कैसे सुरक्षित रखें सदाबहार सब्जी – आलू

                                          

 डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

कैसे सुरक्षित रखें सदाबहार सब्जी - आलू - bhagchandra.com

संसार में जिन चार फसलांे की खेती की जाती है, उनमें एक फसल आलू है। आलू को ‘ गरीबों का दोस्त‘ कहा जाता है। पूरे वर्ष भर आलू की सब्जी का उपयोग दैनिक आहार में किया जाता है, क्योंकि आलू में अधिक मात्रा में स्टार्च, विटामिन सी और बी तथा खनिज पाया जाता है। आलू में 20.6 प्रतिषत कार्बोहाइड्रेट, 2.1 प्रतिषत प्रोटीन और 0.3 प्रतिषत वसा पाया जाता है। भारत में लगभग बीस लाख हेक्टेयर में आलू की खेती की जाती है। आलू को सदैव ताजा बनाये रखने के लिए यह जरूरी है कि खुदाई के बाद इसे अधिक समय तक सुऱिक्षत रखा जाये।
आलू की खुदाई ऐसे ढंग से की जाये कि कंदों के ऊपर का छिलका सुरक्षित रहे, क्योंकि छिलका उतरने से आलू के कंदों पर रोगों का प्रकोप अधिक होता है। खुदाई के समय जो कंद कट जाते हैं या उनका छिलका उतर जाता है, ऐसे कटे हुए आलू को अच्छे आलू के कंदों से छांटकर अलग रखना चाहिए। खेदे गये आलू के कंदों को छाया में फैलाकर चार-पांच दिन तक सुखाना चाहिए। यदिा संभव हो तो आलू को रगड़ से बचान के लिए कपड़े पर या सीमेंट के फर्ष पर सुखाना चाहिए। सुखाते समय कंदों पर सूर्य के सीधा प्रकाष नहीं पहुंचना चाहिए, क्योंकि सूर्य के सीधे प्रकाष से आलू हरे होने लगते हैं, यदि आलू सुखान ेकी अच्छी व्यवस्था न हो तो इन्हंे खुले मैदान में सुखाया जा सकता है, किन्तु सुखाते समय दिन में पतले काले कपड़े से आलू को ढक देना चाहिए। सूखने से आलू के कंदों का छिलका कड़ा हो जाता है, जिससे परिवहन में आलू के खराब होने की आषंका कम हो जाती है।
अच्छी तरह सूख जाने पर आलू के कंदों की छटाई करनी चाहिए। बड़े, मध्यम तथा छोटे आलू को वर्गीकृत करने के बाद बाजार भेज दिया जाता है। मध्यम आकार के आलू बीज के लिए उपयुक्त होते हैं। बीज के लिए सुरक्षित रखे जाने वाले आलू का बीजोपचार किया जाना चाहिए। उपचार किये गये आलू को छाया में फेैलाकर सुखाया जाना चाहिए, फिर इन आलू के कंदों को बोरों में भरना चाहिए।

  • भंडारण की विकसित नई तकनीक 

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के जालंधर स्थित केन्द्रीय आलू अनुसंधान केंद्र द्वारा आलू भंडारण की ऐसी तकनीक विकसित की गई है, जिससे आलू को 8 महीने तक भंडारित करके रखा जा सकता है। आलू अनुसंधान केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक डाॅ. आषिव मेहता के अनुसार आलू में लगभग 80 प्रतिषत पानी की मात्रा पायी जाती है, मिटटी से आलू निकालने के कुछ सप्ताह बाद यह खराब होने लगता है। आलू में मौजूद इस पानी को निकाल देने से इसका जीवन काल 8 माह तक हो सकता है तथा इतने समय तक आलू को भंडारित कर रखा जा सकता है। इस तकनीक को ‘ डिहाइड्रेषन आॅफ पोेेटेटो‘ कहा जाता है, जिसके लिए डाॅ. मेहता ने एक-एक मषीन बनायी है। इसमें आलू को पहले छीला जाता है फिर काटा जाता है तथा इसे सुखाया जाता है। यह सब मषीन में अपने आप हो जाता है, फिर भंडारण के लिए प्लास्टिक की थैलियों में पैक कर दिया जाता है। सब्जी बनाने में इस आलू का उपयोग करने से उपयुक्त होता है तथा इसका स्वाद ताजे आलू जैसा होता है। पैकिंग से पहले इसमें विटामिन सी और अन्य विटामिन बी, लौहा, जस्ता तथा खनिज मिलाया जाता है।
जलवायु की दृष्टि से आलू रबी की फसल है, किन्तु भंडार गृह या शीत गृह में भंडारण के कारण आलू पूरे वर्ष भर उपलब्ध रहता है, इसलिए आलू को ‘सदाबाहार सब्जी‘ कहा जाता है। जहां सिंचाई साधन हैं वहां आलू की खेती अवष्य की जाये। मिटटी में जल निकास की उचित व्यवस्था हो और भूमि में गोबर की खाद की प्रचुर मात्रा हो।

तालिकाः  भारत में आलू का क्षेत्रफल, उत्पादन एवं उत्पादकता

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स्त्रोत:   कृषि एवं सहकारिता विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली

अनुचिंतन

‘बैंकिंग चिंतन-अनुचिंतन‘ का अक्टूबर- दिसंबर 2014 अंक प्राप्त हुआ। ‘बैंकिंग कल आज और कल‘ विषेषांक में बैंक की विकासात्मक गतिविधियों के साथ अतीत और वर्तमान का परिदृष्य रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है तथा चुनौतियों को उजागर किया गया है। इस अंक के सभी लेख सारगर्भित, सामयिक और सराहनीय है। सामाजिक-आर्थिक विकास में बैंकों का महत्वपूर्ण योगदान है, जिसकी ज्वलंत तस्वीर बैंकिंग चिंतन-अनुचिंतन के माध्यम से शहरों-गांवों और घर-घर तक पहुंचती है। बैकिंग चिंतन-अनुचिंतन के संपादक एवं लेखकों को हार्दिक बधाई।

 डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र)प्रचार अधिकारी
इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय,
कृषि महाविद्यालय, रायपुर – 492012(छत्तीसगढ़)

फसलो की खेती से अधिक लाभ कैसे ?

 डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

फसलो  की  खेती  से  अधिक लाभ  कैसे ? - bhagchandra.com

‘ कृषिरेव महालक्ष्मीः।‘ अर्थात् कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिषत व्यक्ति खेती कर रहे हैं। भारत विकासषील देष है। भारत सबसे बड़ा चांवल निर्यातक देष है, जहां सबसे ज्यादा दूध और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है। आर्थिक सर्वेक्षण 2014-15 के अनुसार भारत की कृषि विकास दर पांच प्रतिषत रही है, जबकि आर्थिक विकास की दर 7.4 प्रतिषत रही है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान हर साल घटता जा रहा है। वास्तविकता यह है कि कृषि केवल जीवन का साधन बनकर रह गई है।
समय परिवर्तनषील है। कृषि का बाजारू दृष्टिकोण हो गया है, इसलिए बाजार की मांग के अनुरूप फसलों की खेती करनी होगी। नकदी और लाभकारी फसलों की खेती को बढ़ावा देना होगा। वैकल्पिक योजना बनाकर फसल-चक्र के अनुसार तरह-तरह की फसलों की खेती करनी होगी। भूमि और जलवायु के अनुसार फसलों की खेती करनी होगी। फसल विविधिकरण को अपनाना होगा, तब नियमित आमदनी प्राप्त होगी। ‘ कम लागत तकनीक‘ के उपयोग से खेती की लागत कम की जा सकती है तथा आमदनी बढ़ायी जा सकती है। अब ऐसा समय आ गया है कि किसान का बेटा किसान नहीं बनना चाहता । किसानों, ग्रामीणों, विषेषकर युवकों में कृषि के प्रति कम रूचि दिखायी देने लगी है। कृषि में पूंजी निवेष घटनेलगा है।  राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (National survey organization) के 59 वें सर्वेक्षण से ऐसी जानकारी मिली है कि भारत के 40 प्रतिषत किसान अब कोई और काम धंधा करना चाहते हैं।  खेत बटते जा रहे हैं।  कृषि जोत का आकार कम होता जा रहा है,  जिसके कारण लगभग 80 प्रतिषत कृषक परिवार सीमांत और लघु कृषकों की श्रेणी में आ गये हैं।

कृषि ‘उत्तम खेती‘ को चरितार्थ करे।ं कृषि लाभकारी व्यवसाय बने। इसके लिए भूमि, जल, बीज,उर्वरक, खाद, नियंत्रण एवं कर्षण विधियों, मानव-पषु श्रम तथा यां़ित्रक ऊर्जा को ऐसा जुटाना होगा कि अपेक्षित कृषि विकास दर प्राप्त हो सके। उन्नत तकनीक से लाभकारी फसलों, प्रजातियों की खेती करने पर लाभकारी व्यवसाय कृषि को बनाया जा सकता है।
लागत लाभ विष्लेषण
खेती से जुड़ी सम्पत्ति की सूचि (Inventory) लागत और लाभ की गणना की जाती है, जिसमें निम्नांकित जानकारी शामिल की जाती हैः

  • भूमि, मषीनों,पषुधन, भवन और प्रक्षेत्र के विभिन्न उत्पादों की जानकारी,
  • प्रक्षेत्र परिसम्पत्ति (।ेेमजे) की घिसावट की जानकारी,
  • प्रक्षेत्र के विभिन्न उत्पादों के विक्रय की जानकारी
  • प्रक्षेत्र में लाये गये आदानो ं(प्दचनजे) के खरीदने की जानकारी,

वर्तमान योजना और वैकल्पिक योजना में शुद्व लाभ

(प्रति प्रक्षेत्र रूपयों में)

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वैकल्पिक प्रक्षेत्र योजना
किसान चाहते हैं कि कम से कम लागत में अधिक से अधिक उत्पादन व आमदनी उन्हें मिले, इस आधार पर वे                          प्रत्येक फसल और सहायक व्यवसाय को ध्यान में रखकर अपनाते हैं, इनके आय-व्यय को ध्यान में रखते हैं, जैसे –

  • विभिन्न प्रकार की फसलों से वर्तमान में कितनी शुद्व आय प्राप्त होगी?
  •  यदि प्राप्त होने वाली शुद्व आय कम नजर आती है तो वह किस प्रकार इस आय को बढ़ा सकते हैं? आमदनी बढ़ाने के लिए वर्तमान प्रक्षेत्र योजना में सुधार किया जाता है और इसके स्थान पर वैकल्पिक योजना बनायी जाती है। वर्तमान योजना में निम्न परिवर्तन कर वैकल्पिक योजना बनायी जाती है।

(1) भूमि उपयोग की अच्छी विधियां अपनाना, जैसे – जल निकास आदि।
(2) लाभकारी फसल-चक्र अपनाना,
(3)सिंचाई की प्रभावी सुविधायें अपनाना,
(4)उर्वरकों की उपयोगिता बढ़ाना,
(5) पौध संरक्षण का आर्थिक दृष्टि से उपयोग करना,
वर्तमान योजना में सुधार के लिए एक या अधिक वैकल्पिक योजनायें बनायी जा सकतीं हैं, किन्तु इन योजनाओं मंे ये ऐसी योजना का चयन करना चाहिए, जिसमें अपेक्षाकृत लागत कम और शुद्व लाभ अधिक हो। वैकल्पिक प्रक्षेत्र योजना प्रक्षेत्र के साधनों के अनुरूप होनी चाहिए। रायपुर जिले के अभनपुर और तिल्दा विकास खण्ड के 28 नलकूपधारी कृषकों के सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि वर्तमान योजना और वेैकल्पिक योजना में भूमि का क्षेत्रफल बराबर होते हुये भी 5.90 हेक्टेयर क्षेत्र से 93000 रूप्ये का शुद्व लाभ प्राप्त हुआ है। वैकल्पिक योजना का मुख्य उददेष्य संसाधनों की उपलब्धता के अनुसार अधिक लाभ देने वाली फसलों की ख्ेाती को बढ़ावा देना है। तालिका में दर्षायी गई वैकल्पिक योजना में वर्तमान योजना की अपेक्षा डेढ़ गुना से अधिक शुद्व लाभ मिला है। वर्तमान योजना में लागत लाभ अनुपात केवल 1.00ः0.87 था, जो कि वैकल्पिक प्रक्षेत्र योजना में 1.00ः1.39 हो गया ।
फसलों की लागत

फसलोें की लागत के आंकलन के लिए श्रमिक, सामग्री, स्थिर लागत और कार्यषील पूंजी पर ब्याज की गणना की जाती है। भूमि की तैयारी, खाद-उर्वरक देने, बौआई करने या रोपा लगाने, अंतः कृषि, सिंचाई, पौध संरक्षण, कटाई,गहाई एवं उड़ावनी और परिवहन में परिवार के श्रमिकों की संख्या, किराये पर लगाये गये श्रमिकों की संख्या, पषु श्रम, मषीन, ऊर्जा की दर दर्षाकर श्रमिक लागत की गणना की जाती है, जबकि सामग्री लागत में बीज, गोबर की खाद, उर्वरक और पौध संरक्षण रसायनों की मात्रा और उनके भाव से कुल सामग्री की लागत निकाल ली जाती है। स्थिर लागत की गणना हेतु भूमि के किराये की अनुमानित राषि, भूमि का लगान और मूल्यांकन को शामिल किया जाता है, जबकि फसल की अवधि का कार्यषील पूंजी अर्थात् श्रमिक लागत और सामग्री की कुल लागत पर ब्याज लगाया जाता है।

कुल फसल लागत – श्रमिक लागत$ सामग्री लागत$स्थिर लागत$कार्यषील पूंजी पर ब्याज

फसल उत्पादन
विभिन्न फसलों का उत्पादन प्रायः क्विंटल में आंका जाता है। उत्पादन में मुख्य और सह उत्पाद होते हैं, जिनकी मात्रा का बाजार मूल्य से गुणा कर आमदनी निकाली जाती है।
फसल योजना (चार हेक्टेयर प्रक्षेत्र के लिए)
(1) फसलों के अंतर्गत रकवा 3.6 हेक्टेयर

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(2) प्रक्षेत्र अभिन्यास का क्षेत्र 0.4 हेक्टेयर
(3) फसल सद्यनता = फसलों के अंतर्गत कुल क्षेत्रफल x 100
शुद्व बोया गया क्षेत्रफल

                         = 6-90 x 100

                            3-60

                         = 191%

(4) स्थिर लागत
(अ) मूल्य ह्यस

  • पषुओं पर 10 प्रतिषत (रूपये 90000 पर) = 9000 रूपये
  •  यंत्रों पर 10 प्रतिषत (रूपये 75000 पर) = 7500 रूपये्र
  • मकान पर 2 प्रतिषत (रूपये 600000 पर) = 12000 रूपये
    (ब) भूमि का किराया त्र 30000 रूपये
    (स) भूमि का लगान त्र 600 रूपये
    ………………………
    (5) अनुमानित लागत और आमदनी टोटल- 59100 रूपये

    • …………………………..
    • .103

     

  • (6) कार्यषील पूंजी पर ब्याज (रूपये 417827 पर) =20891 रूपये
    (7) प्रक्षेत्र की कुल आय

 

(अ) फसलों से = 417827 रूपये

                                                       (ब) पषुधन से = 200000 रूपये

                                                                   योग = 617827 रूपये

(8) कुल लागत (अ) परिवर्तनषील लागत (188636+20891)
(ब) स्थिर लागत = 209597 रूपये
= 59100 रूपये
योग =268697रूपये
(9) शुद्व लाभ (617827-268697) =349130 रूपये
(10) लागत लाभ अनुपात            1-00%1-30

पौध संरक्षण हेतु उपयुक्त समय पर अनुषंसित दवा कारगर

 डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

पौध संरक्षण हेतु उपयुक्त समय पर अनुषंसित दवा कारगर - bhagchandra.com

कीटनाषकों ओैर कृषि रसायनों के उत्पादन में भारत का विष्व में चैथा स्थान हैः जहां 85 हजार टन कीटनाषक का उत्पादन होता है, जिसमें से 39 हजार टन की खपत होती है। वर्ष 2011-12 में 90 98 करोड़ रूप्ये मूल्य के कीटनाषकों, फफूंदनाषकों, खरपतवारनाषकों का निर्यात किया गया था, जबकि 13749 करोड़ रूप्ये के ये रसायन आयात किए गए थे। पौध संरक्षण दवाओं का दिनों-दिन फसलों में उपयोग बढ़ता जा रहा है, क्योंकि इनके उपयोग से फसलों के उत्पादन में बढौत्री होती है। खरपतवारनाषकों को डालने से 30 से 40 प्रतिषत, कीटनाषक डालने से 12 से 15 प्रतिषत और अन्य रसायन डालने से 25 से 30 प्रतिषत तक वृद्वि का अनुमान लगाया गया है।

कृषि रसायनों की खपत में सर्वाधिक मात्रा कीटनाषकों की होती है। विष्व में 44 प्रतिषत कीटनाषक, 30 प्रतिषत खरपतवारनाषक, 21 प्रतिषत फफूंदनाषक और शेष 5 प्रतिषत अन्य रसायन उपयोग किए जाते हैं। भारत में कृषि रसायनों की खपत में 76 प्रतिषत खरपतवारनाषकों और 1 प्रतिषत अन्य रसायनों का योगदान रहता है।

पत्रिका समाचार पत्र के अनुसार सर्वाधिक कीटनाषक पंजाब में डाले जाते हैं, उसके बाद उत्तर प्रदेष का क्रम आता है। कीटनाषकों का सबसे कम उपयोग छत्तीसगढ़ में किया जाता है। पंजाब, हरियाणा, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ क्षेत्र में एक ट्रेन बंटिण्डा से खाना होकर प्रतिदिन बीकानेर पहुंचती है, जिसका स्थानीय नाम ‘कैसर ट्रेन‘ पड़ गया है।

कहा जाता है कि डाल से चूके बंदर और वक्त से चूके किसान की स्थिति दयनीय हो जाती है। प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि ‘सब कुछ रूक सकता है, लेकिन खेती नहीं।‘ कृषि में समय पर बीज, उर्वरक, पौध संरक्षण सामग्री की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। समय पर कीटनाषक, फफूंदनाषक, खरपतवारनाषक उपलब्ध हों और उनकी निर्धारित मात्रा का सही तरीके से उपयोग किया जाए तो फसलें कीट-रोग से मुक्त हो सकेंगी और खेत में अनावष्यक पौधे अर्थात् खरपतवार भी कम हो जाएंेगें।

तालिका:-  भारत में कीटनाषकों की खपत 

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मेरा छत्तीसगढ़

1. डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

मेरा छत्तीसगढ़ - bhagchandra.com

                  ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।
सुन्दर है, छोटा है, प्यारा है, मेरा छत्तीसगढ़ महान।
यहां से फैली विष्व में सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान।
धान का यह कटोरा, है पूरे भारत की शान।

     जहां राजा मोरध्वज, वाणासुर ने शासन चलाये थे।
वहां माता शबरी की कुटिया में, राम ने बेर खाये थे।
मेरा छत्तीसगढ़ सचमुच प्राकृतिक संसाधनों की खान।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

       जहां जीवनदायिनी महानदी, अरपा, इंद्रावती, षिवनाथ।
वहां की अमीर धरती पर सब मिलकर रहते साथ।
जहां तक देखो । बस वहां दिखती है धान ही धान।
ऋषि मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

                27 जिले, एक दर्जन विष्वविद्यालय, यहां लघु भारत भिलाई।
कोरबा, बैलाडीला यहां है, कर रहे उद्योगों की भरपायी।
छत्तीसगढ़ की माटी के कण-कण में है भगवान।
र्ऋिष मुनियों की तपोस्थली, यह कौषल्या का जन्म स्थान।

नई कृषि नीति का संदेष 

2. डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

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हे किसान । देष की शान।
हमारा देष है कृषि प्रधान।
हमारा लक्ष्य कृषि उपज बढ़ाना।
यत्र तत्र सर्व्रत्र समृद्वि लाना।
नई कृषि नीति का संदेष।
विकसित बनाओ भारत देष।

बढ़ते जाओ सिंचाई का क्षेत्र।
व्यवसायिक बनाओ हर प्रक्षेत्र।
भूमि जलवायु के अनुसार करो
उन्नत तकनीक का विस्तार।
नई कृषि नीति का संदेष।
मिश्रित खेती अपनाओ विषेष।

दलहन-तिलहन और धान्य।
फसलों में हैं ये तीन महान।
फसल विविधिता को अपनाओ।
समग्र विकास कृषि से लाओ।
नई कृषि नीति का संदेष।
फलों-सब्जियों की खेती विषेष।

करो हरित क्र्र्रांति का विस्तार।
जिससे होगी गरीबी रेखा पार।
खेतांे में हरियाली लाओ।
गांवों में खुषहाली लाओ।
नई कृषि नीति का संदेष।
विकसित बनाओ भारत देष।

   

                                                      आदि पुरूष आदिवासी     

 

 

 

3.डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

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 धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरक, वन के वासी।
वनों के अंचल में बिखरे हैं भारत के गांव।
जहां ये त्यागी – वीर, कोसों चलते नंगे पांव।
बैगा, गांेड़, कोल, कोरकू इनका परिचय परिभाषी।
भीषण गर्मी-षीत के तपस्वी – ये आदिवासी।

जहां वन हैं – वहां इनकी जन्मभूमि हैं।
वनोपज देन जिनकी, व नही कर्मभूमि है।
करते हैं कड़ी मेहनत, कम कीमत पाते हैं।
खुद भूखे रहकर, दूसरों को खिलाते हैं।
ईमानदार भोले-भाले, ये सचमुच सन्यासी।
तन-मन के धनी हैं, ये आदिवासी।

अन्याय से मुक्ति हेतु इनका जीवन छटपटाता था।
शोषण से जिनका दिल कुछ घबड़ाता था।
तेंदूपत्ता, चिरौंजी, शहद से जुड़ा जब सहकार।
तब वनवासी विकास के खुज गये सब द्वार।
कर्तव्यों से बदल जायेगी, इनकी भाग्य राषि ।
क्रान्ति के अग्रदूत बनेंगे, ये वीर आदिवासी।

ये वन मार्गों के निर्माता, वन के प्रहरी हैं।
प्रकृति जिनकी सहेली, गाथा उनकी गहरी है।
स्वावलम्बी हैं सदियों से, ये प्रगति के अभिलाषी।
हे भारतीय संस्कृति के प्रेरकक, वन के वासी।
धन्य-धन्य हो ‘आदि‘ पुरूष आदिवासी।

हे किसान ! देष की शान

4.डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

हे किसान ! देष की शान।
खेती में तुम समर्पित,
तुम्हारा सारा जीवन दान।
तुम्हारी कड़ी मेहनत का
भू कण-कण करे बखान।
तुमसे उज्जवलित हो रहा,
खेत और खलिहान।

     हे किसान ! देष की शान।
तुम तो भूमि पुत्र हो,
है तुम्हारी महिमा महान्।
ताप-षीत का तुम्हें भय नहीं,
तुमसे तो प्रकृति डरती है।
अपार परिश्रम से तुम्हारे
देती अन्न धरती है।

हे किसान ! देष की शान।
परहित में तुम कर रहे
अपने तन का दान।
गूंज रही है चहुंदिषि
बस एक ही आवाज।
कृषि से ही होगी प्रगति
और खुषहाली आज।

    हे किसान ! देष की शान।
खेती है तुम्हारी सहेली,
फसलों में तुम्हारी जान् ।
तुम्हारी तपस्या से होगी,
खाद्य् समस्या समाधान््।
हे जन जीवन दाता किसान।
समृद्वि रहे तुझे वरदान।

कृषि उत्पादन में श्रेष्ठेता और कृषि कर्मण पुरस्कार

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012

कृषि उत्पादन में श्रेष्ठेता  और कृषि कर्मण पुरस्कार - bhagchandra.com

‘कृषिरेव महालक्ष्मीः‘ अर्थात कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 52 प्रतिषत व्यक्ति   खेती कर रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था विष्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत सबसे बड़ा चावल निर्यातक देष है, जो गेहूं,कपास का दूसरा बड़ा निर्यातवः भी हैं। भारत में सबसे ज्यादा दूध और उद्यानिकी फसलों का उत्पादन होता है। वर्ष 2013-14 में भारत खाद्यान्न के उत्पादन का अनुमान 26.3 करोड़ टन लगाया गया है, जब कि वर्ष 2012-13 में 25.53 करोड़ टन ,खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। वर्ष 2012-13 में भारत से 40 विलियन डालर मूल्य का कृषि निर्यात किया गया था, जो कि वर्ष 2013-14 में बढ़कर 45 बिलियन डालर हो गया है।
कृषि से सर्वांगीण विकास को साकार करने के लिए शासन द्वारा किसानोपयोगी योजनाएं चलायीं जा रहीं हैं, अनुदान दिया जा रहा है तथा प्रोत्साहन हेतु पुरस्कार दिये जा रहे हैं। वर्ष 2012-13 में कृषि उत्पादन में श्रेष्ठता के लिए विभिन्न वर्गों में पुरस्कार दिये गये हैं, किसानों-उत्पादकों को सम्मानित किया गया हैं। सकल खाद्यान्न उत्पादन, एक फसल और कुल उत्पादन में वृद्वि के आधार पर दिये गये ‘कृषि कर्मण पुरस्कारों, से अन्नदाता किसान गौरवान्वित हुए हैं।

तालिका:  कृषि उत्पादन में श्रेष्ठता के लिए कृषि कर्मण पुरस्कार, 2012-13

888छत्तीसगढ़ को चावल उत्पादन हेतु कृषि कर्मण पुरस्कार

10 फरवरी 2014 को नई दिल्ली के विज्ञान भवन में चांवल उत्पादन में श्रेष्ठता क ेलिए छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय कृषि कर्मण पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रदेष के कृषि मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल ने यह पुरस्कार राष्ट्रपति के हाथों प्राप्त किया। छत्तीसगढ़ को यह पुरस्कार लगातार दूसरी बार प्राप्त हुआ है। श्रीमति सुषीला गबेल (जिला-जांजगीर) और श्री भोलाराम साहू (जिला – धमतरी) को धान के श्रेष्ठतम उत्पादन के लिए पुरस्कृत किया गया।

छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है, जहां तरह-तरह की धान की किस्में है। प्रदेष के 27 जिलों की पहचान वहां पर विषेष रूप् से होने वाली सुगंधित धान की किस्मों से है। यह गर्व का विषय है कि यहां वर्ष 2013-14 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर राष्ट्रीय औसत से अधिक रही है। भारत में यह वृद्वि दर 4.47 प्रतिषत दर्ज की गई है, जबकि छत्तीसगढ़ में 7.05 प्रतिषत होने का अनुमान लगाया गया है। प्रदेष के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 22 प्रतिषत आंका गया है, यहां कृषि विकास के लिए पर्याप्त अवसर हैं।

 

समग्र कृषि विकास की राष्ट्रीय योजना-आत्मा

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
कृषि महाविद्यालय, रायपुर-492012

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‘कृषिरेव महालक्ष्मीः‘अर्थात कृषि ही सबसे बड़ी लक्ष्मी है। भारतीय अर्थ्रव्यवस्था की रीढ़ कृषि कहलाती है, जहां 49 प्रतिषत व्यक्ति  खेती कर रहें हैं। भारत विकासषील देष है। भारत सबसे वड़ा चावल निर्यातक देष है। वर्ष 2013-14 में 3792ण्2 करोड़ डालर का   कृषि निर्यात किया गया है, जिसमें 774.2 करोड़ डालर का चांवल निर्यात शामिल है। भारत में वर्ष 2013-14 में 26.3 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का अनुमान लगाया गया है, जबकि वर्ष 2012-13 में 25.53 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ था। भारत में सबसे ज्यादा दूध और बागवानी फसलों का उत्पादन होता है। वर्ष 2012-13 में यहां 13.24 करोड़ टन दूध का उत्पादन हुआ था। भारत में वर्ष 2013-14 में कृषि विकास की दर 4.6 प्रतिषत रही है। जबकि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 4.7 प्रतिषत रही है। सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान घटता जा रहा है। जो कि वर्तमान में घटकर 13.9 प्रतिषत रह गया है। कृषि केवल जीवन यापन का साधन बन कर रह गई है तथा प्रति व्यक्ति कुल आमदनी की दृष्टि से भारत का विष्व में 161 वां स्थान है।
समय परिवर्तनषील है। कृषि में नई-नई तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। बीज, उर्वरक, पौध संरक्षण सामग्री और श्रमिक व्यय दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। बौआई से लेकर कटाई- गहाई तक उपयुक्त समय पर श्रमिक नहीं मिलते हैं तथा वे अन्य व्यवसायों से कृषि की तुलना करते हुये मजदूरी मांगते है। कृषि मेें समय पर आदानों की उपलब्धता न होना एक बड़ी समस्या है। कृषि को लाभकारी व्यवसाय बनाने के लिए भारत सरकार और राज्य सरकारों द्वारा तरह -तरह की योजनाएं चलायीं जा रही हैं, जिनमें कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजंेसी (।हतपबनसजनतम ज्मबीदवसवहल डंदंहमउमदज ।हमदबल) अर्थात् ।ज्ड। आत्मा ऐसी योजना है, जो देष के 639 जिलों में संचालित की जा रही है। आत्मा ऐसी केन्द्र प्रवर्तित योजना है, जिसे वर्ष 2014-15 से राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रौद्योगिकी मिषन के सब मिषन एस.एम.ए.ई. में समाहित किया गया है। इसे सपोर्ट टू स्टेट एक्सटेंषन प्रोग्राम्स फाॅर एक्सटेंषन रिफाम्र्स भी कहा जाता है।

  • योजना के उददेष्य:-

1. कृषि प्रसार में शासकीय विभागों के साथ-साथ विभिन्न अषासकीय संस्थाओं, गैर शासकीय संगठनों, कृषि उद्यमियों की भागीदारी बढ़ाना।
2. कृषि और संबंधित विभागों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, कृषि अनुसंधान केन्द्रों में समन्वय स्थापित कर साथ-साथ कार्य करना तथा कृषि विकास की कार्य योजना तैयार करना।
3. समन्वित कृषि पद्वति (कृषि , उद्यानिकी, पषुपालन जैसे सहायक व्यवसायों को एक साथ अपनाना) अर्थात् कृषि पद्वति पर आधारित कृषि प्रसार सुनिष्चित करना।
4. कृषि विस्तार हेतु सामूहिक प्रयास करना। फसल या रूचि पर आधारित कृषकोें के समूह की उनकी जरूरत के अनुसार क्षमता विकसित करना।
5. अन्य विभागीय योजनाओं में विस्तार सम्बंधी प्रावधान न होने पर उसका एक्सटेंषन रिफाम्र्स योजना में समावेष करना।
6. महिला कृषकों को समूह के रूप् में संगठित करना और कृषि के क्षेत्र में उनकी क्षमता बढ़ाना।
7. किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और विस्तार कार्यकर्ताओं के बीच में बेहतर तालमेल स्थापित करना।

भारत में फसल उत्पादन (करोड़ टन) 

क्रमांक         फसल             2012-13                   2013-14
1.             धान                 10.524                   10.629
2.             गेहूं                  9.351                     9.585
3.            ज्वार                 0.528                     0.525
4.            बजरा                0.874                     0.919
5.            मक्का               2.226                     2.419
6.            मोटे अनाज         4.004                     4.268
7.            टरहर                0.302                    0.338
8.            चना                 0.883                    0.993
9.            उड़द                 0.190                    0.150
10.          मुंग                  0.119                    0.140
11           कुल दलहन         1.834                    1.957
12.          क्ुल खाद्यान्न   25.713                  26.438
13.          मूंगफली            0.469                    0.947
14.          राई एवं सरसों     0.803                     0.783
15.          सेयाबीन           1.466                     1.195
16.          क्ुल तिलहन     3.094                     3.241
17.          क्पास              3.422                     3.650
18.          जूट                1.093                     1.150
19.          गन्ना              34.120                   34.838

स्त्रोत:  प्रतियोगिता दर्पण, जुलाई 2014

  • योजना की विषेषताएं

– जमीनी स्तर से कार्य योजना तैयार करना तथा उसे प्रस्तुत करना।
– किसानों की जरूरत के अनुरूप् गतिविधियों का चयन करना तथा उन्हें क्रियान्वित
करना।
– कार्य योजना बनाने और उसके क्रियान्वयन में किसानों की भागीदारी बढ़ाना।
– कार्य प्रणाली में लचीलापन होना और निर्णय लेने की प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण
करना।
– एकल खिड़की प्रणाली द्वारा कृषि विस्तार करना।
– कृषि विस्तार सेवाओं को टिकाऊ बनाने के लिए हितग्राहियों से 5 से 10 प्रतिषत
हिस्सा प्राप्त करना।

  • रणनीति

-इसमें राज्य, जिला, विकास खण्ड और ग्राम स्तर पर विभिन्न विस्तार गतिविधियों का क्रियान्वयन किया जाता हैः

  • राज्य प्रकोष्ठ (State Nodel Cell

यह कृषि विभाग के अधीनस्थ कार्य करता है।  इस प्रकोष्ठ विभिन्न जिलों से  वार्षिक कार्य योजना (।ददनंस ।बजपवद च्संद) प्राप्त करता है, उसमें राज्य कृषक सलाहकार समिति (ैजंजम थ्ंतउमते ।कअपेवतल ब्वउउपजजमम) के सुझाओं को शामिल करता है, फिर राज्य कृषि विस्तार कार्य योजना (ैजंजम ।हतपबनसजनतम म्गजमदेपवद ।बजपवद च्संद) तैयार की जाती है।  इस कार्य योजना को प्रदेष की अंर्त-विभागीय कार्यकारी समूह (प्दजमत क्मचंतजउमदजंस ॅवतापदह ळतवनच) ओर भारत सरकार से अनुमोदन कराया जाता है।  इसके बाद कार्य योजना को क्रियान्वयन एजेंसी को अवगत कराया जाता है।  इसमें केन्द्र और राज्य सरकारों से राषि प्राप्त कर एजंेसी आत्मा को आबंटित की जाती है तथा योजना के क्रियान्वयन का अनुश्रवण और मूल्यांकन किया जाता है।

  • राज्य कृषि प्रषिक्षण संस्थान (ैजंजम ।हतपबनसजनतम ज्तंपदपदह प्देजपजनजम)

यह संस्था कृषि विस्तार से जुड़े शासकीय, निजी, गैर शासकीय संगठनों की प्रषिक्षण आवष्यकताओं का आंकलन करती है तथा प्रषिक्षण की वार्षिक कार्य योजना तैयार करती है, जिसके अनुसार राषि प्राप्त कर विभिन्न वर्गों के लिए प्रषिक्षण आयेजित करती है।  इसके अलावा परियोजना तैयार करने, परीक्षण, क्रियान्वयन एवं अनुश्रवण करने के लिए आवष्यक मार्गदर्षन दिया जाता है।  यह संस्था कृषि विस्तार को अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रबंधन तरीकों के विकास एवं उनके उपयोग को बढ़ावा देती है।

  • कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजंेसी (आत्मा)

आत्मा जिला स्तरीय संस्था है, जो किसानों तक कृषि विस्तार सेवाओं को पहुंचाती है।  इसमें सक्रिय योगदान देने वाले व्यक्ति सदस्य होते हैं।  भारत सरकार और राज्य सरकार से सीधे आत्मा को बजट मिलता है।  इसके अलावा सदस्यों से सदस्यता शुल्क और लाभान्वितों से कृषक अंष की राषि प्राप्त होती है।  कृषि एवं कृषि संबंधी तकनीक के व्यापक प्रचार-प्रसार की जवाबदारी आत्मा की होती है।  इसमें जिले के उप संचालक कृषि को परियोजना निदेषक और कृषि विज्ञान केन्द्र के कार्यक्रम समन्वयक को उप परियोजना निदेषक नामांकित किये जाते हैं।

  • गवर्निंग बोर्ड  (Governing Board)

यह बोर्ड जिला स्तर पर आत्मा की नीति तैयार करती है, प्रषासकीय एवं वित्तिय स्वीकृति देती है, क्रियान्वयन की समीक्षा करती है।  गवर्निंग बोर्ड  के अध्यक्ष कलेक्टर और सचिव परियोजना निदेषक होते हैं।

प्रबंधन समिति (Management Committee) 

यह आत्मा की कार्य योजना बनाती है  तथा गतिविधियों के क्रियान्वयन करती है, जिसमें आत्मा द्वारा जिले के कृषि एवं संबंधित विभागों जैसे-उद्यानिकी, पषुधन, मत्स्य, रेषम पालन, विपणन, कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि अनुसंधान केन्द्र, लीड बेैंक, गैर शासकीय संगठनों और कृषि से जुड़े विभिन्न संगठनों से सम्पर्क किया जाता है तथा इनमें समन्वय स्थापित किया जाता है।  इस समिति में जिले में कार्यरत इन विभागों के वरिष्ठ अधिकारी सक्रिय सदस्य होते हैं।  यह समिति प्रति माह बैठक का आयोजन करती है तथा प्रगति की समीक्षा करती है।  प्रबंधन समिति द्वारा प्रगति प्रतिवेदन तैयार कर राज्य प्रकोष्ठ को भेजा जाता है।

जिला कृषक सलाहकार समिति (District Farmers Advisory Committee)

इसमें अधिकतम 25 सदस्य होते हैं।  यह समिति किसानों की ओर से कार्य योजना बनाने और इसके क्रियान्वयन हेतु फीड बैक तथा आवष्यक सलाह गवर्निंग बोर्ड और प्रबंधन समिति को देती है।  इसमें सभी वर्ग के प्रगतिषील, पुरस्कृत कृषक सदस्य होते हैं, जो कि विभिन्न विकास खण्डों की कृषक सलाहकार समिति से नामांकित होते हैं।  इस समिति की बैठक प्रत्येक तीन माह मंे प्रायः प्रबंधन समिति की बैठक के पहले आयोजित की जाती ै।

  • विकास खण्ड तकनीकी दल (Block Technology Team

यह विकास खण्ड स्तर पर कृषि एवं संबंधित विभागों के अधिकारियों का दल होता है, जिसके द्वारा आत्मा की विभिन्न गतिविधियों की वार्षिक कार्य योजना बनाकर जिले की आत्मा को उपलब्ध कराती है तथा उसका विकास खण्ड में क्रियान्वयन करती है। इस तकनीकी दल को सहयोग के लिए विकास खण्ड तकनीकी प्रबंधक और सहायक तकनीकी प्रबंधक कार्यरत होते हैं, जो विभिन्न विभागों में समन्वय स्थापित कर गतिविधियों का क्रियान्वयन कराते हैं।

विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति  (Block Farmers Advisory Committee)

इसमें संबंधित विकास खण्ड के प्रगतिषील/पुरस्कृत कृषक, अभिरूचि समूहों/ कृषक संगठनों के प्रतिनिधि सदस्य होते हैं।  इसमें सदस्यों की संख्या 20 से 25 तक होती हैं।  इस समिति की बैठक प्रत्येक दो माह में होती है, जिसमें विकास खण्ड तकनीकी दल को किसानों की ओर से फीड बैक और सलाह दी जाती है।

  • कृषक मित्र (Farmer Frend)

प्रत्येक दो गांवों के बीच में एक कृषक मित्र नामांकित किया जाता है ।  कृषक मित्र प्रगतिषील कृषक होते हैं, जो कृषि प्रसार तंत्र और किसानों के बीच में महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं।  कृषक मित्र विभागीय योजनाओं, जानकारी को किसानों तक पहुंचाते हैं  तथा किसानों की समस्योओं के सम्बंध में किसान काल सेंटर से सुझाव लेते हैं।  प्रत्येक कृषक मित्र को रूप्ये 6000/-  प्रति वर्ष मानदेय दिया जाता है।

खाद्य सुरक्षा समूह (Food Security Group), कृषक अभिरूचि समूह (Farmer Interest Group), कमोडिटी अभिरूचि समूह (Commodity Interest Group)

खाद्य सुरक्षा समूह ;थ्ववक ैमबनतपजल ळतवनचद्धए कृषक अभिरूचि समूह ;थ्ंतउमत प्दजमतमेज ळतवनचद्धए कमोडिटी अभिरूचि समूह ;ब्वउउवकपजल प्दजमतमेज ळतवनचद्ध

प्रक्षेत्र विद्यालय(Farm School)

प्रगतिषील किसानों के माध्यम से अन्य किसानों तक कृषि तकनीक के प्रचार-प्रसार में प्रक्षेत्र विद्यालय अच्छे माध्यम है।

कृषि उद्यमी (Agriculture Entrepreneur)
गांवों में कृषि उद्यमी गुणवत्तापूर्ण कृषि आदान सामग्री एवं तकनीकी सलाह किसानों को उपलब्ध कराकर मदद करते हैं।

  • अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना
    जिल के चहुमुखी विकास के लिए कृषि की पंचवर्षीय योजना तैयार करना
    आत्मा का पहला कार्य है, इस योजना का कृषकों, ग्रामीणों की भागीदारी से बनाया जाता है। इस योजना में वर्तमान कृषि पद्वति की सूचनाओं का विष्लेषण, अनुसंधान और विस्तार का अंतराल तथा समय के अनुरूप कृषि पद्वति में परिवर्तन आदि शामिल होता है, जिसमें अनुसंधान एवं विस्तार की प्राथमिकतायें निर्धारित की जाती हैं। यह योजना जिले के कृषि विकास की आधार स्तम्भ होती है। इसमें कृषि अनुसंधान एवं विस्तार सम्बंधी जरूरतों की पूर्ति हेतु प्राथमिकता के अनुसार प्रत्येक वर्ष जिला वार्षिक कार्य योजना (क्पेजतपबज ।ददनंस ।बजपवद च्संद)बनाकर गतिविधियों का क्रियान्वयन किया जाता है। पांच वर्ष बाद इस कार्य योजना की समीक्षा की जाती है तथा शेष बचे हुये कार्योंे को शामिल कर आवष्यकतानुसार पुनः पंचवर्षीय कार्य योजना बनायी जाती है।
  • मुख्य गतिविधियां
    कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी द्वारा कृषक उन्मुखी, तकनीकी विस्तार, कृषक
    सम्पर्क और नवोन्मेषी गतिविधियों का संचालन किया जाता हैः

कृषक उन्मुखी
कृषक उन्मुखी गतिविधियों में अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना बनाना, कृषक समूह बनाना, महिला समूह बनाना, खाद्य सुरक्षा समूह बनाना, कृषक समूहों का प्रषिक्षण देना, प्रदर्षन डालना, शैक्षणिक भ्रमण और प्रक्षेत्र विद्यालय आदि शामिल हैं। इसके अलावा कृषकों की क्षमता बढ़ाने और तकनीकी के प्रचार-प्रसार में कृषकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता है। इसमें किसानों, कृषक समूहों, वैज्ञानिकों, विस्तार में लगे हुये अधिकारियों, कर्मचारियों और उत्कृष्ट आत्मा को पुरस्कृत किया जाता है।

 कृषि तकनीकी के प्रचार
कृषि तकनीकी के प्रचार -प्रसार हेतु किसान मेला,कृषि प्रदर्षनि का आयोजन किया जाता है तथा किसानोपयोगी साहित्य प्रकाषित       किया जाता है। सफलता की कहानी पर केंद्रित वीडियो फिल्में भी बनायी जाती है।

अनुसंधान-विस्तार कृषक सम्पर्क
कृषि अनुसंधान और विस्तार गतिविधियों से सम्पर्क स्थापित करने के लिए कृषकों और वैज्ञानिकों के बीच में परिचर्चा आयोजित की जाती है। कृषक गोष्ठी, प्रक्षेत्र भ्रमण और स्थानीय जरूरतों पर अनुसंधान किया जाता है।

नवोन्मेषी
इसमें गांवों, ग्राम पंचायतों में सूचना पटल लगाये जाते हैं। कम्युनिटी रेडियो स्टेषन स्थापित किये जाते हैं। मोबाइल – इंटरनेट, पाइको प्रोजेक्टर और कला जत्था द्वारा कृषि तकनीक का प्रचार-प्रसार किया जाता है।

  •  वित्तीय प्रावधान
    आत्मा योजना के वित्तीय प्रावधानों का लाभ सभी वर्गके किसानों को मिलता है
    किन्तु लद्यु-सीमांत और महिला कृषकों को लाभ हेतु प्राथमिकता दी जाती है।
    1. कृषक प्रषिक्षण
    अ. अंतर्राज्यीय – प्रति कृषक प्रतिदिन रूपये 1250 की दर से औसत 50 मानव दिवस
    प्रति विकास खण्ड ।
    ब. राज्य के अंदर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूपये 1000 की दर से औसत 1000 मानव
    दिवस प्रति विकास खण्ड।
    स. जिले के अन्दर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 400 या 250 रूप्ये की दर से औसत
    1000 मानव दिवस प्रति विकास खण्ड।
    2. प्रदर्षन
    अ. कृषि – प्रति प्रदर्षन 0.40 हेक्टेयर क्षेत्र हेतु रूप्ये 3000/- धान, गेंहूं,दलहन -तिलहन एवं मक्का हेतु रूप्ये 2000 की दर से औसत 125 प्रदर्षन प्रति विकास खण्ड ।
    ब. उद्यानिकी, प्षुपालन, मत्स्य पालन,रेषम पालन-प्रति प्रदर्षन रूप्ये 4000 की दर से औसत 50 प्रदर्षन प्रति विकास खण्ड।
    3. शैक्षणिक भ्रमण
    अ. अंतर्राज्यीय – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 800 की दर से औसत 5 कृषक प्रति
    विकास खण्ड।
    ब. राज्य के अंदर – प्रति कृषक प्रतिदिन रूप्ये 400 की दर से औसत 25 कृषक प्रति
    विकास खण्ड।

4. क्षमता विकास एवं कौषल उन्नयन
कृषक समूहों की क्षमता विकास हेतु रूप्ये 5000 प्रति समूह प्रति वर्ष
तथा अधिकतम लक्ष्य 20 समूह प्रति विकास खण्ड प्रति वर्ष।

कृषक प्रषिक्षण, प्रदर्षन, शैक्षणिक भ्रमण और क्षमता विकास के लिए आयोजन हेतु सामान्य कृषकों से 10 प्रतिषत तथा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन-जाति और महिला कृषकों से 5 प्रतिषत कृषक अंष लिया जाता है। इन कार्यक्रमों में न्यूनतम 30 प्रतिषत महिलाओं की भागीदारी अनिवार्य है।

5. खाद्य सुरक्षा समूह
इसमें प्रति विकास खण्ड न्यूनतम दो खाद्य सुूरक्षा समूह प्रति वर्ष गठित करने का प्रावधान है, जिसके लिए प्रति समूह रूप्ये 10000 निर्धारित हैं।
6. कृषक पुरस्कार
कृषि, उद्यानिकी, पषुपालन, मत्स्य पालन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कृषकों को प्रति वर्ष पुरस्कृत किया जाता हैः
अ. राज्य स्तर पर – 10 उत्कृष्ट कृषकों को, 50 हजार रूप्ये प्रति कृषक का
पुरस्कार।
ब. जिला स्तर पर – 10 उत्कृष्ट कृषकों को, 25 हजार रूप्ये प्रति कृषक का
पुरस्कार।
स. विकास खण्ड स्तर पर – 5 उत्कृष्ट कृषकों को, 10 हजार रूप्ये प्रति कृषक
का पुरस्कार ।
7. कृषक समूह पुरस्कार
कृषि, उद्यानिकी, प्षुपालन, मत्स्य पालन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले कृषक समूहों को जिला स्तर पर पुरस्कृत करने का प्रावधान है, जिसमें प्रति वर्ष पांच कृषक समूहों को 20 हजार रूप्ये प्रति समूह की दर से पुरस्कृत किया जाता है। इसमें प्रत्येक जिले से प्रति वर्ष पांच कृषक समूह पुरस्कृत किये जाते हैं।
8. फार्म स्कूल
क्षेत्र विषेष में पारंगत विषेषज्ञ कृषक द्वारा अपने क्षेत्र के 25 प्रषिक्षणर्थी कृषकों तक तकनीकी हस्तांतरण का प्रावधान है। फार्म स्कूल के लिए हर स्कूल को रूप्ये 29414 दिये जाते हैं।
9. कृषक – वैज्ञानिक परिचर्चा
प्रगतिषील या जिला कृषक सलाहकार समिति और विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति के सदस्यों के लिए वैज्ञानिक परिचर्चा आयोजित की जाती है, जिसमें उन्नत कृषि तकनीक की जानकारी दी जाती है तथा रणनीति बनायी जाती है। यह परिचर्चा प्रत्येक जिले में खरीफ और रबी के पहले आयोजित की जाती है, जिनकी खरीफ और रबी में एक-एक संख्या होती है।
10. किसान गोष्ठी/प्रक्षेत्र दिवस
आत्मा द्वारा प्रति वर्ष प्रत्येक जिले में खरीफ और रबी में किसान गोष्ठी, प्रक्षेत्र दिवस का आयोजन किया जाता है।
11. विकास खण्ड कृषक सलाहकार समिति की बैठक
इस समिति की बैठक प्रत्येक दो माह के अंतराल में विकास खण्ड में आयोजित की जाती हेै, जिसमें कृषि और सम्बंधित विभागों के अधिकारी भाग लेते हैं। वर्ष में इन बैठकों की संख्या छै होती है।
12. जिला कृषक सलाहकार समिति की बैठक
इस समिति की बैठक वर्ष में चार बार होती है।
13. कृषक मित्र
प्रत्येक दो गांव के बीच में एक कृषक मित्र बनाया जाता है, जिसका चयन ग्राम सभा द्वारा किया जाता है। कृषक मित्र को प्रति वर्ष 6000 रूप्ये देने का प्रावधान है।

  • गतिविधियों के क्रियान्वयन में पारदर्षिता
    प्रत्येक विकास खण्ड की सभी ग्राम पंचायतों को क्रमिक रूप से लाभ दिलाने का लक्ष्य आत्मा का होता है, जिसमें लगभग 50 प्रतिषत हितग्राही लद्यु और सीमांत कृषक और 30 प्रतिषत महिला कृषक का प्रावधान है। इसमंे सभी वर्ग के किसानों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में लाभ की पात्रता होती है। कृषक सलाहकार समिति और ग्राम पंचायत की अनुषंसा के अनुसार आत्मा में हितग्राहियों का चयन किया जाता है, जिसमें किसी भी किसान को एक जैसा लाभ दो बार न मिले, इसका ध्यान रखा जाता है।

आत्मा का संचालन मंडल 

जिला कृषक सलाहकार समिति विकास खण्ड कृषक सलाहकार समितिजिला कृषक सलाहकार समिति विकास खण्ड कृषक  सलाहकार समिति

3
जिला कृषक सलाहकार समिति विकास खण्ड कृषक  सलाहकार समिति

55

 

विकास खंड तकनीकी दल (Block Technical Team)

 

66

 

संचालन मण्डल के कार्य(Functions of Governing Board)

– आत्मा की समस्त इकाईयों की वार्षिक कार्य योजना और अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना
की समीक्षा करना एवं अनुमोदन करना।
– जिले में संबंधित विभागों द्वारा आयोजित अनुसंधान एवं विस्तार गतिविधियों की प्रगति की समीक्षा
करना एवं जरूरी दिषा-निर्देष देना।
– जिले में संचालित होने वाली अनुसंधान एवं विस्तार गति-विधियों के लिए राषि आबंटन करना।
– कृषक अभिरूचि समूह तथा कृषक संगठनों के गठन एवं उनके विकास को बढ़ावा देना।
– किसानों को आदानों के लिए तकनीकी मदद देना, कृषि प्रसंस्करण एवं विपणन सुविधायें देने के
लिए निजी क्षेत्रों, कृषि उद्यमियों, संगठनों की भागीदारी बढ़ाना।
– संसाधन विहीन, सीमांत कृषकों, अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति एवं महिला कृषकों को पूंजी
उपलब्ध कराने के लिए वित्तीय संस्थाओं को प्रोत्साहित करना।
– कृषक सलाहकार समिति गठित करना। अनुसंधान एवं विस्तार हेतु संबंधित विभाग जैसे-कृषि,
कृषि विज्ञान केन्द्र, कृषि अनुसंधान केन्द्र को प्रोत्साहन देना।
– जिले में कृषि विकास गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए अनुबंध करना।
– आत्मा की इकाईयों को कार्यषील और वित्तीय रूप् से सक्षम बनाने के लिए अन्य स्त्रोतों की
पहचान करना।
– विभिन्न योजनाओं एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में तालमेल रखना।
– आत्मा की प्रत्येक इकाई के लिए चक्रीय राषि (त्मअवसअपदह थ्नदक), खाता खोलने और
किसानों को तकनीकी
सुविधायें जैसे – मिटटी परीक्षण, पषुओं मंे कृत्रिम गर्भाधान आदि उपलब्ध कराने हेतु प्रोत्साहन
देना।
– आत्मा के वित्तीय अभिलेखों का निर्धारित समय में अंकेक्षण कराना।
– संचालन मण्डल की बैठक हर तीन महीने में या जरूरत पड़ने पर अधिक बार कराना।
– ऐसे कार्य, जो आत्मा के प्रभावी संचालन हेतु सहायक हों, किये जायेंगे।

  • प्रबंध समिति के कार्य (Functions of Management Committee)

– सामाजिक-आर्थिक समूहों और किसानों की समस्याओं को जानने के लिए समय-समय पर
सहभागी ग्रामीण मूल्यांकन (च्ंतजपबपचंजवतल त्नतंस ।चचतंपेंस) करना।
– कृषि और संबंधित विभागों, कृषि विज्ञान केन्द्रांे की रणनीति कार्य योजना तैयार करना, जिसमें
लघु एवं मध्यम अवधि के लिए अनुसंधान परीक्षणों द्वारा कृंिष तकनीक और कृषि विस्तार
गतिविधियों का उल्लेख होना चाहिए।
– जिला कृषक सलाहकार समिति की सलाह से जिले की वार्षिक कृषि कार्य योजना तैयार करना
तथा उसे संचालन मंडल को समीक्षा हेतू प्रस्तुत करना। प्राप्त सुझावों के बाद वार्षिक कृषि
कार्य योजना में जरूरी संषोधन करना एवं अनुमोदन प्राप्त करना।
– कृषि एवं संबंधित विभागों, क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्रों, कृषि विज्ञान केन्द्रों, गैर शासकीय
संगठनों, कृषि अभिरूचि समूहों, कृषक संगठनों एवं अन्य संस्थानों के बीच समन्वय स्थापित करना
एवं कार्य योजना का क्रियान्वयन कराना।
– व्यय के अंकेक्षण के लिए परियोजना का लेखा-जोखा संधारण करना।
– गांव और विकास खण्ड स्तर पर कृषि विस्तार एवं तकनीकी हस्तांतरण गतिविधियों के समन्वय हेतु
व्यवस्था करना, जैसे- कृषि सूचना एवं सलाह केन्द्र की स्थापना।
– निर्धारित लक्ष्यों एवं उपलब्धियों की समय-समय पर प्रगति की रिपोर्ट बनाना तथा उसे संचालन
मण्डल के माध्यम से राज्य नोडल प्रकोष्ठ और भारत सरकार के कृषि एवं सहकारिता विभाग को
उपलब्ध कराना।
– संचालन मंडल सचिवालय की तरह कार्य करना और नीतिगत एवं संचालन मंडल द्वारा लिये गये
निर्णय के अनुसार कार्य करना।
– प्रबंधन समिति के सदस्य प्रत्येक माह बैठक कर विकास खण्डों की प्रगति की समीक्षा करेंगे।
राज्य नोडल प्रकोष्ठ और भारत सरकार के कृषि एवं सहकारिता विभाग को प्रतिवेदन प्रस्तुत करेंगे।
– सभी संबंधित विभागों में आत्मा उनकी संस्था होने की भावना जागृत करेंगे। इसके लिए टीम
भावना विकसित की जोयेगी। समिति की बैठक गोलमेज (त्वनदक ज्ंइसम) में आयोजित की
जायेगी, जिससे सभी सदस्य स्वयं को परियोजना निदेषक के समकक्ष महसूस करेगा। बैठक हर
बार अलग-अलग सहयोगी विभागों के कार्यालय में आयोजित होने से आत्मा के कार्यों में अपनत्व
का विकास होगा।
– प्रबंधन समिति के प्रत्येक सदस्य को विकास खण्ड तकनीकी दल के कार्याें की प्रगति की समीक्षा
का दायित्व दिया जाये, चाहे वह किसी भी सम्बंधित विभाग का अधिकारी हो।
– प्रबंधन समिति की बैठक में विकास खण्ड स्तर की समीक्षा हेतु विकास खण्ड तकनीकी दल के
समन्वयक को बुलाया जाये।

  •  विकास खण्ड तकनीकी दल के कार्य

– प्रत्येक विकास खण्ड में अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना का क्रियान्वयन एवं किसानों को
एकल खिड़की प्रणाली द्वारा कृषि विस्तार सुविधायें उपलब्ध कराना।
– अनुसंधान एवं विस्तार की कार्य योजना बनाने में जिला स्तरीय कोर टीम की मदद करना।
– विकास खण्ड में लिये जाने वाली विस्तार गतिविधियों को शामिल कर वार्षिक कार्य योजना
बनाना।
– वार्षिक कार्य योजना में उल्लेख किये गये विस्तार कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में समन्वय स्थापित
करना।
– गांव एवं विकास खण्ड स्तर पर खाद्य सुरक्षा समूह, कृषक अभिरूचि समूह, कमोडिटी अभिरूचि
समूह और कृषक संगठन का गठन करना एवं उन्हें कार्यषील बनाना।
– विकास खण्ड स्तर की कृषि समस्यायें, सूचनायें, जानकारी प्रबंधन समिति को देना।
– कृषि एवं संबंधित क्षेत्रों द्वारा फार्म स्कूल की कार्य योजना बनाना एवं उसके क्रियान्वयन में मदद
करना।
– प्रत्येक माह विकास खण्ड तकनीकी दल की बैठक आयेाजित करना तथा प्रगति की समीक्षा
करना। प्रगति से प्रबंधन समिति को अवगत कराना।

  • कृषक मित्र के कार्य– खाद्य सुरक्षा समूह, कृषक अभिरूचि समूह और कमोडिटी अभिरूचि समूह का गठन करना एवं
    उन्हें कार्यषील बनाना।
    – गांव में अनुसंधान एवं विस्तार की रणनीति कार्य योजना बनाने, फसल प्रदर्षन और किसान
    गोष्ठी के आयोजना में मदद करना ।
    – विकास खण्ड तकनीकी प्रबंधक, सहायक तकनीकी प्रबंधक और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी
    के साथ में क्षेत्र का भ्रमण करना तथा किसानों से प्राप्त फीडबेैक उन्हें उपलब्ध कराना।
    – ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, जिले और विकास खण्ड की बैठकों में भाग लेना।
    – विभिन्न गतिविधियों की देैनंदिनी बनाना।
    – विकास खण्ड तकनीकी दल कृषक सलाहकार समिति के सदस्यों, विकास खण्ड तकनीकी
    प्रबंधक, सहायक तकनीकी प्रबंधक और ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी से नियमित सम्पर्क बनाये
    रखना।
    – प्रक्षेत्र विद्यालय की पूर्ण जानकारी रखना तथा विद्यालय की कक्षाओं में शामिल होना।
    – कृष् िएवं संबंधित विभागों की योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना। गांव की तकनीकी समस्याओं,
    बाधाओं को चिन्हांकित कर वरिष्ठ कार्यालयों, विस्तार कार्यकर्ताओं को अवगत कराना।
    – कृषि आदान एवं विभिन्न योजनाओं की जानकारी किसानों को उपलब्ध कराना।
    – समय-समय पर विकास खण्ड तकनीकी दल, कृषक सलाहकार समिति, विस्तार अधिकारियों
    द्वारा गये कार्यों का निर्वहन करना।777
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