छत्तीसगढ़ में जल संसाधन और कृषि विकास

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रामराज्य का कौषल प्रदेष तथा भारत का 26वां प्रदेष छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है। यहां उपजाऊं जमीन है। जंगल है। रत्नगर्भा धरती हैं। दुर्लभ जैव विविधता है। महानदी, इन्द्रावती, षिवनाथ, अरपा, खारून जैसी जीवनदायिनी नदियां है। यहां 1041, सिंचाई जलाषय और 36 हजार से अधिक ग्रामीण तालाब हैं अर्थात छत्तीसगढ़ में सतही जल और भू-जल अधिक है, यहां ऊपर पानी है और नीचे पानी हैं- बस जरूरत ह ैजल संसाधनों के दोहन की। छत्तीसगढ़ अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। जहां तरह-तरह की भूमि है। जलवायु है। महान दार्षनिक टालस्टाय ने लिखा है कि महानदी की रेत में हीरे पाये जाते हैं। यहां हीरा बाक्साईट, लौह अयस्क कोयला चूना डोलोमाइट, टिन, कोरण्डम तथा क्वार्टजाईट जैसे खनिजों के दोहन से राजस्व की भारी राषि प्राप्त होती है। छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है, जहां सिंचाई क्षेत्र में बड़ी विसंगति है।
छत्तीसगढ़ का कुल भोैगोलिक क्षेत्रफल 137.89 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से केवल 46.71 लाख हेक्टेयर में फसलों की खेती की जा रही है। इस प्रदेष में धान की खेती अधिकांष क्षेत्र में की जाती है, जबकि यहां की जलवायु दलहन-तिलहन -फल-सब्जी तथा नकदी फसलों के लिए उपयुक्त है।
जलाषयों और तालाबों का प्रदेषः
छत्तीसगढ़ में 1041 जलाषय हैं, जिनमें माड़म सिल्ली, दुधावा, रविषंकर सागर, सोंढूर प्रमुख हैं। प्रदेष में 36844 सिंचाई तालाब हैं। तालाबों प्रदेष छत्तीसगढ़ कहलाता है। जलाषयों और तालाबों का समुचित दोहन कर यहां एक फसली क्षेत्र को बहुफसली में बदला जा सकता है।
सामूहिक उद्वहन योजनाः
किसानों ने सिंचाई की उपयोगिता को समझते हुये सामूहिक उद्वहन योजना को अपनाया है, जिससे खरीफ के अलावा रबी और जायद में फसलों का क्षेत्र बढ़ा है। फसलों की उत्पादकता में वृद्वि हुई है तथा कृषि विकास में अपेक्षित सफलता मिली है।
फसलों की उत्पादकता मंे वृद्वि:
छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के तिल्दा और अभनपुर विकास खण्ड के कृषकों के सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि किसानों को सब्जी वाली फसलों से अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक आमदनी मिलती है।

 

 


स्त्रोत: कृषि विभाग, छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर, 2013

 

तिल्दा और अभनपुर विकास खण्ड में भटा की खेती से क्रमषः 50 हजार रूप्ये तथा 45.5 हजार रूपये प्रति हेक्टेयर आमदनी प्राप्त हुई है जबकि धान में यह आमदनी 14 हजार रूपये से लेकर 17 हजार रूपये तक प्राप्त हुई है। जायद मंे की गई धान की सिंचित खेती में खरीफ धान की अपेक्षा अधिक आय प्राप्त हुई है। जायद में भटा, भिण्डी की अपेक्षा धान की कम आमदनी आंकी गई है।

 

सिंचाई:

प्रदेष में केवल 31 प्रतिषत क्षेत्र मंे सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। जहां शून्य से लेकर 87 प्रतिषत तक सिंचाई का क्षेत्रफल विभिन्न जिलों में उपलब्ध है। यहां सिंचाई के क्षेत्र में बड़ा अंतर नजर आता है। छत्तीसगढ़ में अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, जहां जल संसाधनों के प्रबंधन हेतु प्रभावी जल नीति बनायी जानी चाहिए।

प्रदेष में जहां सिंचाई साधन उपलब्ध हैं:- वहां अधिक आमदनी देने वाली फसलों की खेती को अपनाया जाये। सदियों से दाल-भात का सम्बंध रहा है, जहां धान की खेती की जाती है-वहां दलहन की खेती अवष्य की जानी चाहिए।
प्रदेष मंे अधिकांष क्षेत्र में सिंचाई नहरों द्वारा की जाती है, जहां जल के वितरण और नहरों के रखरखाव पर ध्यान देने की आवष्यकता है। जल वितरण में किसानों की भागीदारी सुनिष्चित की जानी चाहिए।
जल-चक्र को बनाये रखने के लिए जंगलों के विनाष को रोका जाये तथा वन क्षेत्र में वृक्षारोपण किया जाये।
नलकूप, कुंआ निर्माण हेतु छत्तीसगढ़ शासन के कृषि विभाग में एक पृथक प्रकोष्ठ (ैमचंतंजम ब्मसस) बनाया जाये, जिससे किसानों को कूप, नलकूप खनन की कार्यवाही में सरलता हो।

प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय,
कृषि महाविद्यालय,कृषक नगर,
रायपुर 492012 (छत्तीसगढ़)

छत्तीसगढ़ के बजट में कृषि को प्राथमिकता

  • डाॅ. भागचन्द्र जैन
    प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
    कृषि महाविद्यालय,रायपुर-492012
    (छत्तीसगढ़)

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                                                  रामराज्य का कौषल प्रदेष तथा भारत का 26 वां प्रदेष छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, क्या नहीं है हमारे छत्तीसगढ़ में ? उपजाऊ जमीन है। जंगल है। रत्न-गर्भा धरती है। दुर्लभ जैव विविधता है। महानदी, इन्द्रवती, षिवनाथ, अरपा, खारून जैसी जीवनदायिनी नदियां है। यहां 1041 सिंचाई जलाषय और 36844 तालाब हैं अर्थात यहां सतही जल और भू-जल अधिक है। यहां ऊपर पानी है और नीचे पानी है- बस जरूरत है इन संसाधनों के दोहन की। छत्तीसगढ़ अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। प्रदेष में भाटा, मटासी, डोरसा, कन्हार तरह-तरह की भूमि हेै। तरह-तरह की जलवायु है। महान दार्षनिक टालस्टाय ने लिखा है कि महानदी की रेत में हीरे पाये जाते हैं। हीरा, वाक्साईट,लौह अयस्क, कोयला, चूना, डोलामाईट, टिन, कोरण्डम तथा क्वार्टजाइट जैसे खनिजों के दोहन से राजस्व की भारी राषि प्राप्त होती है।

छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है, यहां की संस्कृति धान से जुड़ी है। प्रदेष वर्ष 2015-16 का बजट 13 मार्च 2015 को प्रस्तुत किया गया, जिसमें 65 हजार करोड़ रूप्ये का प्रावधान है। बजट में कृषि के लिए 10676 करोड़ रूप्ये आबंटित किये गये हैं, जबकि वर्ष 2014-15 में कृषि के लिए 8495 करोड़ रूप्ये रखे गये थे। कृषि एवं उद्यानिकी, पषुपालन, सहकारिता, सिंचाई, कृषि पम्प अनुदान के लिए आबंटित राषि इस प्रकार हैः

सकल घरेलू उत्पाद
छत्तीसगढ़ में वर्ष 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 13.20 प्रतिषत रहने का अनुमान लगाया गया है, जबकि भारत में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्वि दर 11.59 प्रतिषत होने का अनुमान लगाया गया है। प्रदेष में कृषि की विकास दर 14.18 प्रतिषत आंकी गई है, जिसमें कृषि के साथ-साथ सहयोगी व्यवसाय पषुपालन, वानिकी, मत्स्य आदि शामिल हैं। उद्योग की विकास दर 10.62 प्रतिषत होने का अनुमान लगाया गया है, जिसमें खनिज, निर्माण, मेनुफेक्चुरिंग, विद्युत, गैस और जल आपूर्ति को शामिल किया गया है। सेवा क्षेत्र की विकास दर का अनुमान 15.21 प्रतिषत लगाया गया है। वर्ष 2014-15 में प्रदेष में प्रति व्यक्ति आय 64442 रूप्ये होने का अनुमान लगाया गया है, जो कि वर्ष 2013-14 में 58547 रूपये थी।

मुख्य प्रावधान

  •  प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए 30 करोड़ रूप्ये
  • 20 नये पषु औषधालय
  • अरपा, भैंसाझार परियोजना के लिए 201 करोड़ रूपये
  • 92 मध्यम -लद्यु सिंचाई योजनाओं के लिए 97 करोड़ रूप्ये
  •  सिंचाई के लिए खारून विकास प्राधिकरण की स्थापना
  •  पषु चिकित्सा विष्वविद्यालय के लिए 60 करोड़ रूप्ये
  •  इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय, रायपुर में चार नये विषयों की शुरूआत
  •  जैविक उर्वरक एवं कीटनाषकों की गुणवत्ता सुनिष्चित करने के लिए रायपुर में बायो कंट्रोल प्रयोगषाला की स्थापना
  • दुर्ग की तांदुल नहर परियोजना की लाइनिंग के लिए 28 करोड़ रूप्ये
  • पंडरिया में नये शक्कर कारखाने की स्थापना
  • रायगढ़ जिले की केलो सिंचाई परियोजना के तहत नहर निर्माण के लिए 30 करोड़ रूप्ये
  • ब्याज मुक्त अल्पकालीन कृषि ऋण के लिए 158 करोड़ रूपये

छत्तीसगढ़ के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 22 प्रतिषत आंका गया है, जबकि औद्योगिक और सेवा क्षेत्र का योगदान क्रमषः 38 और 40 प्रतिषत रहा है। यहां कृषि विकास के लिए प्र्याप्त अवसर हैं। प्रदेष में तरह-तरह की धान की किस्में हैं, जहां 27 जिलों की पहचान वहां होने वाली सुगंधित धान की किस्मो से है। बजट में कृषि को प्राथमिकता दी गई है। छत्तीसगढ़ का मैदान, उत्तरी पहाड़ी क्षेत्र और बस्तर का पठार तीन कृषि जलवायु क्षेत्र है – जहां दलहन-तिलहन, फल-सब्जी की खेती सीमित क्षेत्र में की जाती है। बजट में कृषि-उद्यानिकी-पषुपालन की योजनाओं, कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी गई है, जिनका लाभ लेकर कृषक, पषुपालक, सब्जी-फल उत्पादक खाद्य सुरक्षा सुनिष्चित कर सकते हैं तथा प्रदेष में दूसरी हरित क्रांति का बिगुल बजा सकते हैं।

छत्तीसगढ़ में जल संसाधन और कृषि विकास

डॉ. भागचन्द्र जैन

      रामराज्य का कौषल प्रदेष तथा भारत का 26वां प्रदेष छत्तीसगढ़ प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है।  यहां उपजाऊं जमीन है।  जंगल है।  रत्नगर्भा धरती हैं। दुर्लभ जैव विविधता है।  महानदी, इन्द्रावती, षिवनाथ, अरपा, खारून जैसी जीवनदायिनी नदियां है।  यहां 1041, सिंचाई जलाषय और 36 हजार से अधिक ग्रामीण तालाब हैं अर्थात छत्तीसगढ़ में सतही जल और भू-जल अधिक है, यहां ऊपर पानी है और नीचे  पानी हैं- बस जरूरत ह ैजल संसाधनों के दोहन की।  छत्तीसगढ़ अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है।  जहां तरह-तरह की भूमि है।  जलवायु है।  महान  दार्षनिक टालस्टाय ने लिखा है कि  महानदी की रेत में  हीरे  पाये   जाते हैं। यहां हीरा बाक्साईट, लौह अयस्क कोयला चूना डोलोमाइट, टिन, कोरण्डम तथा क्वार्टजाईट जैसे खनिजों के दोहन से राजस्व की भारी राषि प्राप्त होती है।  छत्तीसगढ़ धान का कटोरा कहलाता है, जहां सिंचाई क्षेत्र में बड़ी विसंगति है।

छत्तीसगढ़ का कुल भोैगोलिक क्षेत्रफल 137.89 लाख हेक्टेयर है, जिसमें से केवल 46.71 लाख हेक्टेयर में फसलों की खेती की जा रही है। इस प्रदेष में धान की खेती अधिकांष क्षेत्र में की जाती है, जबकि यहां की जलवायु दलहन-तिलहन -फल-सब्जी तथा नकदी फसलों के लिए उपयुक्त है।

जलाषयों और तालाबों का प्रदेषः
छत्तीसगढ़ में 1041 जलाषय हैं, जिनमें माड़म सिल्ली, दुधावा, रविषंकर सागर, सोंढूर प्रमुख हैं।  प्रदेष में 36844 सिंचाई तालाब हैं। तालाबों प्रदेष छत्तीसगढ़ कहलाता है।  जलाषयों और तालाबों का समुचित दोहन कर यहां एक फसली क्षेत्र को बहुफसली में बदला जा सकता है।

सामूहिक उद्वहन योजनाः
किसानों ने सिंचाई की उपयोगिता को समझते हुये सामूहिक उद्वहन योजना को अपनाया है, जिससे खरीफ के अलावा रबी और जायद में फसलों का क्षेत्र बढ़ा है।  फसलों की उत्पादकता में वृद्वि हुई है तथा कृषि विकास में अपेक्षित सफलता मिली है।

फसलों की उत्पादकता मंे वृद्वि:
छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले के तिल्दा और अभनपुर विकास खण्ड के कृषकों के सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि किसानों को सब्जी वाली फसलों से अन्य फसलों की अपेक्षा अधिक आमदनी मिलती है।

 

 

 

तिल्दा और अभनपुर विकास खण्ड में भटा की खेती से क्रमषः 50 हजार रूप्ये तथा 45.5 हजार रूपये प्रति हेक्टेयर आमदनी प्राप्त हुई है जबकि धान में यह आमदनी 14 हजार रूपये से लेकर 17 हजार रूपये तक प्राप्त हुई है। जायद मंे की गई धान की सिंचित खेती में खरीफ धान की अपेक्षा अधिक आय प्राप्त हुई है। जायद में भटा, भिण्डी की अपेक्षा धान की कम आमदनी आंकी गई है।
सिंचाई:
प्रदेष में केवल 31 प्रतिषत क्षेत्र मंे सिंचाई सुविधा उपलब्ध है। जहां शून्य से लेकर 87 प्रतिषत तक सिंचाई का क्षेत्रफल विभिन्न जिलों में उपलब्ध है। यहां सिंचाई के क्षेत्र में बड़ा अंतर नजर आता है। छत्तीसगढ़ में अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, जहां जल संसाधनों के प्रबंधन हेतु प्रभावी जल नीति बनायी जानी चाहिए।

प्रदेष में जहां सिंचाई साधन उपलब्ध हैं:- वहां अधिक आमदनी देने वाली फसलों की खेती को अपनाया जाये। सदियों से दाल-भात का सम्बंध रहा है, जहां धान की खेती की जाती है-वहां दलहन की खेती अवष्य की जानी चाहिए।

  • प्रदेष मंे अधिकांष क्षेत्र में सिंचाई नहरों द्वारा की जाती है, जहां जल के वितरण और नहरों के रखरखाव पर ध्यान देने की आवष्यकता है। जल वितरण में किसानों की भागीदारी सुनिष्चित की जानी चाहिए।
  • जल-चक्र को बनाये रखने के लिए जंगलों के विनाष को रोका जाये तथा वन क्षेत्र में वृक्षारोपण किया जाये।
  • नलकूप, कुंआ निर्माण हेतु छत्तीसगढ़ शासन के कृषि विभाग में एक पृथक प्रकोष्ठ (ैमचंतंजम ब्मसस) बनाया जाये, जिससे किसानों को कूप, नलकूप खनन की कार्यवाही में सरलता हो।

प्राध्यापक, (कृषि अर्थषास्त्र)
इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय,
कृषि महाविद्यालय,कृषक नगर,
रायपुर 492012 (छत्तीसगढ़)

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