महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज

डाॅ. भागचन्द्र जैन

प्राध्यापक (कृषि अर्थषास्त्र), प्रचार अधिकारी,
इंदिरा गाँधी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय रायपुर दृ 492012 ;छत्तीसगढ़)

 

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत की आत्मा गांवों में बसती है।‘ गांवों की प्रगति से सबकी प्रगति जुड़ी है। भारत गांवों का देष है, जहां पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण है। बापू ने कल्पना की थी कि ग्राम राज से स्वराज का सपना साकार हो। महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘भारत गांवों में रहता है, नगरों में नहीं। यदि मुझे गांवों को निर्धनता से मुक्त करनें में सहायता मिल जाये तो मैं समझूंगा कि मैंने सारे भारत के लिए स्वराज प्राप्त कर लिया है। यदि गांव नष्ट होता है तो भारत भी नष्ट हो जायेगा।‘ गांधी जी ऐसे पहले दार्षनिक थे, जिन्होंने ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर विषेष बल दिया, उनके राजनैतिक जीवन और अहिंसात्मक दर्षन की ग्रामीण विकास ही आधार-षिला थी। उन्होंने अपने प्रारम्भिक जीवन से जीवन से ही ऐसे रचनात्मक कार्यों को अपनाया, जिनका सीधा सम्बन्ध जीवन को सरस, सम्पूर्ण तथा सुखी बनाना था। उनका कहना था कि भारत की आत्मा गांव है-इसलिए यदि गांव-गांव में नव जीवन और आषा का संवार नहीं होता, तो स्वराज बेकार है। रचनात्मक कार्यक्रम में निम्नांकित क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई थीः

  1. साम्प्रदायिक एकता
  2. अस्पृष्यता निवारण
  3. मद्य निषेध
  4. खादी का प्रचार
  5. ग्रामीण उद्योगों का विकास
    (क) गुड़ बनाना
    (क) तेल निकालना
    (क) धान कूटना
    (क) बुनाई
    (क) नीम का तेल निकालना
  6. पषुधन विकास
  7. बुनियादी षिक्षा
  8. प्रौढ़ षिक्षा
  9. ग्रामीण स्वच्छता
  10. महिला विकास
  11. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग उत्थान
  12. नीय साधनों से क्षेत्रीय विकास
  13. हिन्दी को बढ़ावा
  14. कृषक, श्रमिक तथा विद्यार्थियों के संगठन
  15. प्राकृतिक चिकित्सा
  16. आर्थिक विषमता दूर करना
  17. स्वावलम्बी गांवों का निर्माण
  18. श्रम में निष्ठा

इस प्रकार के व्यापक कार्यक्रम में गांवों के पुर्ननिर्माण और सर्वांगीण विकास की छटा दिखायी देती थी। गांधी जी एक नये समाज का निर्माण करना चाहते थे, जिसमें विषमता न हो और जो शोषणमुक्त हो । ऐसा समाज तब बनेगा, जबकि गांवों की समस्याओं का निराकरण किया जाये। गांधी जी ने गांवों की समस्याओं का निराकरण भी किया, क्योंकि वे केवल आदर्षवाद में विष्वास नहीं करते थे, वे एक व्यावहारिक महा पुरूष थें। उन्होंने सेवाग्राम आश्रम द्वारा निकटवर्ती क्षेत्रों में यह कार्यक्रम लागू किया, जिसके कुछ ही दिनों में सकारात्मक परिणाम दिखाई देने लगे।
महात्मा गांधी मानते थें कि अच्छा स्वास्थ्य समाज, परिवार और व्यक्ति तीनों के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। देष की वास्तविक सम्पत्ति वहां के निवासियों का अच्छा स्वास्थ्य है। उन्होंने लिखा है कि ‘स्वतंत्रता प्राप्ति के पष्चात् सबसे पहला कार्य देष में यह होगा कि प्रत्येक व्यक्ति को ठीक से रोटी तथा कपड़ा मिल सके।‘स्वस्थ और सुखी जीवन की यह प्राथमिक आवष्यकता है, परन्तु स्वस्थ जीवन के लिए वातावरण की स्वच्छता के महत्व को पीछे नही रखा जा सकता।ं देष में होने वाली बहुत कुछ बीमारियां गावों को साफ-सुथरा बनाकर सरलतापूर्वक कम की जा सकती है।
गांधी जी के सपनों का पंचायती राज
पंचायत य पंचायती राज का उददेष्य केवल अधिकार से व्यवस्था और प्रषासन चलाना नहीं है, वरन् व्यक्तियों को सामुदायिक विकास के लिए निरंतर चलने वाले कार्याें के विकास में लगाना है। महात्मा गांधी मानते थे कि आरम्भ में लोंगों को यह अनुभव होना चाहिए कि व्यक्तियों के हित में पंचायत कार्य कर रही है। ऐसी स्थिति मंे यदि अधिकारों का यथायोग्य ध्यान रख कर उपयोग होगा तो उससे क्षति नहीं होगी, वरन् गांव के स्वायत्त प्रषासन की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।
पंचायत को अपनी प्रतिष्ठा स्थिर करने के लिए यह आवष्यक है कि वह उन कार्यों को प्राथमिकता दे, जिनका लोगों के जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध हो। इसमें गांव के व्यक्ति भी सहयेाग देंगे और धीरे-धीरे ऐसी ही अन्य जिम्मेदारियांे को बहन करने में वे सक्षम होगे। पंचायत का कार्य-क्षेत्र बढ़ता जायेगा और अन्त में यह सिद्व हो जायेगा कि पंचायते ऐसे कार्यों की जिम्मेदारी निभाने में उच्च स्तर की संस्थाओं से अच्छी हैं।
वैधानिक स्वरूप
पंचायत कानूनी अधिकार युक्त संस्था होनी चाहिए, साथ ही कानून ऐसा हो, जो समझने तथा समझाने मंे स्पष्ट हो, सरल हो।

सामान्यतया प्रत्येक उपयोगी कार्य के लिए कानून होना चाहिए, किन्तु यह कानून जटिल न हो।

  • पंचायत का वातावरण ऐसा होना चाहिए जिसमें स्वस्थ और उच्च-परम्पराओं का विकास हो।
  • इसमें लोकतांत्रिक कार्य प्रणाली उतनी महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितनी कि व्यवहारिक कार्य-विधि महत्वपूर्ण है।
  • अधिक महत्व के निर्णयों के लिए अधिक से अधिक व्यक्तियों की अनुमति लेनी चाहिए।
  • बहुमत के आधार पर महत्व के निर्णयों को मान लेने से पंचायत की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ेगी, प्रतिष्ठा उससे बढ़ती है जहां समुदाय के सभी व्यक्ति एकमत हों।
  • यदि किसी कार्य को करने के लिए सभी व्यक्ति एकमत होते हैं तो वे सब मिलकर उसे पूरा करने का प्रयास करेंगे, जिससे सच्चे लोकतन्त्र की जड़ें मजबूत हांेगी।

आजादी के पहले पंचायतें
अंग्रेजों के शासन काल में शासक चाल्र्स मेटकाल्फ ने पंचायतों की सराहना करते हुये उन्हें ‘लद्यु गणराज्य‘ की संज्ञा दी, किन्तु बाद में बड़े-बड़े व्यक्तियों ने निर्माण और विकास कार्यों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली। राॅयल आयोग ने वर्ष 1909 में अपने प्रतिवेदन में अनुषंसा की कि विकेंद्रीकरण के लिए ग्राम पंचायतों के माध्यम से व्यक्तियों को जोड़ा जाये। इसके बाद विभिन्न राज्यों द्वारा समय-समय पर पंचायत अधिनियम पारित किए गए, जिनमें ‘बंगाल ग्राम स्वषासन अधिनियम (1919), मद्रास-बाम्बे एवं सयुक्त प्रांत ग्राम पंचायत अधिनियम (1920), बिहार एवं उड़ीसा ग्राम प्रषासन अधिनियम, असम ग्राम स्वषासन अधिनियम (1926), पंजाब ग्राम पंचायत अधिनियम (1935), आदि प्रमुख हैं, ये अधिनियम ग्राम मुददों एवं ग्राम विकास की देखरेख पर आधारित थे। स्थानीय स्वषासन को गांव के छोटे मामलों के निपटानें का अधिकार था, किन्तु ये निकाय लोकतात्रिक नहीं थे, इनके वित्तीय संसाधन सीमित थे, ऐसी स्थिति वर्ष 1950 तक ज्यों की त्यों बनी रही।
आजादी के बाद पंचायतें
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने इस बात पर जोर दिया था कि स्वतंत्रता की शुरूआत सर्वप्रथम निम्न स्तर से होनी चाहिए, जिसमें प्रत्येक ग्राम एक पंचायत वाला गणराज्य (ग्राम स्वराज) होना चाहिए, इसमें पंचायत को सभी शक्तियां प्राप्त हों। जनता की भागीदारी सुनिष्चित करने के लिए वर्ष 1952 मं सामुदायिक विकास कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, किन्तु इस कार्यक्रम का लाभ ग्रामीण निर्धनों तक नहीं पहुंच पाया। इसकी वस्तु स्थिति की समीक्षा के लिए वर्ष 1957 में बलवंतराय मेहता समिति का गठन किया गया, जिसमें निर्वाचित स्थानीय निकायों की स्थापना और पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था की अनुषंसा की । वर्ष 1977 में राष्ट्रीय स्तर पर अषोक मेहता समिति का गठन किया गया, इस समिति का मानना था कि ग्रामीण भारत सभी विकासोन्मुखी कार्यक्रमों का आधार है। पंचायती राज की समीक्षा हेतु जी.वी.के. राव समिति, एल.एम. सिंघवी समिति, सरकारियां आयोग का गठन किया गया। वर्ष 1989 में भारत सरकार ने संविधान के भाग प्ग् में पंचायतों को शामिल करने के लिए 64 वां संविधान संषोधन विधेयक पेष किया, अंततः 20 अपै्रल 1993 को भारत के राष्ट्रपति ने इस पर अपनी स्वीकृति दी।
पंचायतों की भूमिका
पंचायतों को विभिन्न विकास गतिविधियों को शुरू करने के लिए पर्याप्त निधि उपलब्ध हों। प्रत्येक राज्य में 73 वें संषोधन अधिनियम- 1992 के अनुसार वित आयोग के गठन का प्रावधान किया गया है। आर्थिक कार्यक्रमों की योजना बनाने और उन्हंे लागू करने के लिए संषोधन अधिनियम पंचायतों को शक्तियां और जिम्मेदारियां देता है। ग्यारहवीं अनुसूची में कुल मिलाकर 29 गतिविधियां सूचीबद्व है। पंचायती राज संस्थाओं के लिए इन गतिविधियों को पांच श्रेणी में बांटा गया हैः

1. आर्थिक विकास:- ऐसे 11 मद हैं, जो आर्थिक विकास पर आधारित हैं, जिसमें शामिल हैः
(अ) निर्धनता उन्मूलन कार्यक्रम, जैसे एस.वाई., एस.जी.आर.वाई. आदि।
(ब) भू सुधार ।
(ग) लघु सिंचाई ,
(द) पषुपालन,
(इ) मत्स्य पालन,
(ई) सामाजिक वानिकी,
(फ) लघु वनोपज,
(ग) लघु एवं कुटीर उद्योग,
(ह) कृषि
(ज) ईंधन, चारा ।
2. षिक्षा – इसमें प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालय, गैर- औपचारिक षिक्षा, पुस्तकालय, तकनीकी प्रषिक्षण एवं सांस्कृतिक कार्यकलाप शामिल है।
3. स्वास्थय – इसमें स्वास्थ्य एवं स्वच्छता और परिवार कल्याण शामिल है।
4. महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण – इसमें महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण, कमजोर वर्गोंं का कल्याण और सार्वजनिक वितरण शामिल हैं।
5. ढ़ाचागत विकास – इसमें सड़कें, आवासीय सुविधायें, पेय जल, बाजार, विद्युतीकरण, गैर परंपरागत – उर्जा स्त्रोत, सामुदायिक सम्पत्तियों का संरक्षण शामिल है।
महात्मा गांधी के सपनों का पंचायती राज ‘ग्राम राज से स्वराज‘ पर आधारित है।
ग्रामीण जीवन के पुनरोत्थान पर उन्होंने जोर देते हुये अंिहंसात्मक दर्षन से ग्रामीण विकास की आधारषिला रखी थी। गांधी जी के आर्थिक समानता, षिक्षा, सामाजिक एकता पर केन्द्रित रचनात्मक कार्यक्रम से पंच परमेष्वर की भूमिका महत्वपूर्ण हो गयी थी, ऐसे में त्रिस्तरीय पंचायती राज में 29 गतिविधियां सूचीबद्व की गई हैं, जिनके प्रभावी क्रियान्वयन से पंचायतों से ग्रामीण विकास का सपना साकार होगा। पंचायतों को ग्रामीण विकास के व्यापक अधिकार दिये गये हैं, इन अधिकारों का क्रियान्वयन निष्पक्ष रूप से इस प्रकार किया जाये, जिससे ‘पंच परमेष्वर की भूमिका चरितार्थ हो सके। गांव में बेरोजगारी की समस्या न रहे, स्वास्थ्य सेवाएं घर-घर पहुंचे, विकास योजनाओं का लाभ योग्य हितग्राही तक पहुंचे।

11 वीं अनुसूची (अनुच्छेद 243 जी)
पंचायती राज का अभिप्राय ग्रामीण स्थानीय स्वषासन से है। पंचायती राज स्वराज को सार्थक करे, इसके लिए वर्ष 1002 में 73वें संविधान संषोधन अधिनियम संविधान में शामिल किया गया है। इस अधिनियम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला है। इस अधिनियम से संविधान में 11 वीं अनुसूची जुड़ गई है, जिसमें पंचायतों की 29 गतिविधियां सूचीबद्व है

  1. कृषि (कृषि विस्तार सहित)।
  2. भूमि विकास, भूमि सुधार, भूमि चकबंदी, भूमि संरक्षण
  3. लद्यु सिंचाई, जल प्रबंधन, जलग्रहण क्षेत्र विकास।
  4. पषुपालन, दुग्ध व्यवसाय तथा मुर्गी पालन।
  5. मत्स्य पालन, सामाजिक वानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी।
  6. लद्यु वनोपज।
  7. लद्यु उद्योग (खाद्य प्रसंस्करण उद्योग सहित)।
  8. खादी, कुटीर एवं ग्रामोद्योग।
  9. ग्रामीण आवास।
  10. पेय जल।
  11. र् इंंधन तथा पषु चारा।
  12. सड़कों, पुलों, तटीय, जल मार्गों तथा अन्य संचार के साथ।
  13. ग्रामीण विद्युती (विद्युत वितरण सहित)।
  14. गैर परम्परागत ऊर्जा स़्त्रोत।
  15. गरीबी उन्मूलन काय्रक्रम।
  16. षिक्षा (प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय सहित )।
  17. तकनीकी प्रषिक्षण एवं व्यवसायिक षिक्षा।
  18. व्यस्क एवं गैर व्यस्क औपचारिक षिक्षा।
  19. पुस्तकालय।
  20. सांस्कृतिक गतिविधियां।
  21. बाजार एवं मेले।
  22. स्वास्थ्य एवं स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं (चिकित्सालय प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र्र तथा औषधालय)।
  23. परिवार कल्याण।
  24. महिला एवं बाल विकास।
  25. सामाजिक कल्याण (विकलांग व मानसिक रोगी का कल्याण)
  26. कमजोर वर्ग (विषेषकर अनुसूचित जाति अनुसूचित जन जाति)।
  27. सार्वजनिक वितरण प्रणाली।
  28. समुदायिक सम्पत्ति की देखरेख ।

संविधान के 40 वें अनुच्छेद में इस अधिनियम से व्यवहारिक रूप दिया गया है जिसके अनुसार ‘‘ग्राम पंचायतों को गठित करने के लिए राज्य कदम उठाएगा और उन्हें उन आवष्यक शक्तियों और अधिकारों से विभूषित करेगा, जिसमें िकवे स्वषासन की इकाई की तरह कार्य करने में सक्षम हों। यह अनुच्छेद राज्य की नीति के निर्देषक सिद्वांतों का एक हिस्सा है।‘‘ 73 वें संविधान संषोधन अधिनियम में अनिवार्य एवं एच्छिक प्रावधानों को शामिल किया गया है।
(अ) अनिवार्य प्रावधान
1. एक गांव या गांवों के समूह में ग्राम सभा का गठन
2. ग्राम जनपद और जिला स्तर पर पंचायतों की स्थापना।
3. तीनों स्तरों पर सभी सीटों के लिए पं्रत्यक्ष चुनाव।
4. जनपद (Block) और जिला (District) स्तर के प्रमुख के लिए अप्रत्यक्ष चुनाव।
5. पंचायतों में चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष।
6. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति वर्ग का आरक्षण।
7. त्रिस्तरीय पंचायतों में सदस्यों एवं प्रमुख के लिए एक तिहाई महिला आरक्षण।
8. त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल 5 वर्ष है। किसी पंचायत का कार्यकाल समाप्ति के बाद 6 माह की अवधि के भीतर नये चुनाव का प्रावधान है।
9. पंचायती राज संस्थाओं में चुनाव कराने के लिए राज्य निर्वाचन आयोग की स्थापना।
10. पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में राज्य वित आयोग की स्थापना।
(ब) एच्छिक प्रावधान
1. विधानसभा एवं लोक सभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सभी पंचायती राज संस्थाओं में लोक सभा और विधानसभा के प्रतिनिधियों को शामिल करना।
2. त्रिस्तरीय पंचायतों में किसी भी स्तर पर सदस्यों एवं प्रमुख के लिए पिछड़े वर्ग का आरक्षण ।
3. स्थानीय सरकार के रूप में कार्य करने के लिए पंचायतों को अधिकार एवं शक्तियां देना।
4. सामाजिक न्याय एवं आर्थिक विकास के लिए पंचायतों को योेजना बनाने अधिकार एवं शक्तियां देना तथा 11 वीं अनुसूची के 29 कार्यों में से सभी या कुछ कार्यों को सम्पन्न करना।
5. पंचायतों को विषेष अधिकार देना, उन्हें पथकर, शुल्क आदि लगाने के लिए अधिकार देना।