृद्वि आदि। कृषि और सम्बंधित गतिविधियों के लिए बजट में 11657 करोड़ रूपये का प्रावधान किया गया है, जो कि वर्ष 2014-15 में 10199 करोड़ रूप्ये था। कृषि और सम्बंधित व्यवसायों के लिए बजट में की गई वृद्वि से कृषि विकास की दर तेज होगी।

मुख्य प्रावधान
केन्द्रीय बजट में कृषि विकास को प्राथमिकता देते हुए विभिन्न प्रावधान किये गये हैं, जैसेः

  • कृषि ऋण का लक्ष्य 8.5 लाख करोड़ रूप्ये होगा।
  • तीन लाख रूप्ये तक का कृषि ऋण 7 प्रतिषत ब्याज दर पर यथावत मिलेगा।
  • प्रधानमंत्री ग्रामीण सिंचाई योजना शुरू होगी।
  •  मृदा स्वास्थ्य को विषेष प्राथमिकता।
  • ग्रामीण संरचना कोष के लिए 2500 करोड़ रूप्ये प्रस्तावित
  •  फसल बीमा के लिए 2589 करोड़ रूप्ये स्वीकृत।
  • जैविक खेती विकास हेतु 300 करोड़ रूप्ये का प्रावधान
  • ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा।
  •  डेयरी विकास अभियान के लिए 481 करोड़ रूप्ये का आबंटन।
  • नीली का्रंति के लिए 411 करोड़ रूप्ये का प्रावधान।
  • उर्वरक अनुदान के लिए 72969 करोड़ रूप्ये का आबंटन।
  • दीर्घकालीन ग्रामीण साख निघि के लिए 15000 करोड़ रूप्ये का प्रावधान।
  •  डाॅक घरों से मिलेगा गांवों में कर्ज।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए 1800 करोड़ रूप्ये का आबंटन।
  • राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के लिए 4500 करोड़ रूप्ये का आबंटन।
  • राष्ट्रीय खाद्य सुऱक्षा मिषन के लिए 530 करोड़ रूप्ये का प्रावधान।
    कृषि साख
    कृषि में ऋण इंजेक्षन की भूमिका निभाता है। किसानों को समय पर कर्ज मिले, इसके लिए बजट में प्रावधान किया गया है। कृषि में पूंजी निवेष बढ़ाने की दृष्टि से बजट में 8.5 लाख करोड़ रूप्ये ऋण का प्रावधान किया गया है, जो कि वर्ष 2014ऋ15 में 8 लाख करोड़ रूप्ये था। तीन लाख रूप्ये तक का कृषि ऋण 7 प्रतिषत दर पर यथावत मिलेगा।
  • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना
    बजट में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए 1800 करोड़ रूप्ये का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा सूक्ष्म सिंचाई योजना के लिए 5300 करोड़ रूप्ये बजट में आबंटित किये गये हैं। बजट में कहा गया है कि प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना का उददेष्य हर किसान की भूमि को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना है ओैर सरकार का लक्ष्य ‘हर बूंद के साथ अधिक फसल‘ के जरिये पानी का उचित उपयोग करना है। सिंचाई सुविधा में वृद्वि से फसल विविधिकरण को बढ़ावा मिलेगा तथा फसलों की उत्पादकता बढ़ेगी।
  • उर्वरक अनुदान
    केन्द्रीय बजट में उर्वरक अनुदान के लिए 72969 करोड़ रूप्ये आबंटित किये गये हैं, जो कि वर्ष 2014 -15 में 70967 करोड़ रूप्ये आबंटित थे। उर्वरकों की उपयोगिता बढ़ाने में उर्वरक अनुदान महत्वपूर्ण कदम होगा।
  • दीर्घकालीन ग्रामीण साख निधि
    सहकारी बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की वित्तिय स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिए दीर्घकालीन ग्रामीण साख निधि (Long Term Credit Fund) के लिए बजट में 15000 करोड़ रूप्ये का प्रावधान किया गया है।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड
    खेती मिटटी पर आधारित होती है। जैसी मिटटी होगी, जैसे उसमें पोषक तत्व होंगे वैसी ही फसलों की खेती की जायेगीं । इसके लिए मिटटी का स्वास्थ्य जानना आवष्यक है। केन्द्रीय बजट में घेषणा की गई है कि प्रत्येक किसान को मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) उपलब्ध कराया जायेगा।
  • जैविक खेती
    जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए बजट में प्रावधान किया गया है। बदलते हुये परिवेष में जैविक उत्पादों की मांग बढ़ती जा रही है, इसलिए जैविक खेती विकास हेतु बजट में 300 करोड़ रूप्ये आबंटित किये गये हैं। इसके लिए परम्परागत कृषि विकास योजना शुरू होगी।
  • फसल बीमा
    प्राकृतिक आपदा के कारण फसलें खराब हो जाती हैं। फसलों के नुकसान की क्षतिपूर्ति के लिए बजट में 2589 करोड़ रूप्ये का प्रावधान किया गया है।
  • डाॅक घरों से गांवों में कर्ज
    केन्द्रीय बजट 2015-16 मेें ग्रामीणों के विकास के लिए डाॅक घरों से कर्ज देने का प्रावधान किया गया है। पोस्ट आॅफिस से मिलने वाले कर्ज से गांवों में आर्थिक विकास होगा तथा साहूकारों से लेने वाले कर्ज से ग्रामीणों को छुटकारा मिलेगा।
  • खाद्य सुरक्षा
    राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिषन के लिए बजट में 530 करोड़ रूप्ये का प्रावधान किया गया है। कृषि से खाद्य सुरक्षा मुददा है। खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित करने के लिए बजट में खाद्य अनुदान बढ़ाया गया है, जिससे भारतीय खाद्य निगम की पुर्न संरचना, परिवहन को प्रभावी बनाया जायेगा तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली की क्षमता बढ़ेगी।
  • राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक
    राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) में स्थापित ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकास निधि के लिए 25000 करोड़ रूप्ये, दीर्घकालीण ग्रामीण ऋण निधि के लिए 15000 करोड़ रूप्ये, अल्पकालीन सहकारी ग्रामीण ऋण पुनर्वित्त निधि के लिए 15000 करोड़ रूप्ये का आबंटन किया गया।
  • राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक
    राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) में स्थापित ग्रामीण बुनियादी ढांचा विकास निधि के लिए 25000 करोड़ रूप्ये, दीर्घकालीन ग्रामीण ऋण पुर्णर्वित्त निधि के लिए 15000 करोड़ रूप्ये का आबंटन किया गया।
  • डेयरी एवं मत्स्य विकास
    मत्स्य पालन क्षेत्र के विकास के लिए प्रमुख कार्यक्रम नीली क्रांति का बजट में ध्यान रखा गया है, जिसके लिए 411 करोड़ रूप्ये दिये जायेंगे। बजट में डेयरी विकास के लिए 481 करोड़ रूप्ये और कृषि उन्नति योजना के लिए 3257 करोड़ रूप्ये का प्रावधान किया गया है।

केन्द्रीय बजट में कृषि को प्राथमिकता दी गई है। किसानों, ग्रामीणों के लिए कृषि योजनाओं-कार्यक्रमों को उपयोगी बनाया गया है, जिनका लाभ लेकर कृषक ग्रामीण, पषुपालक, सब्जी-फल उत्पादक सर्वांगीण विकास कर सकते हैं।

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