भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में बैकों की भूमिका

डाॅ. भागचन्द्र जैन
प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र), प्रचार अधिकारी,
इंदिरा गांधी कृषि विष्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय, रायपुर – 492012 (छत्तीसगढ़)

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किसी भी देष की अर्थव्यवस्था के विकास में वहां की बैकों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बैकों पर मुद्रा निर्गमन, लेन-देन तथा अन्य विक्तीय कार्यों के क्रियान्वयन का दायित्व होता है।  भारतीय अर्थव्यवस्था विष्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। विष्व बैंक की अप्रैल 2014 में जारी की गई रिपोट केअनुसार क्रयषक्ति समानता (Purchasing power parety) के आधार पर अमेंरिका और चीन के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था का क्रम आता है, जो कि वर्ष 2005 में दसवें स्थान पर थी। दिसंबर 2013 में संयुक्त राष्ट्र सांख्यिकी प्रभाग (United Nations Statistics Department) द्वारा की गई रेंकिंग में सकल घरेलू उत्पाद में भारत का स्थान दसवां थां। वर्ष 1991 के बाद से भारतीय अथ्व्यिवस्था में सुदृढ़ता का दौर शुरू हुआ, जिसके फलस्वरूप् भारत ने प्रति वर्ष लगभग 8 प्रतिषत से अधिक की वृद्वि दर्ज की। वर्ष 2003 में हमारे देष की विकास दर 8.4 प्रतिषत थी, तब भारतीय अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे तेज गति से उभरती हुई अर्थव्यवस्था की संज्ञा दी गई।

बेैंक न केवल देष के धन के भण्डार गृह होते हैं अपितु आर्थिक विकास के लिए वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराते हैं।  एक आंकलन के अनुसार सकल घरेलू उत्पाद में बैकिंग क्षेत्र का योगदान 7.7 प्रतिषत आंका गया है।

बैंकिंग विनियमन अधिनियम (Banking Regulation Act), 1949 की धारा 5 (ख) के अनुसार उधार देने (Lending) अथवा निवेष करने (Invest) के प्रयोजन से जनता से जमा के रूप में धनराषियां स्वीकार करना, जो मांगने पर अथवा अन्यथा प्रतिसंदेय (त्मचंलंइसम) हो, और चेक, ड्राफ्ट, आदेष द्वारा अथवा अन्य किसी प्रकार वापस निकाली जा सके (Repayable), बैकिंग कहलाती है।

 

भारत में सबसे पहले वर्ष 1770 में अलेक्जेंडर कम्पनी द्वारा बैंक आॅफ हिन्दुस्तान की स्थापना कलकत्ता में की गई थी।  इसके बाद वर्ष 1865 में इलाहाबाद बैंक ओेेैर वर्ष 1894 में पंजाब नेषनल बेैंक की स्थापना की गई।  भारतीयों द्वारा पूर्ण रूप से संचालित पहला बैंक पंजाब नेषनल बैंक है।  ब्रिटिष ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बैंक आॅफ बंगाल (1809 में), बैंक आॅफ बाम्बे (1840 में) और बैंक आॅफ मद्रास (1843 में) शुरूआत की, बाद में इन तीनों बैकों को मिलाकर इंपीरियल बैंक बनाया गया।  इंपीरियल बैंक का राष्ट्रीयकरण 1 जुलाई 1955 को किया गया तथा इसका नाम बदलकर भारतीय स्टेट बैंक रखा गया । वर्ष 1930 में व्यापक मंदी का प्रभाव इस बैंक पर पड़ा, जिसके लिये केंद्रीय बैकिंग जाच समिति बनायी गयी। इस समिति की अनुषंसा के आधार पर 1 अप्रैल 1935 को भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना की गयी, जिसके साथ-साथ विकास और संवर्धन (Developmental and Promotional) कार्य करता है।  भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के अन्तर्गत बैंक को नोट जारी करने वाले प्राधिकरण (Note issuing authority), बैकों का बैंक (Banker’s bank) तथा शासन के बैंकर (Banker to the government) के रूप में अधिकार दिये गये हैं।

 

बैकों का राष्ट्रीयकरण

 

बैकों के राष्ट्रीयकरण का मुख्य उददेष्य आम आदमी तक बैकिंग सुविधाओं को पहुंचाना हैं। राष्ट्रीयकरण से सभी के लिए दरवाजे खुले। वर्ष 1964 मंे औद्योगिक क्षेत्र में ऋण उपलब्ध कराने की दृष्टि से भारतीय औद्योगिक विकास बैंक (Industrial Development Bank of India) की स्थापना की गयी, जिससे बड़ी-बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं को सावधि ऋण (Term loan) आसानी से मिलने लगा। इसके पूर्व वर्ष 1955 में भारतीय औद्योगिक साख तथा विनियोजन निगम लिमिटेड (Industrial Credit and Investment Corporation of India Limited) की स्थापना की गई, यह संस्था उद्योगों के लिए विष्व बैंक से धन उपलब्ध कराती है।

19 जुलाई 1969 को 50 करोड़ रूपये से अधिक जमा राषि वाली 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिनमें सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया, बैंक आॅफ इंडिया, पंजाब नेषनल बैंक, बैंक आॅफ बड़ौदा, यूको बैंक, केनरा बैंक, यूनाइटेड बैंक आॅफ इंडिया, देना बैंक, यूनियन बैंक आॅफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, सिण्डीकेट बैंक, इंडियन बैंक, बैंक आॅफ महाराष्ट्र और इंडियन ओवरसीज बैंक शामिल हैं। इसके बाद 15 अप्रैल 1980 को 200 करोड़ रूपये से अधिक जमा राषि वाली 6 बैकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, जिनमें पंजाब एण्ड सिंध बैंक, आंध्रा बेैंक, न्यू बैंक आॅफ इंडिया, विजया बैंक, ओरियेंटल बैंक आॅफ कामर्स और कार्पोरेषन बैंक शामिल हैं। वर्ष 1993 में न्यू बैंक आॅफ इंडिया का पंजाब नेषनल बैंक में विलय हो गया।

 


भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में बैंकों की भूमिका

भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में बैकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। व्यापार, कृषि, निर्यात-आयात, पूंजी निर्माण, मौद्रिक नीति, जमा, ऋण, शासकीय कार्यक्रमों, परियोजनाओं के क्रियान्वयन, बचत जैसे पहलुओं पर बैंक का योगदान रहता है, जिससे आर्थिक विकास की गति तेज हुई हैः

  • गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम (Poverty elevation programme) राष्ट्रीयकरण के बाद देष के आर्थिक विकास में बैंको ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों जैसे एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (Integrated Rural Development Programme) प्रधानमंत्री रोजगार योजना (Prime Minister Rojgr Yojana), स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवकों को प्रषिक्षण (TRYSEM)आदि से गरीबी कम हुई है तथा सामाजिक आर्थिक स्थिति में बदलाव आया है। इन कार्यक्रमों का क्रियान्वयन बैकों के माध्यम से हुआ है, जिनका लाभ समाज के अंतिम छोर तक पहुंचा है। वर्तमान में पेन्षन, छात्रवृत्ति, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गांरटी कार्यक्रम (MNREGA) आदि का भुगतान बैकों के माध्यम से होता है। विभिन्न कार्यक्र्रमों, योजनाओं में बैंकों द्वारा आम आदमी को सुविधाएं देकर उन्हें स्वावलम्बी बनाया जा रहा है। समाज के बेहतर विकास क लिए बैंक कटिबंद्व है, जिससे देष की प्रगति जुड़ी हुई है। आम आदमी तक बैकों द्वारा व्यक्तिगत ़ऋण, गृह निर्माण ऋण, वाहन ऋण, षिक्षा ऋण आदि की रिटेल बैकिंग की सुविधाएं पहुंची है।
  • षिक्षा (Education) बैंकों में संचित राषि को सुरक्षित रखा जाता है, जिसका उद्यमियों द्वारा निवेष किया जाता है। समाज को षिक्षित करने में बैंक की भूमिका सर्वांपरि है, क्योंकि षिक्षित व्यक्ति समाज को नई दिषा देता है, वह अपने रहन-सहन के स्तर को ऊंचा ही नहीं उठाता है अपितु देष के लिए महत्वपूर्ण संसाधन निरूपित होता है, इसलिए बैकों के माध्यम से देष-विदेष में अध्ययन हेतु षिक्षा ऋण मुहैया कराया जा रहा है।
  • आधारिक संरचना (Infrastructure Development) आधारिक संरचना विकास का महत्वपूर्ण मापदण्ड होती हेै। गांवों और कस्बों में सम्पर्क करने के लिए सड़कों का जाल बिछाया गया है। बैंकों का योगदान केवल ग्रामीण और कुटीर उद्योगोंकी स्थापना में नहीं रहा है, अपितु बेहतर निवेष से मध्यम और वृहद उद्योगों की स्थापना भी हुई है। बैंकों से न केवल आम आदमी ने ऋण लिया है, बल्कि शासकीय परियोजनाओं के लिए भी बैंकों ने राषि जुटायी है।

 

 

 

  • आयात एवं निर्यात (Import and Export) आयातक और निर्यातक जोखिम को कम करते हुये आयात-निर्यात बढ़ाने के लिए बैकों द्वारा ऋण दिया जा रहा है, इसमंे बैंक सार्वजनिक मुद्दों, निवेष बैंकर और सलाहकार के रूप में एक निधि प्रबंधक की भूमिका निभाता है। बैंक की भागीदारी के बिना किसी भी गतिविधि में सफलता नहीं मिल सकती । प्रौद्योगिकी के उपयोग से उत्पादकता को बढ़ाना आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण मापदण्ड होता है। बैकिंग पद्वति में नई तकनीक के उपयोग से ऋण, रकम हस्तांतरण बहुत आसान हो गया है – के्रडिट एवं डेबिट कार्ड, आर.टी.जी.एस.  नेफ्ट मोबाइल बैकिंग, इंटरनेट बैकिंग से रकम का हस्तांतरण न केवल निष्चित और सुविधाजनक हुआ है, अपितु कार्यालयीन अवधि (पूर्वान्ह 10.30 बजे से अपरान्ह 5 बजे तक) की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है।
  • बचत (Saving) बचत को बढ़ावा देकर उसके निवेष हेतु बैंक बढ़ावा देता है अर्थात् बैंकों में जमा की गयी राषि से ऋण उपलब्ध कराया जाता है। देष के अंदर और बाहर बैंकों द्वारा विनिमय बिलों के माध्यम से व्यापार को प्रोत्साहन दिया जाता है। बैंकों द्वारा पूंजी की गतिषीलता बढ़ती है।
  • पूंजी निर्माणः– (Capital formation) बैंकों में व्यक्तिगत और व्यापारियों द्वारा रकम जमा की जाती है, जिसका उपयोग उत्पादक कार्याें में किया जाता है। पूंजी के निवेष से पूंजी निर्माण को बढ़ावा मिलता है। जोखिम भरे व्यवसाय में जब उद्यमी निवेष करने में हिचकिचाते है, तब बैंकों द्वारा दिये गये ऋण से संबल मिलता है। समय पर ऋण मिलने से उत्पादन में वृद्वि होती है और अर्थव्यवस्था मजबूत होती है। बैंक न केवल देष के धन का भण्डार गृह होता है अपितु आर्थिक विकास के लिए वित्तिय संसाधन उपलब्ध कराता है।
  • व्यापार और उद्योग (Trade and industry)- बैकों के विकास के साथ-साथ व्यापार और उद्योग तेजी से विकसित होते हैं। बैंक ड्राफ्ट, धनादेष (ब्ीमबा), बिल आॅफ एक्सचेंज, के्रडिट कार्ड, डेबिट कार्ड आदि से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रोत्साहन मिलता है। नये उद्यमों में निवेष – प्रायः व्यापारी जोखिम भरे उद्यमों में निवेष करने से कतराते हैं, इसलिए नये उद्यमों और नई पद्वति अपनाने वाले उद्यमों के प्रोत्साहन देने के लिए बैंकों द्वारा अल्पकालीन और मध्यकालीन ऋण।
  • कृषि (Agriculture)– भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कृषि कहलाती है, जिसमंे 49 प्रतिषत व्यक्तियों को रोजगार मिला हुआ है। मार्च 1985 तक बैंकों द्वारा कृषि के लिए कुल ऋण का 15 प्रतिषत भाग दिया जाता था, बाद में यह लक्ष्य बढ़ाकर 18 प्रतिषत कर दिया गया। कृषि के लिए वाणिज्यिक बैंकों, सहकारी बेैंकों, प्राथमिक कृषि सहकारी समितियों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैकों ने रियायती ब्याज दर पर हाथ खोलकर ऋण दिया है, जिससे कृषि उत्पादन बढ़ा है तथा किसानों की आमदनी बढ़ी है।
  • विभिन्न क्षेत्रों में संतुलित विकास (Balanced development of different regions) देष के विभिन्न क्षेत्रों में संतुलित विकास हेतु बैंक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, जिसके द्वारा विकसित क्षेत्रों से पूंजी की मात्रा को कम विकसित क्षेत्रों तक हस्तांतरित की जाती है। इससे निवेष को बढ़ावा मिलता है तथा दुर्गम क्षेत्रों में उद्योगो को लगाया जाता है।
  • आर्थिक गतिविधियां – (Economic activities) बैंक आर्थिक गतिविधियों को साख उपलब्ध कराकर प्रभावित करती है, इसमें रियायती ब्याज दर का सीधा प्रभाव आर्थिक विकास पर पड़ता है।
  • मौट्रिक नीति – (Monetary Policy) देष का केंद्रीय बैंक द्वारा बैंकिंग प्रावधानों के अनुसार साख पर नियंत्रण करती है और साख सीमा बनाये रखने में मौट्रिक नीति का क्रियान्वयन करती है। मौट्रिक नीति मुद्रा स्फीति को न्याय संगत बनाने मंे मदद करती है।
  • वस्तु विनिमय (Barter economy): ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में बैंकों की शाखायें खुलने से वस्तुओं के आपस में लेन-देन में कमी आयी है। इन क्षेत्रों में मुद्रा का उपयोग बढ़ने से उत्पादन में वृद्वि हुई है।
  • निर्यात प्रोत्साहन प्रकोष्ठ (Export promotion cells) निर्यात को बढ़ावा देने के लिए बैकों में निर्यात प्रोत्साहन प्रकोष्ठों की स्थापना की गयी है, जिनके द्वारा देष के अंदर और बाहर के ग्राहकों की आर्थिक स्थिति और सामान्य व्यापार (ळमदमतंस जतंकम) संबंधी जानकारी प्रदान की जाती है।
  • सूचना प्रौद्योगिकी का बढ़ता उपयोग (Use of information technology) बैकों में सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग 1970 के दषक से किया जा रहा है, जिसमें आटोमेटेड टेलर मषीन (।ज्ड), मोबाइल बैकिंग और इंटरनेट बैकिंग का उपयोग दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी ने बैंक के कार्य को आसान बना दिया है, जिसके कारण शाखाओं में ग्राहकों की प्रत्यक्ष उपस्थिति की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया है।